सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशः परिच्छेदः ४२१ विविक्तलोचनोपेतं पिण्डिकाकुण्डभूषितम् । सुकवाटार्गलोपेतं कुर्याद् हवनमण्टपम् ॥ २० ॥ एकान्त में गवाक्ष एवं पिण्डिका का कुण्ड से भूषित सुन्दर कपाट तथा अर्गला से युक्त हवन मण्डप का निर्माण करे ॥ २० ॥ उपलिप्यास्त्रजप्तेन वारिणा गोमयेन तु । विधिवच्छोभनं कुर्यादित्येवं मण्टपद्वयम् ॥ २१ ॥ तदनन्तर अस्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित जल एवं गोमय से मण्डपों का उपलेप करे । इस प्रकार के दो मण्डपों का निर्माण करे ॥ २१ ॥ विहितो वित्तविरहादधिवासो द्विजालये । शिष्यैर्वाऽऽचार्यभवने तत्र कुर्यात् परिग्रहम् ॥ २२ ॥ यदि धन न हो तब किसी ब्राह्मण के घर में अधिवास निर्माण करे, अथवा शिष्य के भवन में, अथवा अपने आचार्य के भवन में ही अधिवास के लिये भूमि का परिग्रह करे ॥ २२ ॥ प्राग्वदर्चनपूर्वं तु भूततर्पणपश्चिमम् । ओदनं दधिलाजाज्यं मधुतोयपरिप्लुतम् ॥ २३ ॥ भूततर्पणमित्युक्तं तद्विना तत्र तेऽनिशम् । सन्तिष्ठन्ते बहिः क्रुद्धाः काङ्क्षमाणाः परं वधम् ॥ २४ ॥ वहाँ अधिवास निर्माण कर प्राक् कथनानुसार भगवदर्चन करे । तत्पश्चात् भूत तर्पण करे । ओदन, दही, लावा, घृत, मधु और जल यह भूत तर्पण की सामग्री है । यदि भूत तर्पण नहीं किया गया तो वे मण्डल के बाहर रात-दिन क्रुद्ध होकर किसी के वध की आकांक्षा करते हुए वहीं स्थित रहते हैं ॥ २३-२४ ॥ अतश्च विहितं यत्नात् स्थाने क्षेत्रे कृते सति । निर्विघ्नसिद्धये दद्याद् बलिं सर्वत्र सर्वदा ॥ २५ ॥ इसलिये नवीन स्थान और नवीन क्षेत्र बना लेने पर निर्विघ्नता की सिद्धि के लिये प्रयत्नपूर्वक सभी स्थानों पर सर्वदा बलिदान की विधि कही गई है ॥ २५ ॥ सम्भारार्जनकथनम् कृत्वैवं मङ्गलार्थं तु दीर्घं घण्टारवं शुभम् । स्वपदात् प्राग्वदुत्थाप्य प्रोच्चार्य प्रणवं महत् ॥ २६ ॥ प्रवेशयेत् ततस्तस्मिन् लाजान् सिद्धार्थकान् शुभान् । फलानि श्रीफलादीनि चन्दनादीनि रोचनाम् ॥ २७ ॥