सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशः परिच्छेदः ५०७ वज्रपात से आहत, कृमि, कीट संयुक्त सभी पत्र, पुष्प, फलादि प्रयत्नपूर्वक वर्जित करे ॥ २४-२८ ॥ योक्तव्यानि पवित्राणि नित्यमाराधने तु वै । साङ्कुराणि च पत्राणि भूगतान्येवमेव हि ॥ २९ ॥ विहितान्यर्चने नित्यं यथर्तुप्रभवाणि च । न गृहे करवीरोत्थैः कुसुमैरर्चनं हितम् ॥ ३० ॥ सित रक्त एवं नील वर्णों वाले सुगन्धित पवित्र कमल नित्य आराधन में अवश्य ग्राह्य हैं, इसी प्रकार अङ्कुरयुक्त पृथ्वी से संयुक्त पत्र जो ऋतुकाल के अनुसार उत्पन्न होते हैं । वे भी अर्चन में विहित है, अतः ग्राह्य है, घर पर कनैल (करवीर) के पुष्पों से अर्चन न करे ॥ २९-३० ॥ विशेषतः सकामस्य सिद्धिभूतयुतस्य च । अतोऽन्यथा न दोषोऽस्ति दोष उन्मत्तकादिभिः ॥ ३१ ॥ सद्योहृतानां विहितस्त्वम्लानानां यथा क्रयः । प्रदानमम्बुसिक्तानां तेषां कार्यं न चान्यथा ॥ ३२ ॥ विशेष कर सकाम अर्चन करने वालों तथा सिद्धि से युक्त लोगों के लिये यह निषेध है । इससे अतिरिक्त लोगों के लिये करवीरार्चन निषिद्ध नही है । धतूरादि द्वारा अर्चन अवश्य निषिद्ध है । तुरन्त चुने गये म्लानता रहित (विकसित) पुष्पों को खरीद कर भी पूजा का विधान हैं, किन्तु खरीदने के बाद उन्हें जल से संसिक्त कर ही पूजा करे, अन्यथा नहीं ॥ ३१-३२ ॥ निर्दोषतां प्रयान्त्याशु मन्त्रिणामवलोकनात् । भवन्ति भक्तिपूतानि हृन्मन्त्रनिरतात्मनाम् ॥ ३३ ॥ हृदय मन्त्र में निरत मन्त्रज्ञ पुरुषों के अवलोकन से भी पुष्प निर्दोष हो जाते हैं । किं बहुना, भक्ति से भी वे पूत हो जाते हैं ॥ ३३ ॥ न कांस्यपात्रे भोक्तव्यं न तत्र विनिवेदयेत् । देवाय मधुपर्काद्यं तथा वै सति सम्भवे ॥ ३४ ॥ मृण्मयायसपात्रेषु न धूपमपि निर्दहेत् । धूपार्थं गुग्गुलुः साज्यो देयश्चाभवतोऽपरः ॥ ३५ ॥ कांस्य पात्र में भोजन न करे । उसमें भोजन रख कर नैवेद्य अर्पित नं करे । इसी प्रकार संभव होने पर देवताओं के लिये कांस्य पात्र में अर्घ्य प्रदान भी न करे । मिट्टी के पात्र तथा लोहे के पात्र धूप भी न जलावे अभाव में धूप के लिये साज्य गुग्गुल घण्टा शब्द के साथ दिया जा सकता है ॥ ३४-३५ ॥