भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

४२४ सात्वतसंहिता शुष्कगोमयसंयुक्तामरणं चाग्निजं मणिम्। पालाशदूर्वासमिधः साग्राः परिधयस्तु वै॥ ४५ ॥ प्रभूतमिन्धनं शुष्कमाज्याक्तं तिलतण्डुलम्। प्रागुक्तं स्रुकस्रुवाद्यं च होमोपकरणं च यत्॥ ४६ ॥ सर्वं पक्ष्मकपर्यन्तं बृहत्पात्रद्वयान्वितम्। पूर्वोक्तानां च भोगानां मध्याद् यः स्थण्डिलार्चने॥ ४७ ॥ संयाति चाङ्गभावं तद् ज्ञात्वा सर्वं प्रवेशयेत्। साधार कलश, स्थाली (बटुई), कमण्डल, कलछुल, ढाँकने वाला पात्र, चूल्ही, चार कोणों वाला लम्बा, नवीन, चतुष्पाद, भद्रपीठ मात्रा वित्त (मुद्गादि) जो ताम्बूल सहित हो, दन्त धावन समूह, शुष्क गोमय संयुक्त अरणि, अग्निजन्य मणि पालाश, दूर्वा, समिधायें जो अग्रभाग से युक्त हो, परिधियाँ, पर्याप्त इन्धन, घी में डुबोये गये शुष्क तिल, तण्डुल, पहले कहे गये स्रुक्-स्रुवादि जो होम के उपकरण हैं वे सभी बृहत्पात्र से युक्त पक्ष्मक पर्यन्त सभी वस्तुयें तथा स्थण्डिला- र्चन के लिये पूर्वोक्त कहे गये पदार्थों में जो-जो उपयोग में आते हों उन्हें अच्छी तरह से समझ कर यागगृह में प्रवेश करावे ॥ ४३-४८ ॥ अनुग्रहधियाऽऽचार्यो भक्तानां भविनां विभोः ॥ ४८ ॥ दिव्यभोगोपलिप्सूनां निःश्रेयसपदार्थिनाम् । प्रत्येकैकं हि यद् गाङ्गे वर्धयेद् द्रव्यमूर्त्तिना ॥ ४९ ॥ नित्येनाव्यक्ततत्त्वेन सन्मन्त्रब्रह्मणा सह । सार्थं सर्ष्यादिकं दद्यान्मन्त्रव्यूहं यथागमम् ॥ ५० ॥ फलदं स्यात् सकामानामकामानां हि मोक्षदम् । शिष्याणां बहुत्वे प्रत्येकं यागद्रव्याणा(मध्य ? मपि) वृद्धिमाह—अनुग्रहधियेति त्रिभिः ॥ ४८-५१ ॥ आचार्य भगवद् दीक्षा में प्रविष्ट होने वाले भक्तों की संख्या के अनुसार अनुग्रहपूर्वक याग द्रव्य में भी वृद्धि करावे, क्योंकि कुछ भक्त दिव्य भोगों को प्राप्त करना चाहते हैं । कुछ केवल निःश्रेयस (पारलौकिक कल्याण) चाहते हैं । अतः आचार्य हर एक के द्रव्य मूर्ति के द्वारा याग गङ्गा का अभिवर्धन करावे । तब नित्य अव्यक्त तत्त्व वाले, सन्मन्त्र स्वरूप वाले, ब्रह्म के साथ ऋषियों के सहित, शास्त्रीय विधि से उन्हें मन्त्रव्यूह प्रदान करे । ऐसा करने से ही वह मन्त्रव्यूह सकामों को फलदायी होता है तथा अकामों के लिये मोक्षदायी होता है ॥ ४८-५१ ॥ ससहायस्ततस्तत्र प्राग्वत् स्नात्वा कृताह्निकः ॥ ५१ ॥ सम्प्रविश्याप्यदिक्संस्थः प्राङ्मुखः प्रविशेत् ततः ।

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