सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 559, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें५०० सात्वतसंहिता तस्मिन् कालेऽन्यत्र वाव्रज्या गुरुणा सहानुव्रजनं पुनस्तदनुज्ञया निवर्तनकाले प्रणिपतनप्रदक्षिणादिभिर्गुरोः प्रसादीकरणं चाह— व्रजन्तमिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ ३८-४० ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये विंशः परिच्छेदः ॥ २० ॥ तदनन्तर उनकी इच्छा से लौट आवे । फिर गुरु के चरणों पर गिर कर नमस्कार करे एवं प्रदक्षिणा करे ॥ ३८-३९ ॥ मोक्ष पर्यन्त समस्त सिद्धि प्रदान करने वाले तथा भगवदाराधन परायण भक्तों के लिये एकमात्र सर्वश्रेष्ठ गुरु ही परागति हैं, अतः वही प्रसाद्य हैं और संस्मरणीय भी हैं ॥ ४० ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अभिषेकविधि नामक बीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २० ॥