भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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अष्टादशः परिच्छेदः ४२३ पञ्चलोहमयं चक्रं सशङ्खं द्वादशारकम् ॥ ३५ ॥ कुतपं योगपट्टं च नेत्रवस्त्रं मृगाजिनम्। ब्रुसीकाशांशुकं पट्टं पादुके च उपानहौ ॥ ३६ ॥ दण्डं प्रतिग्रहं छत्रं पूर्णगोधूमकाष्ठकम्। चतुर्वर्णानि माल्यानि सुन्दरं पावनं लघु ॥ ३७ ॥ नीलशाद्वलसम्मिश्रं हरितं पत्रसञ्चयम्। गुग्गुलं मृष्टधूपं च दीपतैलं च वर्तयः ॥ ३८ ॥ दर्पणं धूपपात्रं च घण्टामर्घ्यादिपात्रकम्। रजांसि करणीयुग्मं पालिकां घटिकां सिताम् ॥ ३९ ॥ पञ्चाङ्गुलं तु सुदृढं हेमाद्यं कुशपञ्चकम्। अलक्तरञ्जितं सूत्रं सुसितं कर्तरी क्षुरम् ॥ ४० ॥ काण्डान्यष्टौ तु साग्राणि बर्हिपक्षान्वितानि च। प्रोन्नतानि स्थिराग्राणि लोहमृत्काष्ठजानि वा ॥ ४१ ॥ रञ्जितानि सुधाद्यैस्तु तदाधाराणि यानि च। कुल्लिकान्यम्बुकुम्भानि भृङ्गारं करवीं शुभाम् ॥ ४२ ॥ सुवर्ण से निर्मित पात्र अथवा कोमल पत्तों से निर्मित दोने आदि पात्र, श्वेत वर्ण के रेशमी, दो नवीन जो वस्त्र उत्तरीय सहित हों उन्हें, उपवीत, शुद्ध दो श्वेत धौत वस्त्र, कुशा निर्मित पवित्र, अंगूठी के सहित कङ्कण, स्फटिकमणि निर्मित अक्षसूत्र, पत्राक्ष, गणित्रक, पञ्चलोहमय चक्र, शङ्ख सहित द्वादशारक, कुतप योग पट्ट, नेत्र वस्त्र, मृगचर्म आसन, अंशुक, पट्ट, दो पादुका, दो उपानह, दण्ड, प्रतिग्रह, छत्र, पूर्णपात्र गेहूँ, काष्ठ, चार वर्ण वाली पुष्प माला, सुन्दर पावन लघु नीले शाद्वल से मिला हुआ हरित वर्ण के पत्र समूह, गुग्गुल, मृष्टधूप, दीपक, तेल, बत्तियाँ, दर्पण, धूपपात्र, घण्टा, अर्ध्यादि के पात्र, चूर्ण करणीयुग्म पालिका, श्वेत घटिका, पाँच अङ्गुल का सुदृढ़ हेम वर्ण का कुशपञ्चक, अलक्तक से रंगा हुआ सूत्र, श्वेत वर्ण की कैंची, छूरी, मोरपङ्ख से जुड़े अग्रभाग सहित आठ कुशा के काण्ड, अत्यन्त ऊँचे स्थिर अग्रभाग वाले पाँच की संख्या में लोहे, मिट्टी तथा काष्ठ निर्मित (पात्र) जो चूने आदि से रंगे हुए हों। उनके भी आधारपात्र, कुल्लिका, जल कुम्भ, भङ्गार एवं शुभ करवी प्रवेश कराए ॥ ३३-४२ ॥ अकालमूलनिर्गर्भं साधारं कलशं तथा। स्थालीं कमण्डलुं दर्वी तत्पिधानं तु चुल्लिकाम् ॥ ४३ ॥ भद्रपीठं चतुष्पादं चतुरश्रायतं नवम्। मात्रावित्तं सताम्बूलं दन्तधावनसञ्चयम् ॥ ४४ ॥

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