भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 556

विंशः परिच्छेदः ४९७ विष्वक्सेनार्चन विधानम् पूजाद्यमुपसंहृत्य दत्तशिष्टेन पूर्ववत्। वृत्तमण्डलमध्ये तु सितपद्मोदरे ततः ॥ २३ ॥ दत्तशिष्टैर्यजेद् देवं सर्वदेवगुरुं प्रभुम्। तर्पयित्वाऽग्निमध्ये तु कुर्यात् तस्य विसर्जनम् ॥ २४ ॥ तदीयमथ निक्षिप्य क्ष्मावटे वा जलान्तरे। इसके बाद विष्वक्सेन की अर्चना करे और उनका सन्तर्पण, विसर्जन तथा तन्निवेदित अन्न का परित्याग इस प्रकार करे—सामग्री द्वारा वृत्तमण्डल के मध्य में श्वेत कमल पर पूजावशिष्ट सामग्री द्वारा प्रभु सर्वदेव गुरु विष्वक्सेन का पूजन करे । अग्नि के मध्य में सन्तर्पण करे । उनका विसर्जन करे । उनकी पूजा की समस्त सामग्री पृथ्वी में गड्ढा खोद कर डाल देवे अथवा जल में प्रक्षिप्त करे ॥ २३-२५ ॥ सुधापानप्रदानप्रकारकथनम् यागावनौ च तच्चक्रं द्वादशारं विचिन्त्य च ॥ २५ ॥ न्यस्यात्मन्यर्घ्यपुष्पाद्यैः समभ्यर्च्य तदन्तरे। करकं वारिसम्पूर्णमादाय विनिवेश्य च ॥ २६ ॥ सुधापानप्रदानप्रकारमाह—यागावनौ च तच्चक्रमित्यारभ्य कृत्वा फलसमन्वित- मित्यन्तम् ॥ २५-३३ ॥ फिर यज्ञ भूमि में द्वादशार चक्र का निर्माण करे । अपने देह में अङ्गन्यास करे । अर्घ्यपुष्पादि से उस चक्र की पूजा करे और वारिपूर्ण करके कमण्डल वहाँ स्थापित करे ॥ २५-२६ ॥ तत्रेष्ट्वा वीर्यमन्त्रेण मध्ये मन्त्रास्त्रमुत्तमम्। मध्वम्बुपयसा पूर्णमपरं शुभलक्षणम् ॥ २७ ॥ तदग्रतोऽर्घ्यकलशं तन्मध्येऽस्त्रं च चक्रगम्। तमभ्यर्च्य यथान्यायं कृत्वाऽष्टशतमन्त्रितम् ॥ २८ ॥ वषट्पदनिरुद्धेन मूलमन्त्रेण तं पुनः। दद्यात् तदन्तः शार्णेन प्राग्वत् पीयूषधारिणा ॥ २९ ॥ वहाँ वीर्यमन्त्र से पूजा करे । तदनन्तर मन्त्रास्त्र से युक्त दो कलश स्थापित करे । प्रथम कलश में मधु, जल और दूध स्थापित करे । दूसरा कलश शुभ लक्षणों युक्त कर स्थापित करे । उसके आगे अर्घ्य कलश जिसमें चक्र स्थित है, उसमें अस्त्र मन्त्र स्थापित करे । फिर उसे १०८ बार मन्त्र से अभिमन्त्रित कर