सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
सप्तदशः परिच्छेदः ४१७ श्रेष्ठ याग सम्पादन कर पूर्वोक्त काल तक मन्त्रवर का यज्ञ करे । फिर विधिपूर्वक कुण्ड में उनका तर्पण करे अथवा जल में जल से सन्तृप्त करे । फिर सर्वदोषों की निवृत्ति के लिये तथा प्रायश्चित्त के लिये एक अयुत (दस हजार) जप अपनी शक्ति के अनुसार करे । समाहित चित्त होकर हृत्कमल के मध्य में मन्त्र का स्मरण करे ॥ ४४८-४५१ ॥ साधक मन्त्राग्नि से निकलती हुई ज्वाला रश्मियों से अपने सारे रोमकूप गणों को रत्नज्वाला शंतावृत कर उसमें अपने चैतन्य को मन्त्रमय बना कर, उसमें अपना भौतिक देह जला देवे । इस प्रकार भौतिक देह से रहित होने पर साधक मन्त्र का स्वरूप धारण कर सूर्य के समान तेजस्वी होकर साक्षात् गरुड़ बन जाता है ॥ ४५२-४५३ ॥ फिर अपने उस मन्त्राकृति को धीरे-धीरे परिणत होकर तेजो गोलक के समान सभी अङ्गावयवों से रहित देखे । इसके पश्चात् उसे तेजोगोलक को धीरे- धीरे परिणत होकर बृहत् परिमाण में सर्वत्र गमन करने वाला शब्दरूप, भावरूप और चिन्मयरूप में देखे ॥ ४५४-४५५ ॥ उसके बाद धीरे-धीरे अपने 'अस्मिता' नामक अभिमान का त्याग कर देने पर वह साधक स्वयं ब्रह्म स्वरूप बन जाता है । हे सङ्कर्षण ! इस प्रकार वैभवीय महात्मा नृसिंह की सिद्धि से समन्वित आराधन का प्रकार संक्षेप में कहा गया ॥ ४५६-४५७ ॥ यह वैभवीय नृसिंह के आराधन का प्रकार नित्य क्रिया में परायण, संसार से उद्विग्न चित्त वाले, संयतात्मा, शुद्ध मेरे भक्तों को ही सुनाना चाहिये । अन्य को नहीं ॥ ४५८ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के वैभवीयनृसिंहकल्प नामक सप्तदश परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ १७ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः अधिवासदीक्षाविधिः नारद उवाच एवमुक्ते सति पुनः कामपालो मुनीश्वराः । उवाचेदं हरिं वाक्यं लोकानुग्रहकाम्यया ॥ १ ॥ अथाष्टादशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते। संकर्षण पृच्छतीत्याह—एवमिति ॥ १ ॥ नारद जी ने कहा—हे मुनिश्वरों ! भगवान् वासुदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सङ्कर्षण ने संसार पर अनुग्रह करने की कामना से पुनः श्रीकृष्ण से कहा ॥१॥ सङ्कर्षण उवाच सम्प्राप्तप्रत्ययानां च द्विजातीनां च साम्प्रतम् । सम्यक् प्रक्षीणपापानामारूढानामिह क्रमे ॥ २ ॥ दीक्षात्रयस्य भगवन् ज्ञातुमिच्छामि निर्णयम् । यत्प्राप्य भगवद्भक्तः कृतकृत्योऽचिराद्भवेत् ॥ ३ ॥ प्रश्नप्रकारमाह—सम्प्राप्तेति द्वाभ्याम् ॥ २-३ ॥ सङ्कर्षण ने कहा—हे प्रत्यय! जिन द्विजातियों को आप में प्रत्यय (आस्था, विश्वास) प्राप्त हो गया है । जिनके पाप सर्वथा प्रक्षीण हो चुके हैं और जो वैष्णव दीक्षा-क्रम में आरुढ़ हो गये हैं । उन द्विजातियों के तीनों दीक्षा क्रमों को मै जानना चाहता हूँ, जिसे प्राप्त कर भगवद् भक्त अपने को कृतकृत्य बना लेता है ॥२-३॥ दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारकथनम् श्रीभगवानुवाच शुभेऽनुकूले नक्षत्रे तिथौ लग्ने ग्रहेक्षिते । भक्तानामधिवासार्थं क्ष्मापरिग्रहमाचरेत् ॥ ४ ॥ पुण्ये देशेऽनुकूले च मनोज्ञे साधुसेविते । मृद्वारिफलपुष्पाढ्ये समित्कुशसमन्विते ॥ ५ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४१९ एवं पृष्ठो वासुदेवः प्रथमं क्षमापरिग्रहपूर्वकं दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारमाह— 'शुभेऽनुकूले नक्षत्र' इत्यारभ्य 'बलिं सर्वत्र सर्वदा' इत्यन्तम् ॥ ४-२५ ॥ श्री भगवान् के कहा—शुभ अनुकूल नक्षत्र, तिथि, शुभ ग्रह से दृष्ट लग्न में भक्तों के निवास के लिये साधक सर्वप्रथम भूमि अधिग्रहण करे । वह भूमि उत्तम मिट्टी, जल, फल तथा पुष्प से समृद्ध हो । समिद् कुशा समन्वित हो, अनुकूल पुण्य प्रदेश में हो, मनोज्ञ हो और साधु सन्तों से सेवित हो ॥ ४-५ ॥ गोसस्यशालिसुभगे क्षुद्राप्राणिविवर्जिते । तत्र वर्णानुरूपाम् क्ष्माम् गच्छेत् पूर्वोक्तलक्षणाम् ॥ ६ ॥ सर्वदोषविनिर्मुक्तां सत्पक्षमृगसेविताम् । या शुभायतननोद्देशैर्मठैर्गोष्ठापणैर्गृहैः ॥ ७ ॥ तोयाशायाश्रमैः क्षेत्रैः सद्धैरन्तरीकृता । जलौघभयनिर्मुक्ता बलाद् भुक्त च सज्जनैः ॥ ८ ॥ वनैरुपवनैर्ग्रामैर्नगराङ्गैः समावृता । अलाभे सति लाभे वा स्वभूमेर्ब्राह्मणादिषु ॥ ९ ॥ स्वमन्त्रेणार्चनात् स्वत्वं कुर्याद् वर्णव्यपेक्षया । उद्धृतां कृतखातां च ज्ञात्वा दोषोज्झितां पुरा ॥ १० ॥ गाय एवं हरे भरे सस्यों से पूर्ण हो और वहाँ क्षुद्र प्राणि न हों । इस प्रकार अपने वर्ण के अनुरूप पूर्वोक्त लक्षण वाली भूमि का अधिग्रहण करे । वह भूमि समस्त दोषों से रहित तथा उत्तम पक्षियों के एवं उत्तम मृगों से सेवित होनी चाहिये । जो शुभायतन, शुभ उद्देश्य वाली, शुभ मठों, शुद्ध आपणों (बाजारों) तथा शुभ ग्रहों से समन्वित हो । वहाँ जलाशय, आश्रम क्षेत्र तथा सदाचारी सज्जनों का निवास हो । जल प्लावन की संभावना न हो तथा सज्जन लोग हठपूर्वक रहने के लिये विवश हों । वह भूमि वन, उपवन, ग्राम, नगर के अङ्गों से समावृत (घिरा) हो । यदि ऐसी भूमि न प्राप्त हो, तब ब्राह्मणादि से खरीद कर प्राप्त करे, अथवा अपने मन्त्र से भूमि का अर्चन कर अपने वर्णानुसार भूमि पर अधिकार करे ॥ ६-१० ॥ शुभमृत्पूरितां कृत्वा लध्वश्मभिरथान्तरा । ततस्त्वाकुट्टयेत् पश्चात् पञ्चगव्येन सेचयेत् ॥ ११ ॥ युक्तां हेमादिसद्रत्नैः समीकृत्योपलिप्य च । तत्रार्चनं विभोः कुर्याद् ध्यानान्तं चैव पूर्ववत् ॥ १२ ॥ वहाँ के ऊपर की मिट्टी अथवा खन कर भीतर की मिट्टी की परीक्षा करे । जब वह सर्वथा दोषरहित हो । तब वहाँ के गड्ढे आदि को शुभ मृत्तिका से पूर्ण
