सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ सात्वतसंहिता अब स्वयं अलङ्कृत होने का उपकरण कहते हैं—आचार्य सर्वप्रथम समस्त समालभन वस्त्रों से, कटक एवं अँगूठियों से, श्वेत वस्त्र वाले उष्णीष (पगड़ी) से, बहुत बड़ी माला से, मुखावास ताम्बूलादि से और ललाट में तिलक से अपने शरीर को अलङ्कृत करे उसमें योगपट्ट बाँधे ॥ ५६-५८ ॥ हृत्पुण्डरीकमध्ये तु संन्यसेद् बीजमैश्वरम् ॥ ५८ ॥ करयोः पद्मनाभीयं ध्रुवाख्यमथ विग्रहे । शैषैरालभ्य पादान्तमामूर्ध्नश्चापि पूर्ववत् ॥ ५९ ॥ हस्तयोर्विग्रहे साङ्गं विन्यसेद् बीजमैश्वरम् । मुद्रावसानं कृत्वैवं सम्यक् तदनु चाहरेत् ॥ ६० ॥ पाणिभ्यां शङ्खचक्रे द्वे स्वमन्त्रेणाभिमन्त्रिते । भूत्वा तदात्मना पश्चात्ते निधाय धरातले ॥ ६१ ॥ अवलोक्याखिलं तत्स्थं प्रवर्तेताथ कर्मणि । हृदये विशाखयूपबीजन्यासं करयोः पद्मनाभबीजन्यासं शरीरे ध्रुवबीजन्यास- मवशिष्टैरनन्तादिषट्त्रिंशद्बीजैरामूर्ध्नः पादान्तमभिमर्शनं पुनर्हस्तयोर्विग्रहे च विशाख- यूपबीजेन षडङ्गन्यासं विभवमुद्रादर्शनं हस्ताभ्यां शङ्खचक्रादानं तन्मन्त्राभ्यां तयोरभि- मन्त्रणं स्वस्य तादात्म्यावलम्बनादिकमखिलसम्भाराणामपि चक्रशङ्खान्तर्गतत्वेनाव- लोकनपूर्वकं कर्मप्रारम्भं चाह—हृत्पुण्डरीकेति चतुर्भिः ॥ ५८-६२ ॥ तदनन्तर अपने हृत्पुण्डरीक मध्य में नृसिंह बीज से न्यास करे । हृदय में विशाखयूप न्यास, दोनों हाथों में पद्मनाभ बीज न्यास, शरीर में ध्रुव बीज न्यास, अवशिष्ट अनन्तादि ३६ बीजों से शिरःप्रदेश से लेकर पादान्त न्यास, फिर दोनों हाथों तथा शरीर में विशाखयूप बीज मन्त्र से न्यास करे । तदनन्तर षडङ्गन्यास एवं विभवमुद्रा का प्रदर्शन करे, दोनों हाथों में शङ्ख एवं चक्र ग्रहण करे, तन्मात्र मन्त्र से उनका अभिमन्त्रण करे । फिर साधक अपने तथा यज्ञीय संभारों को शङ्ख एवं चक्र के तादात्म्य की भावना करते हुए उनका अवलोकनपूर्वक कर्म प्रारम्भ करे ॥ ५८-६२ ॥ यागगेहशोधनालङ्करणकथनम् अस्त्राभिमन्त्रितं कृत्वा कर्म भृङ्गान्तरे स्थितम् ॥ ६२ ॥ तेनोपलिप्य सम्मार्ज्य यागस्थानं निघृष्य च । तद्ब्रह्माख्यावधौ भूयस्तेजसो हि विवृद्धये ॥ ६३ ॥ हेमपूर्वाणि रत्नानि बीजानि विनिवेश्य च । यागगेहशोधनालङ्करणमाह—अस्त्राभिमन्त्रितमिति द्वाभ्याम् ॥ ६२-६४ ॥ अब यागगेह की शोभा के लिये अलङ्कार कहते हैं—भृङ्गान्तर में स्थित