सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७६ सात्वतसंहिता अब अपमोक्ष निवृत्ति के लिये होम कहते हैं—तदनन्तर गुरु अस्मिता प्राप्त कर पुनः आहुति प्रदान करे। तदनन्तर गुरु अपने शिष्य के अपमोक्ष निवृत्ति के लिये ॐकार युक्त ऐश्वर्य बीज (विशाखयूप) बीज पूर्वक 'सर्वज्ञो भव' मन्त्र पढ़कर द्वादश आहुति देवे। फिर गुरु आशीर्वाद देवे 'हे भगवन् एवमेव भव'। फिर आचार्य अपने में 'निरवद्य, निराश्रय, सर्वेश्वर, सर्वशक्ति, सुसम्पूर्ण अच्युत, वशी, व्यापी, षाड्गुण्ययुक्त, निर्विकार, निरञ्जन, नित्य, नित्योदितज्ञान, नित्या- नन्द, सुनिष्फल, अनादि, अनन्त, अनिधन, वासुदेव, विभूतिमान् मैं हूँ' इस प्रकार का संकल्प कर पुनः पूर्णाहुति करे ॥ ११६-१२१ ॥ स्थितं वैभवदीक्षायां मुमुक्षोरैश्वरे पदे ॥ १२१ ॥ यत्रस्थो धाम चाभ्येति ह्यचिरात् पारमेश्वरम् । ईश्वरेच्छावशेनैव देहपातान्महामते ॥ १२२ ॥ अथ बुद्धिपदाद् वैशाखयूपपदे पद्मनाभाभिपदे वा शक्तिमच्छक्तिभेदेनोभयत्र वा तत्फलाभिसन्ध्यनुसारेण शिष्यचैतन्यस्थापनं पुनस्तस्मात् पदादुद्धृत्य देहपातान्तं कालं बुद्धिमयेऽध्वन्येव स्थापनं तथा बुद्धिपदे स्थापितस्यापि चैतन्यस्य काष्ठवह्निदृष्टान्तेन तन्मयाभावत्वं चाह—स्थितमिति सार्धैश्चतुर्भिः ॥ १२१-१२५ ॥ इस प्रकार वैभव दीक्षा में स्थित शिष्य मुमुक्षु हो कर ईश्वर पद में प्रतिष्ठित हो जाता है। जहाँ स्थित होकर ईश्वरेच्छावश देहपात के अनन्तर वह शीघ्र ही परमेश्वर के धाम में पहुँच जाता है ॥ १२१-१२२ ॥ भोगेच्छोः पद्मनाभीय उभयेच्छोः पदद्वये । शक्तिमच्छक्तियोगेन त्वथ बुद्धिमयेऽध्वनि ॥ १२३ ॥ निवेश्यो देहपातान्तं कालमुद्धृत्य तत्पदात् । अन्तरूढो यथा काष्ठात् पावकश्च पृथक् कृतः ॥ १२४ ॥ न भूयः सह काष्ठेन साम्यमेति तथा पुमान् । योजितोऽध्वान्तरे भूयो नैति तन्मयतां ततः ॥ १२५ ॥ इसके बाद आचार्य भोग की इच्छा रखने वाले शिष्य को वैशाखयूप पद पर स्थापित करे, अथवा पद्मनाभादि पद पर भोग और मोक्ष दोनों की इच्छा रखने वाले शिष्य को शक्ति और शक्तिमान् में भेद के सिद्धान्तानुसार दोनों पद पर उसके चैतन्य को स्थापित करे। फिर उसे उस पद से हटाकर देहपातान्त काल पर्यन्त बुद्धिमय अध्वा में स्थापित करे। इस प्रकार बुद्धि पद पर स्थापित उसका चैतन्य पुनः अन्य अध्वा में प्रवेश नहीं कर सकता। जिस प्रकार काष्ठ के भीतर रहने वाली अग्नि काष्ठ से पृथक् हो जाने पर पुनः काष्ठ का रूप धारण नहीं करती ॥ १२३-१२५ ॥