४२० सात्वतसंहिता करे अथवा छिद्रों में छोटे-छोटे पत्थरों को डाल कर उसे कुटवा देवे । इस प्रकार समतल बनवा कर पञ्चगव्य से सींच देवे । हेमादि रत्नों से युक्त कर समतल बनाकर लेप करे । ऐसी भूमि अधिग्रहण कर सर्वप्रथम वहाँ भगवान् का अर्चन करे, पूर्ववत् अर्चन के बाद ध्यान करे ॥ १०-१२ ॥ भूतानां बलिदानं च सुरभीणां च तर्पणम् । द्विजानां दक्षिणात्तं वै ततस्तत्र समापयेत् ॥ १३ ॥ पञ्चमहाभूतों के लिये बलिदान देवे, गायों को सन्तृप्त करे । ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर फिर उसे अपने अधिकार (समाप्त) में करे ॥ १३ ॥ प्राग्दिक्षु सिद्धिपूर्वं तु मण्टपं मण्डनान्वितम् । सुस्तम्भाद्वितयेनैव कोणगेनोपशोभितम् ॥ १४ ॥ ऐसी भूमि के पूर्वभाग में सिद्धिपूर्वक सर्वाभूषणभूषित मण्डप का निर्माण करे । दो खम्भा गाड़े जो कोणों वाले हों ॥ १४ ॥ पार्थिवेन च पीठेन मध्यगेन विराजितम् । विस्तरात्तु द्विजातीनां शूद्रान्तानां समं स्मृतम् ॥ १५ ॥ अष्टाश्रमथवा वृत्तं तुर्याश्रं सोपपीठकम् । अष्टाङ्गुलात् समुत्सेधादेकापायेन लक्षितम् ॥ १६ ॥ मध्य में मिट्टी का पीठ निर्माण करे । विस्तार की दृष्टि से द्विजातियों से लेकर शूद्रान्त तक सम (बराबर) होना चाहिये । अथवा वह पीठ आठ कोणों का तथा वृत्त (गोला) निर्माण करे । जिसमें चार कोणों का उपपीठ हो । उसकी ऊँचाई आठ अङ्गुल से एक अङ्गुल कम लक्षित हो ॥ १५-१६ ॥ स्वोन्नत्यर्थेनोपपीठं सर्वेषां परिकल्पयेत् । विस्तारमुपपीठानां पीठोच्छ्रायाद् द्विसङ्गुणम् ॥ १७ ॥ उपपीठस्य संलग्ना तन्मानेन तु चोन्नता । आप्यदिक् साय्रहस्ता च सम्पाद्याऽऽसनपिण्डिका ॥ १८ ॥ नैवेद्यमुपपीठे तु विनिवेद्य निधाय च । तस्य दक्षिणदिग्भागे त्वन्तर्गमनसंयुतम् ॥ १९ ॥ सभी के लिये ऊँचाई के अनुसार उपपीठ निर्माण करे । उपपीठों का विस्तार पीठ की ऊँचाई से दुगुना होना चाहिये । उपपीठ से लगा हुआ उसके मान के अनुसार उन्नत आसनपिण्डिका का निर्माण करे । नैवेद्य निवेदन करे और उपपीठ पर स्थापित करे । उसके दाहिनी ओर भीतर जाने का रास्ता बनावे ॥ १७-१९ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४२१ विविक्तलोचनोपेतं पिण्डिकाकुण्डभूषितम् । सुकवाटार्गलोपेतं कुर्याद् हवनमण्टपम् ॥ २० ॥ एकान्त में गवाक्ष एवं पिण्डिका का कुण्ड से भूषित सुन्दर कपाट तथा अर्गला से युक्त हवन मण्डप का निर्माण करे ॥ २० ॥ उपलिप्यास्त्रजप्तेन वारिणा गोमयेन तु । विधिवच्छोभनं कुर्यादित्येवं मण्टपद्वयम् ॥ २१ ॥ तदनन्तर अस्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित जल एवं गोमय से मण्डपों का उपलेप करे । इस प्रकार के दो मण्डपों का निर्माण करे ॥ २१ ॥ विहितो वित्तविरहादधिवासो द्विजालये । शिष्यैर्वाऽऽचार्यभवने तत्र कुर्यात् परिग्रहम् ॥ २२ ॥ यदि धन न हो तब किसी ब्राह्मण के घर में अधिवास निर्माण करे, अथवा शिष्य के भवन में, अथवा अपने आचार्य के भवन में ही अधिवास के लिये भूमि का परिग्रह करे ॥ २२ ॥ प्राग्वदर्चनपूर्वं तु भूततर्पणपश्चिमम् । ओदनं दधिलाजाज्यं मधुतोयपरिप्लुतम् ॥ २३ ॥ भूततर्पणमित्युक्तं तद्विना तत्र तेऽनिशम् । सन्तिष्ठन्ते बहिः क्रुद्धाः काङ्क्षमाणाः परं वधम् ॥ २४ ॥ वहाँ अधिवास निर्माण कर प्राक् कथनानुसार भगवदर्चन करे । तत्पश्चात् भूत तर्पण करे । ओदन, दही, लावा, घृत, मधु और जल यह भूत तर्पण की सामग्री है । यदि भूत तर्पण नहीं किया गया तो वे मण्डल के बाहर रात-दिन क्रुद्ध होकर किसी के वध की आकांक्षा करते हुए वहीं स्थित रहते हैं ॥ २३-२४ ॥ अतश्च विहितं यत्नात् स्थाने क्षेत्रे कृते सति । निर्विघ्नसिद्धये दद्याद् बलिं सर्वत्र सर्वदा ॥ २५ ॥ इसलिये नवीन स्थान और नवीन क्षेत्र बना लेने पर निर्विघ्नता की सिद्धि के लिये प्रयत्नपूर्वक सभी स्थानों पर सर्वदा बलिदान की विधि कही गई है ॥ २५ ॥ सम्भारार्जनकथनम् कृत्वैवं मङ्गलार्थं तु दीर्घं घण्टारवं शुभम् । स्वपदात् प्राग्वदुत्थाप्य प्रोच्चार्य प्रणवं महत् ॥ २६ ॥ प्रवेशयेत् ततस्तस्मिन् लाजान् सिद्धार्थकान् शुभान् । फलानि श्रीफलादीनि चन्दनादीनि रोचनाम् ॥ २७ ॥
४२२ सात्वतसंहिता श्वेतदूर्वाः सुमनसस्तन्महीरुहमञ्जरीम् । साग्रान् हरितदर्भांश्च सर्वरत्नानि काञ्चनम् ॥ २८ ॥ सर्वौषधीत्वगेलाद्यं सुगन्धिनिचयं शुभम् । पद्मकं शङ्खपुष्पं च विष्णुक्रान्ता च कुन्दरम् ॥ २९ ॥ सप्त सप्त च धान्यानि बीजानि च समानि षट् । शालिश्यामाकनीवारतण्डुलं भूरिसंस्कृतम् ॥ ३० ॥ सम्भारार्जनमाह—कृत्वैवमित्यादिभिः । सप्त सप्त च धान्यानि ग्राम्यारण्यभेद- भिन्नानीश्वरपारमेश्वरयोर्हविःपाकप्रकरणोक्तानि (ई.सं. २५।५८-५९, पा.सं. १८। १३४-१३६) ज्ञेयानि । अस्मिन्नवसरेऽङ्कुरप्रतिसरावीश्वरोक्तौ (२१।७५) ग्राह्यौ, अत्रापि सम्भारवर्गे “पालिकां घटिकाम्” (१८।३९) इत्युक्तत्वात् ॥ २६-४८ ॥ इस प्रकार अधिवास निर्माण कर लेने पर बलिदान के बाद कल्याणकारी घण्टा का शब्द करे । फिर अपने स्थान से पहले की तरह उठ कर जोर से प्रणव का उच्चारण कर उस अधिवास स्थान में सर्वप्रथम लाजा, शुभ सिद्धार्थक का प्रवेश करावे । फिर श्रीफलादि फल, चन्दनादि, रोचना (हरदी), श्वेत दूर्वा, उत्तमोत्तम पुष्प, माङ्गलिक वृक्ष की मञ्जरी, अग्रभाग सहित हरा-हरा कुश, सर्वरत्न सुवर्ण, सर्वौषधी, त्वक् इलायची, सुगन्धित पदार्थ, पद्मक, शङ्खपुष्पी, विष्णु- क्रान्ता, कुन्दर (?), सप्त ग्राम धान्य, सप्त आरण्य धान्य, षड् बीज शाली, श्यामाक नीवार, तण्डुल जो ठीक प्रकार से शुद्ध किया गया हो उसका प्रवेश करावे ॥ २६-३० ॥ गोसम्भवानि वै पञ्च पात्रेष्वौदुम्बरेषु च । तत् स्राववर्जितान्यानि तान्येव सुबहून्यपि ॥ ३१ ॥ प्रतिक्षणोपयोगार्थं भाण्डेष्वपि नवेषु च । पाद्याचमनकार्यार्थं दध्यन्नविनिवेदने ॥ ३२ ॥ गौ से उत्पन्न (मल मूत्र वर्जित) दूध, दही, घी पर्याप्त मात्रा में ताम्र पात्र में रखकर प्रवेश करावे । प्रतिक्षण पाद्य आचमन कार्य के लिये उपयोग किये जाने वाले तथा दधि एवं अन्न के निवेदन में उपयोग किये जाने वाले जलादि नवीन मिट्टी के पात्रों में रखकर प्रवेश करावे ॥ ३१-३२ ॥ हेमाद्युत्थानि पात्राणि मृदुपर्णपुटानि वा । पाण्डाराणि दुकूलानि वस्त्रयुग्मद्वयं नवम् ॥ ३३ ॥ उपवीतं सोत्तरीयं सुसिते धौतवाससी । कौशेयानि पवित्राणि कङ्कणं साङ्गुलीयकम् ॥ ३४ ॥ स्फाटिकं चाक्षसूत्रं च पत्राक्षं तु गणित्रकम् ।
अष्टादशः परिच्छेदः ४२३ पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम् ॥ ३५ ॥ कुतपं योगपट्टं च नेत्रवस्त्रं मृगाजिनम्। ब्रुसीकाशांशुकं पट्टं पादुके च उपानहौ ॥ ३६ ॥ दण्डं प्रतिग्रहं छत्रं पूर्णगोधूमकाष्ठकम्। चतुर्वर्णानि माल्यानि सुन्दरं पावनं लघु ॥ ३७ ॥ नीलशाद्वलसम्मिश्रं हरितं पत्रसञ्चयम्। गुग्गुलं मृष्टधूपं च दीपतैलं च वर्तयः ॥ ३८ ॥ दर्पणं धूपपात्रं च घण्टामर्घ्यादिपात्रकम्। रजांसि करणीयुग्मं पालिकां घटिकां सिताम् ॥ ३९ ॥ पञ्चाङ्गुलं तु सुदृढं हेमाद्यं कुशपञ्चकम्। अलक्तरञ्जितं सूत्रं सुसितं कर्तरी क्षुरम् ॥ ४० ॥ काण्डान्यष्टौ तु साग्राणि बर्हिपक्षान्वितानि च। प्रोन्नतानि स्थिराग्राणि लोहमृत्काष्ठजानि वा ॥ ४१ ॥ रञ्जितानि सुधाद्यैस्तु तदाधाराणि यानि च। कुल्लिकान्यम्बुकुम्भानि भृङ्गारं करवीं शुभाम् ॥ ४२ ॥ सुवर्ण से निर्मित पात्र अथवा कोमल पत्तों से निर्मित दोने आदि पात्र, श्वेत वर्ण के रेशमी, दो नवीन जो वस्त्र उत्तरीय सहित हों उन्हें, उपवीत, शुद्ध दो श्वेत धौत वस्त्र, कुशा निर्मित पवित्र, अंगूठी के सहित कङ्कण, स्फटिकमणि निर्मित अक्षसूत्र, पत्राक्ष, गणित्रक, पञ्चलोहमय चक्र, शङ्ख सहित द्वादशारक, कुतप योग पट्ट, नेत्र वस्त्र, मृगचर्म आसन, अंशुक, पट्ट, दो पादुका, दो उपानह, दण्ड, प्रतिग्रह, छत्र, पूर्णपात्र गेहूँ, काष्ठ, चार वर्ण वाली पुष्प माला, सुन्दर पावन लघु नीले शाद्वल से मिला हुआ हरित वर्ण के पत्र समूह, गुग्गुल, मृष्टधूप, दीपक, तेल, बत्तियाँ, दर्पण, धूपपात्र, घण्टा, अर्ध्यादि के पात्र, चूर्ण करणीयुग्म पालिका, श्वेत घटिका, पाँच अङ्गुल का सुदृढ़ हेम वर्ण का कुशपञ्चक, अलक्तक से रंगा हुआ सूत्र, श्वेत वर्ण की कैंची, छूरी, मोरपङ्ख से जुड़े अग्रभाग सहित आठ कुशा के काण्ड, अत्यन्त ऊँचे स्थिर अग्रभाग वाले पाँच की संख्या में लोहे, मिट्टी तथा काष्ठ निर्मित (पात्र) जो चूने आदि से रंगे हुए हों। उनके भी आधारपात्र, कुल्लिका, जल कुम्भ, भङ्गार एवं शुभ करवी प्रवेश कराए ॥ ३३-४२ ॥ अकालमूलनिर्गर्भं साधारं कलशं तथा। स्थालीं कमण्डलुं दर्वी तत्पिधानं तु चुल्लिकाम् ॥ ४३ ॥ भद्रपीठं चतुष्पादं चतुरश्रायतं नवम्। मात्रावित्तं सताम्बूलं दन्तधावनसञ्चयम् ॥ ४४ ॥
४२४ सात्वतसंहिता शुष्कगोमयसंयुक्तामरणं चाग्निजं मणिम्। पालाशदूर्वासमिधः साग्राः परिधयस्तु वै॥ ४५ ॥ प्रभूतमिन्धनं शुष्कमाज्याक्तं तिलतण्डुलम्। प्रागुक्तं स्रुकस्रुवाद्यं च होमोपकरणं च यत्॥ ४६ ॥ सर्वं पक्ष्मकपर्यन्तं बृहत्पात्रद्वयान्वितम्। पूर्वोक्तानां च भोगानां मध्याद् यः स्थण्डिलार्चने॥ ४७ ॥ संयाति चाङ्गभावं तद् ज्ञात्वा सर्वं प्रवेशयेत्। साधार कलश, स्थाली (बटुई), कमण्डल, कलछुल, ढाँकने वाला पात्र, चूल्ही, चार कोणों वाला लम्बा, नवीन, चतुष्पाद, भद्रपीठ मात्रा वित्त (मुद्गादि) जो ताम्बूल सहित हो, दन्त धावन समूह, शुष्क गोमय संयुक्त अरणि, अग्निजन्य मणि पालाश, दूर्वा, समिधायें जो अग्रभाग से युक्त हो, परिधियाँ, पर्याप्त इन्धन, घी में डुबोये गये शुष्क तिल, तण्डुल, पहले कहे गये स्रुक्-स्रुवादि जो होम के उपकरण हैं वे सभी बृहत्पात्र से युक्त पक्ष्मक पर्यन्त सभी वस्तुयें तथा स्थण्डिला- र्चन के लिये पूर्वोक्त कहे गये पदार्थों में जो-जो उपयोग में आते हों उन्हें अच्छी तरह से समझ कर यागगृह में प्रवेश करावे ॥ ४३-४८ ॥ अनुग्रहधियाऽऽचार्यो भक्तानां भविनां विभोः ॥ ४८ ॥ दिव्यभोगोपलिप्सूनां निःश्रेयसपदार्थिनाम् । प्रत्येकैकं हि यद् गाङ्गे वर्धयेद् द्रव्यमूर्त्तिना ॥ ४९ ॥ नित्येनाव्यक्ततत्त्वेन सन्मन्त्रब्रह्मणा सह । सार्थं सर्ष्यादिकं दद्यान्मन्त्रव्यूहं यथागमम् ॥ ५० ॥ फलदं स्यात् सकामानामकामानां हि मोक्षदम् । शिष्याणां बहुत्वे प्रत्येकं यागद्रव्याणा(मध्य ? मपि) वृद्धिमाह—अनुग्रहधियेति त्रिभिः ॥ ४८-५१ ॥ आचार्य भगवद् दीक्षा में प्रविष्ट होने वाले भक्तों की संख्या के अनुसार अनुग्रहपूर्वक याग द्रव्य में भी वृद्धि करावे, क्योंकि कुछ भक्त दिव्य भोगों को प्राप्त करना चाहते हैं । कुछ केवल निःश्रेयस (पारलौकिक कल्याण) चाहते हैं । अतः आचार्य हर एक के द्रव्य मूर्ति के द्वारा याग गङ्गा का अभिवर्धन करावे । तब नित्य अव्यक्त तत्त्व वाले, सन्मन्त्र स्वरूप वाले, ब्रह्म के साथ ऋषियों के सहित, शास्त्रीय विधि से उन्हें मन्त्रव्यूह प्रदान करे । ऐसा करने से ही वह मन्त्रव्यूह सकामों को फलदायी होता है तथा अकामों के लिये मोक्षदायी होता है ॥ ४८-५१ ॥ ससहायस्ततस्तत्र प्राग्वत् स्नात्वा कृताह्निकः ॥ ५१ ॥ सम्प्रविश्याप्यदिक्संस्थः प्राङ्मुखः प्रविशेत् ततः ।
