सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४९६ सात्वतसंहिता अपनी बुद्धि से आह्लाद, आनन्द लक्षण वाले, चित् शक्ति विग्रह से युक्त परब्रह्म को उसके हृदय में स्थापित करे । अपना समस्त अधिकार प्रदान करे । अपने में सञ्चित शुभ, शुद्ध, दिव्यागम तथा आराधना का आधारभूत अक्षसूत्र, किङ्किणी, स्रुक् स्रुवा, योगपट्ट, शङ्ख, चक्र, कमण्डल, अर्घ्यपात्र सहित चमस, कुश समूह, विस्तृत कृष्णाजिन, दो पादुका, पादपीठ, छत्र, आसन, दर्पण, मयूर पिच्छ का व्यजन, शुक्लवर्ण का चामर, भगवद् ध्वज, आश्रमानुसार दण्ड, दो काषायवर्ण के दो क्षौमवस्त्रादि एकत्र कर अपने आसन से उठकर शिष्य को प्रदान करे । फिर स्नानार्थ जल स्थापित करे । तदनन्तर शुचि स्थान में देवाधिदेव की पूजा करे । उन देवाधिदेव की तृप्ति के लिये तर्पण करे तथा अग्नि के मध्य में पूर्णाहुति करे ॥ १३-१८ ॥ क्षान्त्वा पूर्वोक्तविधिना सकुण्डान्मण्डलान्तरात् । अर्घ्यपात्रसमूहाच्च बलिदानं समाचरेत् ॥ १९ ॥ सोदकेन च भूतानामोदनेनास्त्रमुच्चरन् । बलिमण्डलकं कृत्वा यागागाराच्च बाह्यतः ॥ २० ॥ अथ कुण्डान्मण्डलादर्घ्यादिपात्रसमूहाच्च मन्त्रोपसंहारं बलिदानक्रमं चाह— क्षान्त्वेति चतुर्भिः । भूतानां = कुमुदादीनामित्यर्थः । बलिमण्डलकं = बलिदानार्थं गोमयोपलिप्तं स्थानमित्यर्थः ॥ १९-२० ॥ फिर कुण्ड से, मण्डल से, अर्घ्यपात्र समूह से मन्त्रोपसंहार कर साधक को इस प्रकार बलिदान करना चाहिए । यज्ञगृह से बाहर अस्त्र मन्त्र का उच्चारण करते हुए उदक सहित ओदन से भूतों के लिये बलिमण्डल (गोमयोपलिप्त स्थान) का निर्माण करे ॥ १९-२० ॥ कृत्वान्तर्बलिदानं तु प्रदाक्षिण्येन वै पुरा । अथ ऊर्ध्वं इदं चोक्त्वा शेषं तन्मण्डले बहिः ॥ २१ ॥ नमोऽस्त्वच्युतभूतेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वदैव हि । सदिक्पतिभ्यः सास्त्रेभ्यः शान्तिर्नोऽस्त्वस्य वै शिशोः ॥ २२ ॥ अथ विष्वक्सेनार्चनं तत्सन्तर्पणं तद्विसर्जनं तन्निवेदितपरित्यागं चाह— पूजाद्यमिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ २१-२५ ॥ तदनन्तर उस मण्डल के भीतर बलिदान करे एवं प्रदक्षिणा करे । इसके बाद मण्डल के बाहर ‘नमोऽस्त्वच्युत...’ आदि श्लोक से बलि प्रदान करे । बलिमन्त्र का अर्थ—सभी दिक्पतियों के साथ अस्त्र धारण किये हुए अच्युतभूतों को सर्वदा हमारा नमस्कार हो, हमारी शान्ति हो तथा हमारे इस शिष्य को शान्ति प्राप्त हो ॥ २१-२२ ॥