सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४३५ फिर उसे कुसुमास्त्र से सन्ताडित करे। तदनन्तर कवच मन्त्र का जप कर उसके कण्ठ में चार बार सफेद सूत्र लपेटे। फिर अर्घ्यादि से उसकी पूजा करे। फिर चुल्ली पर उस बटुई को चढ़ावे। उसमें मधु, घृत और दूध डाले। जब दूध अच्छी तरह पक जावे तब अस्त्रमन्त्र से उसमें चावल छोड़े। मूल मन्त्र पढ़कर उसे चलावे। तब उसे अपनी आँखों से सुसंस्कृत (पका हुआ) देखकर हृन्मन्त्र से नीचे उतारे, फिर अभिघार्थ शिखामन्त्र से अच्छी तरह घोंटे ॥ १०१-१०३ ॥ शिरसालिप्य संक्षाल्य सुप्रसन्नेन वारिणा। भूतिना चन्दनाद्येन भूषयेदूर्ध्वपुण्ड्रकैः ॥ १०४ ॥ फिर शुद्ध जल शिरोभाग पर छिड़क कर उसका प्रक्षालन करे। भूति, चन्दनादि से तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र से उसे भूषित करे ॥ १०४ ॥ विष्टरोपरि चान्यत्र निदध्यान्मण्डलान्तरे। होमं तत्सिद्धये कृत्वा पूर्णान्तमथ वै चरोः ॥ १०५ ॥ आधारदानमाज्येन कुर्यात् तेजोमृतात्मकम्। ईशाब्जनाभरुद्धेन हंसार्णेन सबिन्दुना ॥ १०६ ॥ तद्वद् वौषड्वषट्कारप्रणवद्वितयेन च। यतोऽविनाभाविनोऽत्र स्थितिर्द्वाभ्यां च साम्प्रतम् ॥ १०७ ॥ तदनन्तर अन्यत्र दूसरे मण्डल के विष्टर पर उसे स्थापित करे। फिर उस चरु की सिद्धि के लिये उसके आदि और अन्त का भाग होम कर परीक्षित करे। तदनन्तर घी के आधार का दान कर उसे अमृतात्मक तेज से संवर्धित करे। यह कार्य विशाखयूप के बीज तथा पद्मनाभ के बीज से सम्पुटित हंसमन्त्र (सोऽहं) से करना चाहिए। इसी प्रकार वौषट् वषट् मन्त्र से सम्पुटित प्रणव मन्त्र से भी करना चाहिए। दोनों की अविनाभाव से संस्थिति रहती है क्योंकि वे एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते ॥ १०४-१०७ ॥ अतः पुरोदितेनैव तदन्नं सम्पुटेन च। अ(थ?ध) ऊर्ध्वे च संच्छन्नं स्मरेदादाय वै हृदि ॥ १०८ ॥ अतः पूर्व में कही गई विधि के अनुसार सम्पुटित उस अन्न को नीचे से ऊपर तक ढक कर उसे हाथ में लेकर साधक हृदय से लगावे तथा भगवत् स्मरण करे ॥ १०८ ॥ द्रव्यसम्पातहोमेऽथ पूर्णान्ते तु कृते सति। उद्धृत्याहुतियोगेन पात्रत्रयगतं तु तत् ॥ १०९ ॥