अष्टादशः परिच्छेदः ४२५ पद्मासनादिना मार्गे चर्मण्याचामपूर्वकम् ॥ ५२ ॥ अथ स्नानाह्निकादिपूर्वकं स्वासनोपवेशनमाह—ससहाय इति । ससहायः सपरिचारक इत्यर्थः । मार्गे चर्मणि एणाजिन इत्यर्थः ॥ ५१-५२ ॥ परिचारक सहित आचार्य पूर्व की भाँति स्नान करे और अपना आह्निक कार्य करे । तदनन्तर पूर्वाभिमुख हो यागमण्डप में प्रवेश करे । फिर कृष्ण मृगचर्म पर पद्मासनादि से बैठे ॥ ५१-५२ ॥ कुर्याद् यदधिकारेण मन्त्रेणानुग्रहं शिशोः । तेनाङ्गसहितेनैव सर्वं कर्म समाचरेत् ॥ ५३ ॥ येन मन्त्रेण दीक्षा क्रियते, तेनैवाङ्गसहितेन सर्वकर्माचरणमाह— कुर्यादिति ॥ ५३ ॥ जिन भगवान् के मन्त्र अधिकार से शिष्य को दीक्षा देनी है, अङ्ग सहित सारा कर्म उसी मन्त्र दीक्षा के अनुसार करे ॥ ५३ ॥ समस्तैर्वैभवैर्मन्त्रैः कार्यो वाऽनुग्रहो यदि । सर्वाराधनदानार्थं वा द्विषट्काप्तये तदा ॥ ५४ ॥ विशाखयूपमन्त्रेण कुर्यात् तद्धारणाद्वयम् । तद्बीजेन तनुं व्याप्य प्राग्वत् तदभिमन्त्रितैः ॥ ५५ ॥ पुराहृतैर्यथाशक्ति मण्डलं च समाचरेत् । सर्वराधनादियोग्यतासिद्ध्यर्थं समस्तैरपि वैभवमन्त्रैर्युगपदेव दीक्षाप्रकरणे समस्तविभवदेवानामापि कारणभूतस्य विशाखयूपस्य मन्त्रेण दहनाप्यायनाख्यधारणा- द्वयात्मक भूतशुद्ध्यनुष्ठानं पूर्वोक्तेन विशाखयूपबीजेनैव स्वशरीरे व्यापकन्यासं तदभि- मन्त्रितैरेव सितादिरागैर्मण्डलपूरणं चाह—समस्तेति सार्द्धद्वाभ्याम् ॥ ५४-५६ ॥ यदि अनुग्रहपूर्वक समस्त वैभव मन्त्र की एक साथ ही दीक्षा देनी है । तब समस्त विभव देवों के कारणभूत 'विशाखयूप मन्त्र' से दहन एवं आप्यायन नामक दोनों धारणाओं से भूत शुद्धात्मक अनुष्ठान करे । फिर विशाखयूप के बीज से अपने शरीर में व्यापक न्यास सम्पादन कर उससे अभिमन्त्रित पहले लाए गए श्वेतचूर्ण आदि रंगों से मण्डल निर्माण करे ॥ ५४-५६ ॥ प्राक् समालभनैर्वस्त्रैः कटकाद्यङ्गुलीयकैः ॥ ५६ ॥ सितोष्णीषेण महता सितमाल्येन वै सह । मुखवासैः सताम्बूलैर्ललाटतिलकेन च ॥ ५७ ॥ कृत्वा शुभेन शारीरं योगपट्टेन संस्थितम् । आदौ स्वस्य गन्धाद्यलङ्करणादिकमाह—प्रागिति द्वाभ्याम् ॥ ५६-५८ ॥ सा० सं० - 31
४२६ सात्वतसंहिता अब स्वयं अलङ्कृत होने का उपकरण कहते हैं—आचार्य सर्वप्रथम समस्त समालभन वस्त्रों से, कटक एवं अँगूठियों से, श्वेत वस्त्र वाले उष्णीष (पगड़ी) से, बहुत बड़ी माला से, मुखावास ताम्बूलादि से और ललाट में तिलक से अपने शरीर को अलङ्कृत करे उसमें योगपट्ट बाँधे ॥ ५६-५८ ॥ हृत्पुण्डरीकमध्ये तु संन्यसेद् बीजमैश्वरम् ॥ ५८ ॥ करयोः पद्मनाभीयं ध्रुवाख्यमथ विग्रहे । शैषैरालभ्य पादान्तमामूर्ध्नश्चापि पूर्ववत् ॥ ५९ ॥ हस्तयोर्विग्रहे साङ्गं विन्यसेद् बीजमैश्वरम् । मुद्रावसानं कृत्वैवं सम्यक् तदनु चाहरेत् ॥ ६० ॥ पाणिभ्यां शङ्खचक्रे द्वे स्वमन्त्रेणाभिमन्त्रिते । भूत्वा तदात्मना पश्चात्ते निधाय धरातले ॥ ६१ ॥ अवलोक्याखिलं तत्स्थं प्रवर्तेताथ कर्मणि । हृदये विशाखयूपबीजन्यासं करयोः पद्मनाभबीजन्यासं शरीरे ध्रुवबीजन्यास- मवशिष्टैरनन्तादिषट्त्रिंशद्बीजैरामूर्ध्नः पादान्तमभिमर्शनं पुनर्हस्तयोर्विग्रहे च विशाख- यूपबीजेन षडङ्गन्यासं विभवमुद्रादर्शनं हस्ताभ्यां शङ्खचक्रादानं तन्मन्त्राभ्यां तयोरभि- मन्त्रणं स्वस्य तादात्म्यावलम्बनादिकमखिलसम्भाराणामपि चक्रशङ्खान्तर्गतत्वेनाव- लोकनपूर्वकं कर्मप्रारम्भं चाह—हृत्पुण्डरीकेति चतुर्भिः ॥ ५८-६२ ॥ तदनन्तर अपने हृत्पुण्डरीक मध्य में नृसिंह बीज से न्यास करे । हृदय में विशाखयूप न्यास, दोनों हाथों में पद्मनाभ बीज न्यास, शरीर में ध्रुव बीज न्यास, अवशिष्ट अनन्तादि ३६ बीजों से शिरःप्रदेश से लेकर पादान्त न्यास, फिर दोनों हाथों तथा शरीर में विशाखयूप बीज मन्त्र से न्यास करे । तदनन्तर षडङ्गन्यास एवं विभवमुद्रा का प्रदर्शन करे, दोनों हाथों में शङ्ख एवं चक्र ग्रहण करे, तन्मात्र मन्त्र से उनका अभिमन्त्रण करे । फिर साधक अपने तथा यज्ञीय संभारों को शङ्ख एवं चक्र के तादात्म्य की भावना करते हुए उनका अवलोकनपूर्वक कर्म प्रारम्भ करे ॥ ५८-६२ ॥ यागगेहशोधनालङ्करणकथनम् अस्त्राभिमन्त्रितं कृत्वा कर्म भृङ्गान्तरे स्थितम् ॥ ६२ ॥ तेनोपलिप्य सम्मार्ज्य यागस्थानं निघृष्य च । तद्ब्रह्माख्यावधौ भूयस्तेजसो हि विवृद्धये ॥ ६३ ॥ हेमपूर्वाणि रत्नानि बीजानि विनिवेश्य च । यागगेहशोधनालङ्करणमाह—अस्त्राभिमन्त्रितमिति द्वाभ्याम् ॥ ६२-६४ ॥ अब यागगेह की शोभा के लिये अलङ्कार कहते हैं—भृङ्गान्तर में स्थित
अष्टादशः परिच्छेदः ४२७ समस्त कर्म को अस्त्र से अभिमन्त्रित कर उससे यागगेह का मार्जन कर उपलेपन करे। उसे ब्रह्मावधि पर्यन्त पुनः तेज की वृद्धि के लिये सुवर्णपूर्वक रत्न तथा बीज सन्निविष्ट करे ॥ ६२-६४ ॥ गालितेनाम्भसाऽऽपूर्य ततः पात्रचतुष्टयम् ॥ ६४ ॥ एकस्मिन् चन्दनादीनि पूर्वं सिद्धार्थकानि च । साक्षतानि कुशाग्राणि तण्डुलानि तिलांस्तु वै ॥ ६५ ॥ सरत्नानुत्तमान् धातून् सफ़लान् विनिवेशयेत् । द्वितीये दधिमध्वाज्यक्षीरबिन्दुचतुष्टयम् ॥ ६६ ॥ कुशाग्रेण सबाहीकं सपुष्पं तिलतण्डुलम् । दूर्वा सविष्णुक्रान्तां च श्यामाकं शङ्खपुष्पिकाम् ॥ ६७ ॥ पद्मकं च तृतीये तु कुन्दरेणुसमन्वितम् । त्वगेलाद्यचयं सर्वं सकर्पूरं च चन्दनम् ॥ ६८ ॥ विनिक्षिप्य चतुर्थे तु द्रव्यं सर्वमिदं शुभम् । हृन्मन्त्रेण चतुर्णां तु कुर्याद् वै द्रव्ययोजनम् ॥ ६९ ॥ सास्त्रेण मूलमन्त्रेण सर्वं तच्चाभिमन्त्र्य तु । सषडङ्गेन तेनैव कुर्यात् पुष्पादिनाऽर्चनम् ॥ ७० ॥ यथाक्रमेण सर्वेषां ध्येयं सर्वं सुधोपमम् । अर्ध्यादिपरिकल्पनक्रममाह—गालितेनेत्यादिभिः । पात्रचतुष्टयम् अर्ध्याद्वितीया- र्घ्यपाद्याचमनपात्रचतुष्टयमित्यर्थः । एकस्मिन् प्रधानार्घ्ये । चन्दनादीनीत्यत्रादिपदेन कर्पूरकुङ्कुमे ग्राह्ये, "चन्दनं शशिबाहीकौ" (६।४२) इति पारमेश्वरे विवृतत्वात् । सिद्धार्थकं = श्वेतसर्षपः । साक्षतानि = शोभनाक्षतसहितानि । पारमेश्वरव्याख्याने तु क्षतरहितानीति कुशाग्रविशेषणं कृतम् । उत्तमान् धातून् सुवर्णरजतताम्रान् । तथा विवृतं पारमेश्वरे—"काञ्चनं रजतं ताम्रम्" (६।४३) इति । सफलान् कदल्यादि- फलान्वितानित्यर्थः । तथा च परमेश्वरे—"कदलीफलपूर्वाणि प्रधानार्घ्ये विनिक्षिपेत्" (६।४३) इति । सबाहीकं सकुङ्कुमम् । विष्णुक्रान्ता प्रसिद्धा । श्यामाकः = मुनिप्रियः । श्याम अरिशि, "श्यामाको नीलपुष्पः स्यात् स्मयाकश्च मुनिप्रियः" (३।८।५८) इति वैजयन्ती । शङ्खपुष्पं कर्णाटभाषायां विषप्रहरी । पद्मकं वैद्यग्रन्थे प्रसिद्धम् । कुन्दरेणुः कुन्देन सहिता रेणुः, कुन्दो नाम वालुक्याख्यस्तृणविशेषः । "वालुकं चाथ वालुक्यं मुकुन्दः कुन्दकुन्दरू" (अ० २।४।१२१) इति नैघण्टुकाः । कर्णाटभाषायां कर्णिकेय हल्लु । रेणुर्नाम रेणुका, तथैव प्रसिद्धो गन्धद्रव्यविशेषः । "हरेणु रेणुका कौन्ती" (२।४।१२०) इत्यमरः । अथवा "कुन्दरेण समन्वितः" इति पाठे कुन्दरः पूर्वोक्तः कुन्द एव । वस्तुतस्तु तथैव पाठः सरसः । पूर्वं सम्भा- रार्जनप्रकरणे "विष्णुक्रान्ता च कुन्दरम्" (१।८।२९) इति कुन्दमात्रस्योक्तत्वात्,
४२८ सात्वतसंहिता रेणुकाया अनुक्तत्वाच्च । त्वगेलाद्यचयं त्वग् लवङ्गः, ‘‘त्वक्पत्रमुत्कुटं भृङ्गम्’’ (२। ४।१३४) इत्यमरः । एला प्रसिद्धा । तदाद्यानां द्रव्याणां चयं समूहम् । अत्राद्यशब्देन तक्कोलजातिफले ग्राह्ये । तथोक्तं पारमेश्वरे—‘‘एलालवङ्गतक्कोलैः सह जाती- फलानि च’’ (६।६४) इति । एषामर्घ्यादीनां स्थाननियमादिकं षष्ठपरिच्छेदे (६।९- ९१) प्रदर्शितम् । दहनाप्यायनादिकं तु नृसिंहकल्पपरिच्छेदे (१७।१७-२७) प्रदर्शितम् । तत्सर्वं संग्रहेश्वरादिषु सुव्यक्तमुक्तं द्रष्टव्यम् ॥ ६४-७१ ॥ इसके बाद छाने हुए जल से चार घड़ा भर कर वहाँ प्रथम अर्घ्य पात्र, द्वितीय अर्घ्य पात्र, पाद्य पात्र और आचमन पात्र स्थापित करे । एक घट में चन्दनादि, सिद्धार्थकादि (श्वेत सर्षपादि), साक्षात् कुशाग्र, तण्डुल, तिल, सरल उत्तम धातु तथा कदली आदि फल डाल कर सन्निविष्ट करे । द्वितीय घट में दधि, मधु, घृत, दूध इन चार बिन्दुओं को कुशाग्र के साथ कुङ्कुम, पुष्प सहित तिल, तण्डुल, दूध विष्णुकान्ता, श्यामाक, शङ्खपुष्पी एवं पद्म डाल कर स्थापित करे । तृतीय घट में कुन्दरेणु समन्वित त्वक्, इलायची आदि, कपूर सहित चन्दन डालकर स्थापित करे । चतुर्थ घट में पहले कहे गये सभी द्रव्यों का समूह प्रक्षिप्त कर स्थापित करे । फिर अस्त्र सहित मूल मन्त्र से सभी का अभिमन्त्रण कर षडङ्ग सहित मन्त्र द्वारा पुष्पादि से उनका अर्चन करे । इस प्रकार क्रमशः सभी नैवेद्य वस्तुओं का अमृत के समान ध्यान करे ॥ ६३-७० ॥ आवाहने सन्निधाने सन्निरोधे तथार्चने ॥ ७१ ॥ विसर्जनेऽर्घ्यदानं तु प्राक्पात्रान्नित्यमाचरेत् । तदम्भसा चार्हणं तु तथैव परिषेचनम् ॥ ७२ ॥ कुर्यात् प्रणयनादानं प्रीणनं प्रीतिकर्म च । प्रधानार्घ्यस्य विनियोगमाह—आवाहन इति । प्रणयनादानं प्रणयनं पात्रान्तरे सेचनम्, तत्पूर्वकमादानं ग्रहणम् । तच्च ‘‘तर्पणं सम्प्रतिष्ठाप्य वासितं चार्घ्यवारिणा’’ (६।३७६) इति पारमेश्वराद्युक्तप्रकरणेषूपयुक्तं ज्ञेयम् ॥ ७१-७३ ॥ अब प्रथम कलश से प्रधान अर्घ्य का विनियोग कहते हैं—आवाहन, सन्निधान, सन्निरोध अर्चन एवं विसर्जन क्रिया में प्रथम पात्र से नित्य अर्घ्यदान देवे और उसी से पूजा करे तथा परिषेचन करे ॥ ७२ ॥ उसी पात्र से प्रणयन (पात्रान्तर का अभिषेचन) तथा आदान (जल ग्रहण) प्रीणन एवं प्रीतिकर्म करे ॥ ७३ ॥ द्वितीयार्घ्यपात्रविनियोगकथनम् प्रोक्षणं सर्ववस्तूनाम् अन्यस्मादुदकेन तु ॥ ७३ ॥ आरम्भे सर्वकार्याणां तत्समाप्तौ तथैव हि । न्यूनाधिकानां शान्त्यै तु ज्ञानव्यत्ययशान्तये ॥ ७४ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४२९ कार्यं तदर्घ्यदानं च नित्यं मन्त्रात्मना विभोः । कुम्भोपकुम्भकुण्डानां मन्त्रास्त्रकलशार्चने ॥ ७५ ॥ सम्पूजने च भूतानां गुर्वादीनां महामते । दक्षशिष्यात्मपूजार्थमुक्तानुक्तार्चनं प्रति ॥ ७६ ॥ द्वितीयार्घ्यविनियोगमाह—अन्यस्मादित्यारभ्योक्तानुक्तार्चनं प्रतीत्यन्तम् । न्यूना- धिकानां कार्याणामित्यनुषङ्गः । एवं च सर्वकार्येष्वपि समाहितस्यापि कर्मज्ञान- वैपरीत्याद् दोषः संभवत्येव । तच्छान्त्यर्थं सर्वकार्याणामारम्भेऽवसानं च भगवते सकृत् सकृत् समर्पणीयमिति भावः । कुम्भोपकुम्भकुण्डानां कुम्भस्य महाकुम्भस्य ये उपकुम्भास्तेषां कुण्डस्य चेत्यर्थः । यद्वा, कुम्भा महाकुम्भस्य प्रागादिषु स्थापिताः कलशाः, उपकुम्भाः, शान्तिकादिषूक्तप्रकारेण तदुपरि स्थापिताः कलशा इत्यर्थः । मन्त्रास्त्रकलशार्चने मन्त्राणामुपकुम्भेषु कुण्डमेखलास्थितकूर्चादिषु च संस्थितवासुदेवादिमन्त्राणामस्त्र- कलशस्य चार्चन इत्यर्थः । महाकुम्भस्थायार्घ्यदानं तु प्रधानार्घ्यजलेनैवैत ज्ञेयम् । भूतानां सम्पूजने कुमुदाद्यर्चन इत्यर्थः । "सम्पूजने च भोगानाम्" (६।१९५) इति पाठान्तरमुक्तं पारमेश्वरे, तथैव विवृतं तद्व्याख्याकारैरपि । गुर्वादीनामित्यत्र दक्षशिष्यात्मपूजार्थमित्यत्र च तत्तद्दिग्रहविन्यस्तमन्त्रार्चनविषयमिति बोध्यम् । उक्तानुक्तार्चनं प्रतीति संक्षेपेणोक्तम् । विशदीकृतमीश्वरपारमेश्वराभ्याम्— दक्षशिष्यात्मपूजार्थं द्वास्थानामर्चनं प्रति । प्रसादासनदेवानां गुरूणां सन्ततेस्तथा ॥ लाञ्छनाङ्गपरीवारशक्तिभूषणरूपिणाम् । मण्डलावरणस्थानां देवानां चाऽर्चने तथा ॥ मुद्राबन्धे कराभ्युक्षं तदर्चा क्षालनं तथा । जपकालेऽक्षसूत्रस्य कुर्यात् तत्क्षालनं तथा ॥ —(ई०सं० ३।९४-९६, पा०सं० ६।१९५-१९८) इति ॥ ७३-७६ ॥ अब द्वितीय अर्घ्यपात्र का विनियोग कहते हैं—सभी वस्तुओं का प्रोक्षण अन्य पात्र के जल से करे । सभी कार्यों के आरम्भ से उनकी समाप्ति पर्यन्त न्यूनाधिक दोषों की शान्ति के लिये तथा ज्ञान व्यत्यय की शान्ति के लिये साधक परमेश्वर को मन्त्र द्वारा दूसरे अर्घ्यपात्र से अर्घ्य देवे । कुम्भ, उपकुम्भ, कुण्ड तथा कलश के अर्चन में, सम्पूजन में, भूतों तथा गुरु आदि के पूजन में दक्ष शिष्य की आत्मपूजा में तथा उक्त-अनुक्त अर्चन में दूसरे अर्घ्य कलश के जल का उपयोग करना चाहिए ॥ ७३-७६ ॥ पाद्यदानं तृतीयात् तु नित्यं पात्रात् समाचरेत् ।
४३० सात्वतसंहिता चतुर्थात् तु यथाकालं दद्यादाचमनं ततः ॥ ७७ ॥ पाद्यविनियोगमाह—पाद्यदानमित्यर्थेन । आचमनविनियोगमाह—चतुर्थादित्यर्धेन ॥ ७७ ॥ तृतीय पात्र से नित्य पाद्यदान सम्पादन करे तथा चतुर्थ पात्र से समय आने पर आचमन देवे ॥ ७७ ॥ मुख्यार्घ्यवारिणा प्रोक्ष्य पृथग् भाण्डस्थितं पुरा । पञ्चगव्यं ततः प्राग्वत् कल्पनीयं हृदादिकैः ॥ ७८ ॥ कुशोदकं तदस्त्रेण दत्वाद्येनाभिमन्त्र्य च । मुख्यार्घ्यवारिणा पञ्चगव्यप्रोक्षणं तत्संयोजनं चाह—मुख्येति सार्धेन । आद्येन हृन्मन्त्रेणेत्यर्थः ॥ ७८-७९ ॥ तदनन्तर पृथक् भाण्ड में स्थित पञ्चगव्य को मुख्य (प्रथम) अर्घ्यपात्र के जल से पूर्ववत् आद्य हृन्मन्त्र से प्रोक्षण करे । फिर आद्य मन्त्र से अभिमन्त्रित कर अस्त्र मन्त्र से उस पञ्चगव्य पर कुशोदक छिड़के ॥ ७८ ॥ अथ पाणिद्वयेनैव अग्नीषोमात्मकेन च ॥ ७९ ॥ योग्यतापदवीं नीत्वा प्रोक्षयेद् यत् पुराहृतम् । साम्भसा तेन वै सर्वं विष्टराग्रगतैः कुशैः ॥ ८० ॥ सर्वोपकरणानां दहनाप्यायनमुद्राप्रदर्शनपूर्वकं पञ्चगव्यप्रोक्षणमाह—अथेति सार्धेन । तेन पञ्चगव्येनेत्यर्थः ॥ ७९-८० ॥ तदनन्तर उसी अर्घ्यपात्र के जल को अपने अग्नीषोमात्मक दोनों हाथ में लेकर जितनी वस्तुयें यज्ञ के लिये एकत्रित की गई हैं उन पर उसका छींटा देकर यज्ञ की योग्यता पदवी के योग्य बनावे । फिर पुनः उसी अर्घ्यपात्र के जल को विष्टराग्रगत कुशों से प्रोक्षित करे ॥ ७९-८० ॥ सर्वबीजानि धान्यानि सिद्धार्थकयुतान्यथ । कृत्वास्त्रपरिजप्तानि ध्यात्वा चास्त्रसमानि च ॥ ८१ ॥ विघ्नोपशान्तये वेगाद् दशदिक्षु विनिक्षिपेत् । संहृत्य बर्हिकूर्चेन प्राच्यां दिशि निधाय वै ॥ ८२ ॥ तद् गर्भीकृत्य संलिख्य हेतिराट् चन्दनादिना । विघ्नोपशमनार्थं दशदिक्ष्वस्त्राभिमन्त्रितबीजधान्यश्वेतसर्षपविक्षेपादिकमाह— सर्वबीजानीति सार्धद्वाभ्याम् । हेतिराड् = हेतिराजं चक्रमित्यर्थः । विभक्तिनियम- श्छान्दसः ॥ ८१-८३ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४३१
सभी बीज सिद्धार्थक युक्त सभी धान्यों को अस्त्र मन्त्र का ध्यान कर अस्त्र मन्त्र से जप कर उन्हें अस्त्र के समान बनावे ॥ ७९-८१ ॥ फिर विघ्न की शान्ति के लिये उन सिद्धार्थक युक्त धान्यों को दशों दिशाओं में वेग से प्रक्षिप्त करे । फिर उन धान्यों को कुशा के कूँचे से एकत्रित कर पूर्व दिशा में स्थापित करे और किसी वस्तु के भीतर रख देवे । तदनन्तर चन्दनादि द्वारा हेतिराट् चक्र लिखे ॥ ८१-८३ ॥ कुम्भमण्डलाग्निषु भगवदर्चनक्रमकथनम् करकं कुम्भसंयुक्तमलङ्कृत्य यथा पुरा ॥ ८३ ॥ भोगैः प्रावरणान्तैश्च मूर्तीभूतौ विचिन्त्य च । तद्देवताशरीरं तु पश्येदम्बरवच्छुभम् ॥ ८४ ॥ अथ कुम्भमण्डलाग्निषु भगवदर्चनक्रममाह—करकं कुम्भसंयुक्तमित्यारभ्य प्राग्वत् कुम्भेऽथ पूजित इत्यन्तम् । यथापुरमलङ्कृत्य, "प्राप्तानुज्ञोऽथ कलशमादाय शुभलक्षणम्" (१७।५७) इत्यादिसप्तदशपरिच्छेदोक्तप्रकारेणालङ्कृत्येत्यर्थः एव- मेवोक्तं जयाख्येऽपि दीक्षापटले— अथादाय दृढं शुभमेकरूपं च निर्व्रणम् ॥ कलशं मृण्मयं रम्यं सौवर्णं वाऽथ राजतम् । रत्नहाटकसद्गन्धपुष्पसर्वौषधीयुतम् ॥ शुभपादपशाखाढ्यं पट्टसूत्रकण्ठभूषणम् । गालितोदकसम्पूर्णं वारिधारान्वितं शुभम् ॥ चन्दनाद्युपलिप्तं च परितश्चार्घ्यचर्चितम् । (१६।९५-९८) इति । प्रावरणान्तैर्भोगैर्वस्त्रान्तैरुपचारैरित्यर्थः । मूर्तीभूतौ विचिन्त्य कुम्भकरकौ मन्त्रनाथसुदर्शनयोः शरीरत्वेन ध्यात्वेत्यर्थः, "तद्देवताशरीरं तु पश्येदमलवर्चसम्" (ई०सं ११।१९५, पा०सं० १२।२२४) इतीश्वरपारमेश्वरोक्तेः । विचिन्त्य चेत्यत्र चकारेण पूर्वं महाकुम्भमध्ये भगवदर्चनमपि सूचितं भवति । अन्यथा— "इदमभ्यर्थयेद् देवं सास्त्रं बद्धाञ्जलिस्थितः" (१८।८७) इत्युक्तिविरोधात् । तथा चेश्वरपारमेश्वरयोः— कुम्भमध्ये विभोः प्राग्वदासनं परिकल्प्य च ॥ तन्मध्ये पुण्डरीकाक्षं समावाह्य विधानतः । सन्निधिं सन्निरोधादि भोगयागावसानकम् ॥ पूर्ववत् सकलं कृत्वा तस्य दक्षिणदिग्गतम् । अस्त्रविग्रहरूपं च ध्यात्वाऽभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ध्वंसयन्तं च विघ्नानां जालं कर्मावसानकम् । इति । —(ई०सं० ११।१९८-१२१, पा०सं० १२।२२७-२२९) जयाख्ये (१६।१०२) ईशानदिशि महाकुम्भस्थापनमुक्तम् । अतस्त्वेतत्पक्ष-
