सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४४ सात्वतसंहिता सकाम लोगों के लिये लाभालाभवशात् असामान्य (असाधारण) हैं ॥ ६-११ ॥ सम्यक् स्वमूर्तिमन्त्रैस्तु जपहोमार्चनादिना । नयेत् सामान्यभासित्वं तथा तत्कारणार्चनात् ॥ १२ ॥ यजेत् सेन्द्रां धरां शैलं मृदापादनकर्मणि । एवं पटद्रुमार्थं तु वरुणं सवनस्पतिम् ॥ १३ ॥ सरत्नानां च धातूनां सम्बन्धेऽर्केन्दुपावकान् । अथ तत्तद्बिम्बनिर्माणार्थं तत्तदुपादानद्रव्यग्रहणकाले सामान्यतः करिष्यमाणतत्त- न्मूर्तिमन्त्रैरर्चनजपहोमादिकं विशेषतः सेन्द्रधरादितत्तत्कारणार्चनं च कार्यमित्याह— सम्यगिति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १२-१४ ॥ आराधक इन मूर्त्तियों को अपने मूर्ति मन्त्रों से जप, होम तथा अर्चन से सामान्य मांस की तरह बना लेवे । तत्पश्चात् उन-उन बिम्बों के निर्माण के लिये उनके उपादान भूतद्रव्य ग्रहणकाल में उन-उन मूर्त्ति मन्त्रों से जप एवं होमादि तो करे ही साथ ही विशेष रूप से मिट्टी द्वारा बिम्ब निर्माण के लिये श्रेष्ठ पृथिवी का पूजन भी करे । पट या द्रुम के द्वारा बिम्ब निर्माण के लिये सवनस्पति वरुण का पूजन करे । सरत्न धातु के द्वारा बिम्ब निर्माण के लिये सूर्य चन्द्रमा तथा अग्नि की पूजा करे ॥ १२-१४ ॥ रत्नाश्रयेण धात्वर्थेनाचदिशेन वै विना ॥ १४ ॥ तथार्चनासनेनैव चक्रपद्ममयादिना । न रत्नी प्रतिमा शस्ता ध्यायिनां ध्यानसिद्धये ॥ १५ ॥ केवला लघुमाना च प्रमाणावयवोज्झिता । रत्नमयीं सुवर्णरजताख्योत्तमधातुमयीं वा प्रतिमां विनाऽन्यद्रव्यमयी प्रतिमा लघुमाना प्रमाणावयवरहिता चेत्, न प्रशस्ता, तथैव भद्रपीठमपीत्याह—रत्नाश्रयेणेति द्वाभ्याम् । अर्चादिशेन भगवदर्चनास्पदेन, बिम्बेनेति यावत् । अर्चनासनेन केवलभद्र- पीठेनेत्यर्थः । रत्नसुवर्णरजतबिम्बं चेद् वस्तुगौरवाल्लघुमानं प्रमाणरहितमपि ग्राह्या- मिति फलितोऽर्थः ॥ १४-१६ ॥ सुवर्ण, रजतादि, उत्तम धातुओं से बनी हुई प्रतिमा के बिना अन्य द्रव्यों से बनाई गई प्रतिमा लघुमान में बनाई जाने पर उसकी प्रशंसा नहीं होती । इसी प्रकार लघुमान का बनाया गया भद्रपीठ भी प्रशस्त नहीं होता । किन्तु भगवान् की अर्चा के लिये रत्न, सुवर्णादि, उत्तम धातुओं द्वारा निर्मित बिम्ब तथा भगवदर्चा के लिये बनाया गया उन उत्तम धातुओं का भद्रपीठ वस्तु के गौरव से मान में लघु (प्रमाण रहित) होने पर भी ग्राह्य है ॥ १४-१६ ॥ वर्णाश्रमगुरुत्वाच्च स्वामित्वादखिलस्य च ॥१६ ॥