सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५४५ भूतादिदेवरूपत्वाद् उत्तमाद्येषु वस्तुषु । नृपश्चार्हति वै नित्यं सविशेषपदे स्थितः ॥ १७ ॥ किं पुनर्योऽफलाकाङ्क्षी भक्तिश्रद्धापरः सदा । मुमुक्षुत्वमात्रेण निकृष्टवर्णोद्भव उत्कृष्टवर्णार्हेषु वस्तुषु कथमर्हतीत्याशङ्कां किंपुनर्न्यायेन परिहरति—वर्णाश्रमेति द्वाभ्याम् । अफलाकाङ्क्षी = मुमुक्षुरित्यर्थः ॥ १६-१८ ॥ वर्णाश्रम धर्म में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण, सबका स्वामी होने के कारण, सभी उत्तम वस्तुओं में ऐश्वर्यादि से सम्पन्न होने के कारण तथा देवस्वरूप होने से जिस प्रकार सविशेष पद पर राजा को नियुक्त किया जाता है, उसी प्रकार, जिस किसी प्रकार के फल की आकांक्षा जिसे नहीं है, मुमुक्षु है, भक्ति एवं श्रद्धा युक्त है, वह निकृष्ट वर्ण में उत्पन्न होने पर भी उत्कृष्ट वर्ण के योग्य आसन का अधिकारी है ॥ १६-१८ ॥ बुद्ध्वैवं चित्रबिम्बार्थी यत्नेनेदं समाचरेत् ॥ १८ ॥ गुह्यकान् गृहदेवांस्तु हृदाऽर्च्यऽर्घ्यादिना पुरा । प्रथमं चित्रबिम्बनिर्माणार्थं गुह्यकगृहदेवतार्चनपूर्वकं भित्तिकाष्ठफलकपटानां संशोधनप्रकारानाह—बुद्ध्वेति सार्धैः पञ्चभिः ॥ १८-२३ ॥ इसी प्रकार अपने मन में विचार कर चित्र बिम्ब का निर्माणकर्त्ता प्रयत्नपूर्वक चित्र बिम्ब के निर्माण में गुह्यकों एवं गृहदेवों की अर्घ्यादि द्वारा हृदय से अर्चना करे ॥ १८-१९ ॥ मलभस्मतुषाङ्गारकेशकीटनखास्तृणम् ॥ १९ ॥ मूलकण्टकचर्मास्थिसामान्येऽश्माह्निभित्तिकाः । भवत्यनर्थदाऽवश्यमतः प्राक् चतुरङ्गुलम् ॥ २० ॥ मल, भस्म, तुष, अङ्गार केश कीट, नख, तृण, मूल, कण्टक, चर्म और अस्थि सामान्य में पत्थर की भित्ति पर चित्र निर्माण अनर्थकारक हो जाता है । वहाँ चित्र निर्माण न करे ॥ १९-२० ॥ विहाय मृद्दलं भित्तेरीषद् बिम्बात् तु चाधिकम् । उक्तदोषविमुक्ताऽथ पञ्चगव्येन साम्भसा ॥ २१ ॥ मर्दितया मृदा भूयस्तद्भित्त्यंशं प्रपूर्य च । शस्त्रेण काष्ठफलकां मृगचर्मसमां पुरा ॥ २२ ॥ छविं विहाय शुद्ध्यर्थं तुरीमुक्तं तु वै पटम् । प्रक्षाल्य सलिलेनैव त्वस्त्रजप्तेन सप्तधा ॥ २३ ॥