भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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अष्टादशः परिच्छेदः ४३३ प्रादक्षिण्येन प्राग्भागात् तत्पदान्तं च संस्मरेत् ॥ ८९ ॥ तन्निधायाऽथ कुम्भेन सह कुर्यात् प्रदक्षिणम् । अर्घ्यदानं तयोः कृत्वा प्राग्भागे चाधरोर्ध्वगम् ॥ ९० ॥ पूजितं वाससाच्छन्नं चक्रमन्त्राभिमन्त्रितम् । निदध्याद् भद्रपीठं तु तत्राधारगतं न्यसेत् ॥ ९१ ॥ फिर यज्ञ मण्डप की भित्तिका (= दीवार) पर अविच्छिन्न अस्त्रोदक की धारा पूर्व दिशा से आरम्भ कर प्रदक्षिणा क्रम से भित्ति के अन्त तक उसका सेचन करे । फिर करक को वहीं रख देवे और कुम्भ के साथ उस करक की प्रदक्षिणा करे । फिर उन दोनों के पूर्व अधः और ऊर्ध्वभाग में अर्घ्य दान कर चक्र मन्त्र से अभिमन्त्रित वस्त्र द्वारा उनकी पूजा करे । फिर वहाँ आधारगत भद्रपीठ स्थापित कर उसका न्यास करे ॥ ८९-९१ ॥ सास्त्रं हि मन्त्रकलशमर्चयित्वा प्रणम्य च । दिगीश्वरगणं दिक्षु पूर्वोक्तं विन्यसेत् ततः ॥ ९२ ॥ तदनन्तर अस्त्र मन्त्र सहित उस कलश का अर्चन कर प्रणाम करे । उसके आठो दिशाओं में पूर्वोक्त दिगीश्वर गणों का न्यास करे ॥ ९२ ॥ ततः समर्चनं तेषां कृत्वाऽस्त्रेण हृदा सह । प्रणवेन स्वनाम्ना च नमस्कारानुगेन वै ॥ ९३ ॥ तोरणध्वजपूर्वाणां कार्यमर्घ्यादिनार्चनम् । ततो हवनभूमध्ये ध्यात्वा पीठं पुरोदितम् ॥ ९४ ॥ तत्रार्चनं विभोः कुर्यात् पूर्वोक्तेन क्रमेण तु । पूर्णान्तं तर्पणं कुर्यात् प्राग्वत् कुण्डेऽथ पूजिते ॥ ९५ ॥ फिर 'नमः' शब्द के साथ अस्त्रमन्त्र से तथा प्रणवपूर्वक अपने नाम को नमस्कार से युक्त कर उससे भी अर्चन करे । मण्डल स्थित तोरण एवं ध्वज का भी अर्घ्यादि द्वारा पूजन करे । हवन की भूमि में पधराये गये पीठ पर पूर्वोक्त क्रम से विभु भगवान् का पूजन करे । तदनन्तर कुण्ड के पूजनोपरान्त पूर्णाहुति के अन्त में तर्पण करे ॥ ९२-९५ ॥ भगवद्भूतबलिदानकथनम् ततस्तु भगवद्भूतान् क्षेत्रनाथसमन्वितान् । अर्घ्यपुष्पादिनाऽभ्यर्च्य बलिमादाय पात्रगम् ॥ ९६ ॥ इदमुक्त्वा च तदनु क्षिपेद् यागगृहाद् बहिः । ये विष्णुभाविनो भूता ये च तेष्वनुयायिनः ॥ ९७ ॥

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