भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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पृष्ठ 558

विंशः परिच्छेदः ४९९ इसके बाद शिष्य समाहित चित्त होकर विधिवत् गुरुयाग करे । यह गुरु याग कर्म, मन और वाणी से भगवद् याग की तरह सम्पादन करे । सर्वप्रथम यागोपयुक्त समस्त पूजन सामग्री पूजा के द्वारा निवेदित करे । फिर गुरु के चरणों पर शिर सहित दोनों हाथ रखकर श्रद्धा से पवित्र चित्त द्वारा उनसे क्षमा माँगे ॥ ३३-३५ ॥ पञ्चरात्रविदस्तद्वद् यतींश्च स्नातकादिकान् । सम्पूज्य विधिवद् दद्यात् तेषां शक्त्या च दक्षिणाम् ॥ ३६ ॥ सर्वेषां भागवतानां दक्षिणादानादिकमाह—पञ्चरात्रेति ॥ ३६ ॥ तदनन्तर पञ्चरात्र के विद्वानों, यतियों, स्नातकादिकों की विधिवत् पूजा कर उन्हें शक्ति के अनुसार दक्षिणा प्रदान करे ॥ १३६ ॥ संवाहनपरात् कालाद् लब्ध्वाऽनुज्ञां तु गौरवीम् । भ्रातृभिः सह चाश्नीयाद् बहुभिः पूर्वदीक्षितैः ॥ ३७ ॥ तथान्यैर्भगवद्भक्तैः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवैः । तदनन्तरं गुर्वनुज्ञया भ्रातृभिः सह भोजनमाह—संवाहनेति सार्धेन ॥ ३७-३८ ॥ फिर गुरु के पादसंवाहन के पश्चात् उनकी आज्ञा प्राप्त कर अपने भ्रातृगणों तथा पूर्व में बहुत से दीक्षित सज्जनों के साथ, अन्य भगवद् भक्तों के साथ तथा सुहृत् सम्बन्धी बन्धुओं के साथ भोजन करे । तत्पश्चात् उस काल में अथवा अन्य काल में जहाँ-तहाँ शिष्यों के साथ जाने वाले उन लोगों के साथ अनु- व्रजन करे ॥ ३७-३८ ॥ व्रजन्तं सह शिष्यैस्तु काले ह्यन्यत्र तत्र वा ॥ ३८ ॥ तदिच्छया ह्यनुव्रज्य निवर्तेताथ वै यदा । कृत्वा तु पादपतनं बहुधा सम्प्रदक्षिणम् ॥ ३९ ॥ आ मोक्षात् सर्वसिद्धीनां भक्तानां भावितात्मनाम् । परा गतिर्गुरुर्यस्मात् प्रसाद्यः स्मृत एव सः ॥ ४० ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायामभिषेकविधिर्नाम विंशः परिच्छेदः ॥ २० ॥