सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० सात्वतसंहिता पृथिवी पर चलने वालों में नकुल, श्वेत सर्प, गृह गोधिका, विस्तूया, छुछुन्दर, जम्बुक इन सभी का दर्शन शुभावह है ॥ ५० ॥ मृगाणां हरिणः सिंहो व्याघ्रः शशकचित्रका । सिद्धिसंसूचकाः सर्वे सर्वेषां विहितं तु वै ॥ ५१ ॥ जङ्गली जन्तुओं में हरिन, सिंह, बाघ, खरगोश, चिता ये सभी सबके लिये सिद्धि प्रदान करने वाले हैं ॥ ५१ ॥ प्रदक्षिणं विशेषेण व्यत्यये जम्बुकः शुभः । द्विजादिकं रुतं स्निग्धं सिद्धिकृत् तच्च सौख्यदम् ॥ ५२ ॥ ये दक्षिण की ओर होने पर विशेष शुभकारक है । किन्तु जम्बुक बायें दिखाई पड़े तो शुभकारक है । दाहिने पक्षी आदि का मधुर शब्द सिद्धि करने वाला तथा सौख्य प्रदान करने वाला है ॥ ५२ ॥ समुत्पन्ने निमित्ते तु धातुसंक्षेपकर्मणि । प्रतीक्षितुं न युज्येत यदा शान्तिं तदाचरेत् ॥ ५३ ॥ धातु संक्षेप कर्म में शुभ निमित्त दिखाई पड़ने पर प्रतीक्षा न करे । जिससे शान्ति हो वैसा करे ॥ ५३ ॥ पूर्वोक्तां चित्तशुद्ध्यर्थं सविशेषां सदक्षिणाम् । प्रविश्य विधिवत् क्षेत्रं निरीक्षेत स्वतेजसा ॥ ५४ ॥ चित्त शुद्धि के लिये विशेषता के साथ तथा दक्षिणा के साथ क्षेत्र में जाकर अपने तेज से स्वयं क्षेत्र का निरीक्षण करे ॥ ५४ ॥ पश्येच्छिलां गुणवतीं तरुं वा कर्मणि क्षमम् । वर्जयेदतिवृद्धां च परिक्षीणत्वचं तथा ॥ ५५ ॥ क्षेत्र में गुणयुक्त शिला देखे, अथवा बिम्ब कर्म में समक्ष वृक्ष देखे । अत्यन्त बड़ी शिला का वर्जन करे एवं जिस वृक्ष पर त्वचा न हो ऐसे वृक्ष को भी वर्जित करे ॥ ५५ ॥ सभङ्गां दावदग्धां च निश्शब्दां रूक्षविग्रहाम् । सवालुकां च सच्छिद्रां बिन्दुयुक्तां पुटोद्वहाम् ॥ ५६ ॥ जो शिला टूटी हो, दावाग्नि से दग्ध हो, शब्द रहित हो, सर्वथा रूक्ष (शुष्क) हो, बालुका युक्त हो, छिद्र वाली हो, बिन्दु से युक्त हो और जो पुट (पात्र) से वहन करने योग्य हो उसे वर्जित करे ॥ ५६ ॥ आखुदर्दुरमीनाहिमार्जारशशकोपमाम् ।