४३२ सात्वतसंहिता द्वयमपीश्वरपारमेश्वरयोर्महोत्सवप्रकरणे पवित्रोत्सवप्रकरणे च प्रदर्शितम्— प्रादक्षिण्येन प्राग्भागात् तत्पादान्तं च तत् स्मरेत्॥ अथवेशानदिग्भागात् तत्पादान्तं द्विजोत्तमाः। इति। (ई०सं० ११।१२४-१२५, पा०सं० १२।२३२) अत्र तन्निधायाथ कुम्भेन सह कुर्यात् प्रदक्षिणमिति पूर्वं प्रादक्षिण्येन कनक- धारया भित्तिसेचनानन्तरं महाकुम्भस्य प्रादक्षिण्येन भ्रामणमुक्तम्, जयाख्ये तु करक- कुम्भयोर्युगपदपि प्रदक्षिणमुक्तम्— "पृष्ठतः कलशो भ्राम्यस्तुल्यकालं तु वा पृथक्" (१६।१०१) इति। अत्र महाकुम्भार्चनानन्तरं तोरणध्वजाद्यर्चनोक्तावपि पूर्वोत्तर- संगत्यनुसारादीश्वराद्युपबृंहणानुसारान्च महाकुम्भार्चनात् पूर्वमेव तत्कार्यम्। किञ्च, महाकुम्भार्चनं मण्डलार्चनस्यप्युपलक्षणं बोध्यम्। यतः— "पुराहृतैर्यथाशक्ति मण्डलं च समाचरेत्" (१८।५६) इति मण्डललेखनमुक्तम्। उत्तरत्रापि— "स्थण्डिले कल- शाग्नौ च विनियुज्य यथाविधि" (१८।११०) इति कुम्भमण्डलाग्नीनां हविर्विभागं च वक्ष्यति॥ ८३-९५॥ फिर कुम्भ युक्त करवा को पहले की भाँति अलङ्कृत करे। फिर उसमें प्रावरणान्त सभी भोगों के मूर्तीभूत (प्रत्यक्ष साक्षात्) की कल्पना करे। उसमें आकाश के समान निर्विकार देवता शरीर का दर्शन करे ॥ ८३-८४ ॥ विशाखयूपं तन्मध्ये समावाह्य यजेत् ततः। क्रमान्मुद्रावसानं तु तस्य दक्षिणदिग्गतम्॥ ८५ ॥ तदनन्तर उसके मध्य में विशाखयूप का आवाहन कर मुद्रा दर्शन पर्यन्त उनकी पूजा करे, प्रदक्षिणा करे ॥ ८५ ॥ अस्त्रविग्रहरूपं च स्मृत्वा कुरबकं तु तत्। अस्त्रमन्त्रं तु तन्मध्ये ध्यात्वाऽभ्यर्च्य यथाविधि ॥ ८६ ॥ ध्वंसयन्तं च विघ्नानां कालं कर्मविसानकम्। इदमभ्यर्थयेद् विद्वान् सास्त्रो बद्धाञ्जलिस्थितः ॥ ८७ ॥ यागालयं हि विश्वेश गृहाण रचितं मया। आ समाप्तेर्भज विभो क्रियाङ्गानां च सन्निधिम् ॥ ८८ ॥ फिर उसे कुम्भ युक्त करके अस्त्र को विग्रह के रूप में ध्यान करे और यथाविधि अर्चन करे। जो कर्म के अन्त काल तक विघ्न समूहों का ध्वंस करने वाले हैं, उन भगवान् विशाखयूप से अस्त्र मन्त्र पढ़ते हुए यह प्रार्थना करे— हे विश्वेश्वर! मैंने इस यागालय का निर्माण किया है, आप इसे ग्रहण कीजिये और हे प्रभो ! जब तक यह यज्ञ समाप्त नहीं होता, तब तक आप इस यज्ञ के क्रिया कलाप के सन्निधान में निवास करें ॥ ८६-८८ ॥ ततोऽस्त्रोदकधरां चाप्यच्छिन्नां भित्तिकां नयेत्।
अष्टादशः परिच्छेदः ४३३ प्रादक्षिण्येन प्राग्भागात् तत्पदान्तं च संस्मरेत् ॥ ८९ ॥ तन्निधायाऽथ कुम्भेन सह कुर्यात् प्रदक्षिणम् । अर्घ्यदानं तयोः कृत्वा प्राग्भागे चाधरोर्ध्वगम् ॥ ९० ॥ पूजितं वाससाच्छन्नं चक्रमन्त्राभिमन्त्रितम् । निदध्याद् भद्रपीठं तु तत्राधारगतं न्यसेत् ॥ ९१ ॥ फिर यज्ञ मण्डप की भित्तिका (= दीवार) पर अविच्छिन्न अस्त्रोदक की धारा पूर्व दिशा से आरम्भ कर प्रदक्षिणा क्रम से भित्ति के अन्त तक उसका सेचन करे । फिर करक को वहीं रख देवे और कुम्भ के साथ उस करक की प्रदक्षिणा करे । फिर उन दोनों के पूर्व अधः और ऊर्ध्वभाग में अर्घ्य दान कर चक्र मन्त्र से अभिमन्त्रित वस्त्र द्वारा उनकी पूजा करे । फिर वहाँ आधारगत भद्रपीठ स्थापित कर उसका न्यास करे ॥ ८९-९१ ॥ सास्त्रं हि मन्त्रकलशमर्चयित्वा प्रणम्य च । दिगीश्वरगणं दिक्षु पूर्वोक्तं विन्यसेत् ततः ॥ ९२ ॥ तदनन्तर अस्त्र मन्त्र सहित उस कलश का अर्चन कर प्रणाम करे । उसके आठो दिशाओं में पूर्वोक्त दिगीश्वर गणों का न्यास करे ॥ ९२ ॥ ततः समर्चनं तेषां कृत्वाऽस्त्रेण हृदा सह । प्रणवेन स्वनाम्ना च नमस्कारानुगेन वै ॥ ९३ ॥ तोरणध्वजपूर्वाणां कार्यमर्घ्यादिनार्चनम् । ततो हवनभूमध्ये ध्यात्वा पीठं पुरोदितम् ॥ ९४ ॥ तत्रार्चनं विभोः कुर्यात् पूर्वोक्तेन क्रमेण तु । पूर्णान्तं तर्पणं कुर्यात् प्राग्वत् कुण्डेऽथ पूजिते ॥ ९५ ॥ फिर 'नमः' शब्द के साथ अस्त्रमन्त्र से तथा प्रणवपूर्वक अपने नाम को नमस्कार से युक्त कर उससे भी अर्चन करे । मण्डल स्थित तोरण एवं ध्वज का भी अर्घ्यादि द्वारा पूजन करे । हवन की भूमि में पधराये गये पीठ पर पूर्वोक्त क्रम से विभु भगवान् का पूजन करे । तदनन्तर कुण्ड के पूजनोपरान्त पूर्णाहुति के अन्त में तर्पण करे ॥ ९२-९५ ॥ भगवद्भूतबलिदानकथनम् ततस्तु भगवद्भूतान् क्षेत्रनाथसमन्वितान् । अर्घ्यपुष्पादिनाऽभ्यर्च्य बलिमादाय पात्रगम् ॥ ९६ ॥ इदमुक्त्वा च तदनु क्षिपेद् यागगृहाद् बहिः । ये विष्णुभाविनो भूता ये च तेष्वनुयायिनः ॥ ९७ ॥
४३४ सात्वतसंहिता आहरन्तु बलिं तुष्टाः प्रयच्छन्तु शुभं मम। प्रक्षालिताङ्घ्रिस्त्वाचान्तः संविशेद् यागमन्दिरम्॥९८॥ अथ भगवद्भूतबलिदानमाह—तत इति त्रिभिः ॥ ९६-९८ ॥ इसके बाद क्षेत्रपाल सहित भगवद् भूतों की अर्घ्य पुष्पादि द्वारा अर्चन कर पात्र में बलि लेकर 'ये विष्णु' आदि श्लोक मन्त्र कहकर (द्र. ९७) उस बलि को यागगृह से बाहर फेंक देवे। जो भविष्य में विष्णु के भावी भूत हैं और जो इस समय उनके अनुयायी हैं। वे सभी प्रसन्न होकर इस बलि को ग्रहण करें और हमारा कल्याण करें। इस प्रकार बलि देने के उपरान्त साधक हाथ-पैर धोकर आचमन कर यागमन्दिर में प्रवेश करे ॥ ९६-९८ ॥ हविःपाकविधानम् अग्निगेहेऽथ संस्कृत्य चुल्लीं प्राग्दिश्यवस्थिताम्। पचनालयमुत्सृज्य स्वदेशात् कुण्डमध्यगाम् ॥ ९९ ॥ स्थालीं चास्त्रेण संक्षाल्य बाह्यतो गोमयेन तु। विलिप्यान्तः सुगन्धैस्तु प्रताप्य ज्वलितैः कुशैः ॥ १०० ॥ हविःपाकविधानं तद्विभागनिवेदनादिक्रमं चाह—अग्निगेहेऽथ संस्कृत्येत्यारभ्य पूर्णया पुनरेव हीत्यन्तम्। ईशाब्जनाभरुद्धेन ईशः पूर्वोक्तो विशाखयूपः, अब्जनाभः = पद्मनाभः, ताभ्यां रुद्धेन तद्बीजाभ्यां सम्पुटितेनेत्यर्थः। हंसार्णेन = हकारेणेत्यर्थः। तद्वद् ईशाब्जनाभबीजवत् स्थिताभ्यां वौषड्वषट्काराभ्यां प्रणवाभ्यां च संरुद्धे- नेत्यनुषङ्गः। सात्वतामृते तु व्यापकमन्त्रदीक्षाप्रकरणादेतन्मन्त्रस्थाने मूलमन्त्र एव प्रतिपादितः ॥ ९९-१११ ॥ अब हविःपात्र का विधान तथा तद् विभाग निवेदनादि क्रम कहते हैं— अग्निगेह में पूर्व दिशा में रहने वाली चुल्ली का संस्कार करे। अपने स्थान भूत पचनालय (रसोई घर) को छोड़कर कुण्ड के मध्य में रहने वाली स्थाली (बटुई) को भीतर से अस्त्र मन्त्र से प्रक्षालन करे। उसके बाहर वाले भाग को गोमय से विलेपन करे। फिर उसके भीतरी भाग को जलते हुए कुशा से तथा सुगन्धित द्रव्यों से प्रतप्त करे ॥ ९९-१०० ॥ सन्ताड्य कुसुमास्त्रेण सितसूत्रेण कण्ठतः। चतुर्धा वर्मजप्तेन संवेष्ट्यार्घ्यादिणार्च्य च॥१०१॥ चुल्ल्यां कृत्वा समारोप्य तस्यां मधु घृतं पयः। परिशुद्धे शृते क्षीरे त्वस्त्रेणारोप्य तण्डुलान्॥१०२॥ चालयेन्मूलमन्त्रेण दृष्ट्वा नेत्रेण संस्कृतम्। हृदावतार्याभिघार्य शिखामन्त्रेण घट्टयेत् ॥ १०३ ॥
अष्टादशः परिच्छेदः ४३५ फिर उसे कुसुमास्त्र से सन्ताडित करे। तदनन्तर कवच मन्त्र का जप कर उसके कण्ठ में चार बार सफेद सूत्र लपेटे। फिर अर्घ्यादि से उसकी पूजा करे। फिर चुल्ली पर उस बटुई को चढ़ावे। उसमें मधु, घृत और दूध डाले। जब दूध अच्छी तरह पक जावे तब अस्त्रमन्त्र से उसमें चावल छोड़े। मूल मन्त्र पढ़कर उसे चलावे। तब उसे अपनी आँखों से सुसंस्कृत (पका हुआ) देखकर हृन्मन्त्र से नीचे उतारे, फिर अभिघार्थ शिखामन्त्र से अच्छी तरह घोंटे ॥ १०१-१०३ ॥ शिरसालिप्य संक्षाल्य सुप्रसन्नेन वारिणा। भूतिना चन्दनाद्येन भूषयेदूर्ध्वपुण्ड्रकैः ॥ १०४ ॥ फिर शुद्ध जल शिरोभाग पर छिड़क कर उसका प्रक्षालन करे। भूति, चन्दनादि से तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र से उसे भूषित करे ॥ १०४ ॥ विष्टरोपरि चान्यत्र निदध्यान्मण्डलान्तरे। होमं तत्सिद्धये कृत्वा पूर्णान्तमथ वै चरोः ॥ १०५ ॥ आधारदानमाज्येन कुर्यात् तेजोमृतात्मकम्। ईशाब्जनाभरुद्धेन हंसार्णेन सबिन्दुना ॥ १०६ ॥ तद्वद् वौषड्वषट्कारप्रणवद्वितयेन च। यतोऽविनाभाविनोऽत्र स्थितिर्द्वाभ्यां च साम्प्रतम् ॥ १०७ ॥ तदनन्तर अन्यत्र दूसरे मण्डल के विष्टर पर उसे स्थापित करे। फिर उस चरु की सिद्धि के लिये उसके आदि और अन्त का भाग होम कर परीक्षित करे। तदनन्तर घी के आधार का दान कर उसे अमृतात्मक तेज से संवर्धित करे। यह कार्य विशाखयूप के बीज तथा पद्मनाभ के बीज से सम्पुटित हंसमन्त्र (सोऽहं) से करना चाहिए। इसी प्रकार वौषट् वषट् मन्त्र से सम्पुटित प्रणव मन्त्र से भी करना चाहिए। दोनों की अविनाभाव से संस्थिति रहती है क्योंकि वे एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते ॥ १०४-१०७ ॥ अतः पुरोदितेनैव तदन्नं सम्पुटेन च। अ(थ?ध) ऊर्ध्वे च संच्छन्नं स्मरेदादाय वै हृदि ॥ १०८ ॥ अतः पूर्व में कही गई विधि के अनुसार सम्पुटित उस अन्न को नीचे से ऊपर तक ढक कर उसे हाथ में लेकर साधक हृदय से लगावे तथा भगवत् स्मरण करे ॥ १०८ ॥ द्रव्यसम्पातहोमेऽथ पूर्णान्ते तु कृते सति। उद्धृत्याहुतियोगेन पात्रत्रयगतं तु तत् ॥ १०९ ॥
४३६ सात्वतसंहिता तदनन्तर द्रव्य-सम्पात होम तथा पूर्णाहुति करने के बाद आहुति के अनुसार उस चरु को तीन पात्र में स्थापित करे ॥ १०९ ॥ स्थण्डिले कलशेऽग्नौ च विनियुज्य यथाविधि । तदाद्यभावितं शेषं कुशाक्रान्तं विघट्य च ॥ ११० ॥ प्रथम भाग स्थण्डिल, दूसरा कलश और तीसरा भाग अग्नि के लिये यथाविधि स्थापित करे । शेष आद्यभावित उस चरु को कुशा डाल कर उससे अच्छी तरह चरु का विलोडन करे ॥ १०९-११० ॥ क्रमान्मूलास्त्रनेत्रेण जुहुयाच्च शतत्रयम् । नीत्वा सम्पूर्णभावं च पूर्णया पुनरेव हि ॥ १११ ॥ फिर क्रमशः मूल सहित अस्त्र मन्त्र से तीन सौ आहुति देवे । इस प्रकार सम्पूर्ण चरु का हवन कर पूर्णाहुति करे ॥ १११ ॥ ततश्चोत्तरदिक् कुर्यान्मण्डलं गोमयादिना । प्राक्प्रान्तं विष्टरं तत्र दद्याद् दर्भं हृदन्तरे ॥ ११२ ॥ तन्मध्ये विन्यसेच्छिष्यं समाङ्घ्रिं स्तब्धविग्रहम् । प्राङ्मुखं यतवाक्चित्तवृत्तिरूपं धृताञ्जलिम् ॥ ११३ ॥ अथ शिष्यस्य विष्टरोपरि स्थापनं प्रोक्षणं सिद्धार्थतिलैस्ताडनं कुशाग्रेण तद्वि- ग्रहोल्लेखनं मन्त्रव्याप्ति नेत्रबन्धं पुष्पाञ्जलिप्रक्षेपणामच्युतकरेणालभनं मण्डलार्चनं तत्पुरतः पृथिव्यादिभूतसप्तकस्य तदधीशमन्त्रसंघस्य च पूजनमग्निसन्निधौ शिष्येण सहोपवेशनं शिष्यस्य कर्मवासनाविश्लेषसिद्ध्यर्थं होमं सम्पातस्पर्शं विज्ञापनं प्रायश्चित्त- होमं शिष्यस्य सूत्रात्मकशरीरकल्पनं गुल्फादिषु पृथिव्यादिव्याप्तिक्रमं पृथिव्यादिषु भुवनाध्वादीनां संस्थितिं पातालशयनादीनामवस्थानं तत्र विभवव्यूहपरमन्त्रदीक्षाभेदेन पृथिव्यादिभूतसप्तकविन्यासभेदं पुनः कुम्भार्चनं शिष्यस्य पञ्चगव्यप्राशनं चरुभोजनं दन्तधावनं तत्काष्ठपतन परीक्षां तच्छान्तिं मण्डलस्थस्य देवस्य कुम्भादौ विसर्जनं स्वप्नलाभाय शिष्यस्य शयनं तत्परितो रक्षाकरणम् आचार्यस्यापि दन्तधावनादिकं भगवत्प्रार्थनापूर्वकं प्रस्वापं चाह—ततश्चोत्तरदिक् कुर्यान्मण्डलं गोमयादिनेत्यारभ्य यावत्परिच्छेदपरिसमाप्ति । विश्वरूपाद्यं क्ष्माधरान्तं षट्कं विश्वरूपवागीशखगानन- नृसिंहसरश्शायिवराहाख्यदेवताषट्कमित्यर्थः । मधुसूदनपर्यन्तं पातालशयनादथ ॥ सप्तकं सप्तकं षटकं सम्पश्येत्क्ष्मादिपञ्चके । मनस्यवस्थितं ह्येवं शक्तीशात् त्रितयं हि यत् ॥ बुद्धौ कमलनाभात्मा देवः सर्वेश्वरः प्रभुः । (१८।१९६-१९८) इत्यस्यार्थः—पातालशयनमारभ्य पद्मनाभान्तमष्टत्रिंशद्विभवदेवेषु पाताल- शयनादिसप्तकं क्ष्मातत्त्वे, नारायणादिसप्तकमप्तत्त्वे, लोकनाथादिसप्तकं तेजस्तत्त्वे,