सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशः परिच्छेदः ४७७ समाधिप्रच्युतिं कृत्वा विनिवेश्यात्मनोऽग्रतः । यथावदुपदेष्टव्यस्तस्याध्वा च सितासितः ॥ १२६ ॥ संस्थितो यस्त्वभेदेन भिन्नरूपः परात्मनि । अथ शिष्यं पूर्वोक्तसमाधिविमुखं कृत्वाऽऽत्मनोऽग्रे निवेश्य तस्य वक्ष्यमाण- प्रकारेण षडध्वोपदेशं कुर्यादित्याह—समाधीति सार्धेन ॥ १२६-१२७ ॥ वेद्यवेदकनिर्मुक्तमच्युतं ब्रह्म यत्परम् ॥ १२७ ॥ तच्छब्दब्रह्मभावेन स्वशक्त्या स्वयमेव हि । मुक्तयेऽखिलजीवानामुदेति परमेश्वरः ॥ १२८ ॥ परंब्रह्मैव निखिलचेतनसंरक्षणार्थं शब्दब्रह्मभावं भजतीत्याह— वेद्येति सार्धेन ॥ १२७-१२८ ॥ इसके बाद आचार्य शिष्य को समाधि से हटाकर अपने आगे बैठावे, तदनन्तर उसे षडध्वा का उपदेश इस प्रकार करे । जो भिन्न रूप होते हुए भी परमात्मा में अभेद रूप से संस्थित है जो वेद्य वेदक से निर्मुक्त अच्युत तथा पर ब्रह्म है। वही परमेश्वर समस्त जीवों की मुक्ति के लिये अपनी शक्ति से स्वयं ‘शब्द ब्रह्म’ के रूप में प्रगट होता है ॥ १२६-१२८ ॥ तदव्यक्ताक्षरं विद्धि तन्त्रीशब्दो यथा कलः । पृथग्वर्णात्मना याति स्थितयेऽनेकधा स्वयम् ॥ १२९ ॥ तन्त्रीशब्दवदव्यक्ताक्षरं तच्छब्दब्रह्म अकारादिक्षकारान्तवर्णरूपेण पुनर्व्यक्ततां भजतीत्याह—तदिति । एतद्व्यक्तरूपं सर्वैरपि ज्ञायते ॥ १२९ ॥ तन्त्री (वीणा) शब्द के समान मधुर वह शब्द पहले अव्यक्त रूप में रहता है फिर वही अपनी स्थिति के लिये पृथक्-पृथक् अनेक वर्णों के रूप में वैखरी रूप में स्वयं व्यक्त होता है ॥ १२९ ॥ नो यान्ति निश्चयं यत्र चातुरात्म्यादनुग्रहात् । ऋते वेदविदो विप्रास्त्वेतस्मिन् प्रथमेऽक्षरे ॥ १३० ॥ अव्यक्ताक्षरे शब्दब्रह्मणः प्रथमरूपे तु भगवदनुग्रहं विना वेदविदामपि निर्णयो न संभवतीत्याह—नो यान्तीति ॥ १३० ॥ वह शब्द ब्रह्म प्रथम जब अव्यक्त रूप में रहता है तब उसका निर्णय भगवदनुग्रह के बिना बड़े-बड़े वैदिक भी करने में असमर्थ रहते हैं ॥ १३० ॥ स शब्दमूर्तिर्भगवान्व्येति च कलात्मना । तद्ग्रहो युज्यते येन तन्निष्ठानां हि कर्मिणाम् ॥ १३१ ॥