सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३४ सात्वतसंहिता आहरन्तु बलिं तुष्टाः प्रयच्छन्तु शुभं मम। प्रक्षालिताङ्घ्रिस्त्वाचान्तः संविशेद् यागमन्दिरम्॥९८॥ अथ भगवद्भूतबलिदानमाह—तत इति त्रिभिः ॥ ९६-९८ ॥ इसके बाद क्षेत्रपाल सहित भगवद् भूतों की अर्घ्य पुष्पादि द्वारा अर्चन कर पात्र में बलि लेकर 'ये विष्णु' आदि श्लोक मन्त्र कहकर (द्र. ९७) उस बलि को यागगृह से बाहर फेंक देवे। जो भविष्य में विष्णु के भावी भूत हैं और जो इस समय उनके अनुयायी हैं। वे सभी प्रसन्न होकर इस बलि को ग्रहण करें और हमारा कल्याण करें। इस प्रकार बलि देने के उपरान्त साधक हाथ-पैर धोकर आचमन कर यागमन्दिर में प्रवेश करे ॥ ९६-९८ ॥ हविःपाकविधानम् अग्निगेहेऽथ संस्कृत्य चुल्लीं प्राग्दिश्यवस्थिताम्। पचनालयमुत्सृज्य स्वदेशात् कुण्डमध्यगाम् ॥ ९९ ॥ स्थालीं चास्त्रेण संक्षाल्य बाह्यतो गोमयेन तु। विलिप्यान्तः सुगन्धैस्तु प्रताप्य ज्वलितैः कुशैः ॥ १०० ॥ हविःपाकविधानं तद्विभागनिवेदनादिक्रमं चाह—अग्निगेहेऽथ संस्कृत्येत्यारभ्य पूर्णया पुनरेव हीत्यन्तम्। ईशाब्जनाभरुद्धेन ईशः पूर्वोक्तो विशाखयूपः, अब्जनाभः = पद्मनाभः, ताभ्यां रुद्धेन तद्बीजाभ्यां सम्पुटितेनेत्यर्थः। हंसार्णेन = हकारेणेत्यर्थः। तद्वद् ईशाब्जनाभबीजवत् स्थिताभ्यां वौषड्वषट्काराभ्यां प्रणवाभ्यां च संरुद्धे- नेत्यनुषङ्गः। सात्वतामृते तु व्यापकमन्त्रदीक्षाप्रकरणादेतन्मन्त्रस्थाने मूलमन्त्र एव प्रतिपादितः ॥ ९९-१११ ॥ अब हविःपात्र का विधान तथा तद् विभाग निवेदनादि क्रम कहते हैं— अग्निगेह में पूर्व दिशा में रहने वाली चुल्ली का संस्कार करे। अपने स्थान भूत पचनालय (रसोई घर) को छोड़कर कुण्ड के मध्य में रहने वाली स्थाली (बटुई) को भीतर से अस्त्र मन्त्र से प्रक्षालन करे। उसके बाहर वाले भाग को गोमय से विलेपन करे। फिर उसके भीतरी भाग को जलते हुए कुशा से तथा सुगन्धित द्रव्यों से प्रतप्त करे ॥ ९९-१०० ॥ सन्ताड्य कुसुमास्त्रेण सितसूत्रेण कण्ठतः। चतुर्धा वर्मजप्तेन संवेष्ट्यार्घ्यादिणार्च्य च॥१०१॥ चुल्ल्यां कृत्वा समारोप्य तस्यां मधु घृतं पयः। परिशुद्धे शृते क्षीरे त्वस्त्रेणारोप्य तण्डुलान्॥१०२॥ चालयेन्मूलमन्त्रेण दृष्ट्वा नेत्रेण संस्कृतम्। हृदावतार्याभिघार्य शिखामन्त्रेण घट्टयेत् ॥ १०३ ॥