सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० सात्वतसंहिता करे अथवा छिद्रों में छोटे-छोटे पत्थरों को डाल कर उसे कुटवा देवे । इस प्रकार समतल बनवा कर पञ्चगव्य से सींच देवे । हेमादि रत्नों से युक्त कर समतल बनाकर लेप करे । ऐसी भूमि अधिग्रहण कर सर्वप्रथम वहाँ भगवान् का अर्चन करे, पूर्ववत् अर्चन के बाद ध्यान करे ॥ १०-१२ ॥ भूतानां बलिदानं च सुरभीणां च तर्पणम् । द्विजानां दक्षिणात्तं वै ततस्तत्र समापयेत् ॥ १३ ॥ पञ्चमहाभूतों के लिये बलिदान देवे, गायों को सन्तृप्त करे । ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर फिर उसे अपने अधिकार (समाप्त) में करे ॥ १३ ॥ प्राग्दिक्षु सिद्धिपूर्वं तु मण्टपं मण्डनान्वितम् । सुस्तम्भाद्वितयेनैव कोणगेनोपशोभितम् ॥ १४ ॥ ऐसी भूमि के पूर्वभाग में सिद्धिपूर्वक सर्वाभूषणभूषित मण्डप का निर्माण करे । दो खम्भा गाड़े जो कोणों वाले हों ॥ १४ ॥ पार्थिवेन च पीठेन मध्यगेन विराजितम् । विस्तरात्तु द्विजातीनां शूद्रान्तानां समं स्मृतम् ॥ १५ ॥ अष्टाश्रमथवा वृत्तं तुर्याश्रं सोपपीठकम् । अष्टाङ्गुलात् समुत्सेधादेकापायेन लक्षितम् ॥ १६ ॥ मध्य में मिट्टी का पीठ निर्माण करे । विस्तार की दृष्टि से द्विजातियों से लेकर शूद्रान्त तक सम (बराबर) होना चाहिये । अथवा वह पीठ आठ कोणों का तथा वृत्त (गोला) निर्माण करे । जिसमें चार कोणों का उपपीठ हो । उसकी ऊँचाई आठ अङ्गुल से एक अङ्गुल कम लक्षित हो ॥ १५-१६ ॥ स्वोन्नत्यर्थेनोपपीठं सर्वेषां परिकल्पयेत् । विस्तारमुपपीठानां पीठोच्छ्रायाद् द्विसङ्गुणम् ॥ १७ ॥ उपपीठस्य संलग्ना तन्मानेन तु चोन्नता । आप्यदिक् साय्रहस्ता च सम्पाद्याऽऽसनपिण्डिका ॥ १८ ॥ नैवेद्यमुपपीठे तु विनिवेद्य निधाय च । तस्य दक्षिणदिग्भागे त्वन्तर्गमनसंयुतम् ॥ १९ ॥ सभी के लिये ऊँचाई के अनुसार उपपीठ निर्माण करे । उपपीठों का विस्तार पीठ की ऊँचाई से दुगुना होना चाहिये । उपपीठ से लगा हुआ उसके मान के अनुसार उन्नत आसनपिण्डिका का निर्माण करे । नैवेद्य निवेदन करे और उपपीठ पर स्थापित करे । उसके दाहिनी ओर भीतर जाने का रास्ता बनावे ॥ १७-१९ ॥