भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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द्वाविंशः परिच्छेदः ५२५ श्रीभगवानुवाच यत्पूर्वं नृहरेः प्रोक्तं शिरोमुद्रादिपञ्चकम् । तदङ्गुष्ठविनिर्मुक्तं विद्धि न्यूनाङ्गुलैः क्रमात् । चतुष्टयं चतुर्णां तु गुर्वन्तानां यथास्थितम् ॥ ६७ ॥ ॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां अधिकारिमुद्राभेदविधिर्नाम द्वाविंशः परिच्छेदः ॥ २२ ॥ — ❧ — एवं पृष्टो वासुदेवः पूर्वं नृसिंहकल्पोक्त(१७।१०२)शिखामुद्रादिचतुष्टयमेव समयिपुत्रका(णां?दीनां) मुद्राचतुष्टयमित्याह—यदिति सार्धेन ॥ ६७ ॥ ॥ इति श्रीमौज्यायनकुलतिलकस्य यदुगिरीश्वरचरणकमलार्चकस्य योगानन्दभट्टाचार्यस्य तनयेन अलशिङ्गभट्टेन विरचिते सात्वततन्त्रभाष्ये द्वाविंशः परिच्छेदः ॥ २२ ॥ — ❧ — श्री भगवान् के कहा—हे सङ्कर्षण हमने पूर्व में नृसिंह कल्प (सत्रहवें अध्याय) में शिखामुद्रादि चतुष्टय तथा सामयिकादि चतुष्टय का मुद्रा लक्षण वह जिस प्रकार होता है उसे कह दिया है ॥ ६७ ॥ ॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के अधिकारिमुद्राभेदविधि नामक बाइसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २२ ॥ — ❧ —

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