सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ४१७ श्रेष्ठ याग सम्पादन कर पूर्वोक्त काल तक मन्त्रवर का यज्ञ करे । फिर विधिपूर्वक कुण्ड में उनका तर्पण करे अथवा जल में जल से सन्तृप्त करे । फिर सर्वदोषों की निवृत्ति के लिये तथा प्रायश्चित्त के लिये एक अयुत (दस हजार) जप अपनी शक्ति के अनुसार करे । समाहित चित्त होकर हृत्कमल के मध्य में मन्त्र का स्मरण करे ॥ ४४८-४५१ ॥ साधक मन्त्राग्नि से निकलती हुई ज्वाला रश्मियों से अपने सारे रोमकूप गणों को रत्नज्वाला शंतावृत कर उसमें अपने चैतन्य को मन्त्रमय बना कर, उसमें अपना भौतिक देह जला देवे । इस प्रकार भौतिक देह से रहित होने पर साधक मन्त्र का स्वरूप धारण कर सूर्य के समान तेजस्वी होकर साक्षात् गरुड़ बन जाता है ॥ ४५२-४५३ ॥ फिर अपने उस मन्त्राकृति को धीरे-धीरे परिणत होकर तेजो गोलक के समान सभी अङ्गावयवों से रहित देखे । इसके पश्चात् उसे तेजोगोलक को धीरे- धीरे परिणत होकर बृहत् परिमाण में सर्वत्र गमन करने वाला शब्दरूप, भावरूप और चिन्मयरूप में देखे ॥ ४५४-४५५ ॥ उसके बाद धीरे-धीरे अपने 'अस्मिता' नामक अभिमान का त्याग कर देने पर वह साधक स्वयं ब्रह्म स्वरूप बन जाता है । हे सङ्कर्षण ! इस प्रकार वैभवीय महात्मा नृसिंह की सिद्धि से समन्वित आराधन का प्रकार संक्षेप में कहा गया ॥ ४५६-४५७ ॥ यह वैभवीय नृसिंह के आराधन का प्रकार नित्य क्रिया में परायण, संसार से उद्विग्न चित्त वाले, संयतात्मा, शुद्ध मेरे भक्तों को ही सुनाना चाहिये । अन्य को नहीं ॥ ४५८ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के वैभवीयनृसिंहकल्प नामक सप्तदश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १७ ॥