सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ सात्वतसंहिता समाहित चित्त हो ध्यान करते हुए एक लाख की संख्या में जप करे ॥ ४३२ ॥ ब्रह्मचर्य में स्थित रहे, मौन धारण करे, दुष्टाहार वर्जित रखे क्षार (खारा), आरनाल (काँजी) तथा तेल का परित्याग रखे, लोलुपता का त्याग करे । मान मत्स्रता का त्याग करे । नित्य कुशा तथा अजिन पर शयन करे । फिर तपाये हुए सोने के समान तथा नित्य परिभ्रमणशील शरीर वाले एवं अनेक धारा से समाकीर्ण मुख वाले ऐसे गरुड़ का अपने आगे स्मरण करे । वहाँ पर स्थित अचल मन्त्र का भी उनके सम्मुख स्मरण करे ॥ ४३३-४३५ ॥ गरुड़ का ध्यान—वे गरुड़ अपने शरीर से नाना रत्न की प्रभा से युक्त कान्ति उगल रहे हैं, सुवर्णादि धातुओं के समूह तथा चन्द्रकान्ता आदि उत्तम मणियों का भी उद्गिर ण कर रहे हैं—इस प्रकार के गरुड़ का ध्यान और जप करना चाहिए । फिर बीच-बीच में पूजन करे । यह कार्य नियम से आरम्भ कर समाप्ति पर्यन्त नित्य स्वयं करे । ऐसे साधक के सभी लोग आज्ञा के वशीभूत हो जाते हैं । किं बहुना, अपनी आत्मा तथा धन से उसके विधेय हो जाते हैं, वह याचकों की कामना पूर्ण करने वाला तथा स्वयं समस्त भोगों का भोक्ता हो जाता है ॥ ४३६-४३८ ॥ अब जिस प्रकार मन्त्रेश्वर के प्रभाव से साधक आयु एवं आरोग्य से संयुक्त हो जाता है तथा जिस प्रकार अर्थी जनों के तथा भोगीजनों की कामना शीघ्र पूर्ण हो जाती है ऐसे साधकों के हित के लिये साधन को कहता हूँ । अत्यन्त पवित्र, मनोरम तथा सुरक्षित देश में मण्डल निर्माण करे । उस मण्डल पर मन्त्रेश का आवाहन कर यजन करे । तीन रात तथा सात रात पर्यन्त निरन्तर होम करे । तदनन्तर पूर्व में कही गई विधि के अनुसार जप एवं ध्यान करे । पद्मरागमणि के समान सर्वाधार हरि का ध्यान करे ॥ ४३९-४४२ ॥ उसके मध्य में विद्रुम की आभा वाले बन्धुजीव पुष्प के समान उज्ज्वल वर्ण वाले मन्त्रवर का मन्त्री पूर्वोक्त संख्या में जप करे ॥ ४४३ ॥ जप करने के उपरान्त साधक मानस रूप से स्त्रीभोग सम्पादन करे । ऐसा करने से काम सन्तप्त, भयभीत, मद विह्वल स्त्रियाँ उसकी प्रार्थना करती हैं । देव किन्नरों की स्त्रियाँ, यक्ष एवं गन्धर्वों की कन्यायें, सिद्ध, सुराङ्गनायें समस्त नरों एवं नागों की स्त्रियाँ आजीवन इस मन्त्र के प्रभाव से मन, वचन और कर्म से उसकी सेवा करती है ॥ ४४३-४४६ ॥ इसके बाद पुनः एक लक्ष के जप से तथा उतने ही होम से साधक जो-जो कामनायें करता है उन-उन कामनाओं को मन्त्रराज पूर्ण करते हैं ॥ ४४७ ॥ अब कामोपभोग से विरत मन्त्रज्ञ साधकों के लिये मोक्षप्रद सम्प्रदाय को यथार्थ रूप से कह रहा हूँ । इसके बाद साधक प्रसन्न अन्तरात्मा से पुनः वही