भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५१ सुवर्णपरवर्णोत्थशिराजालेन सन्तताम् ॥ ५७ ॥ प्रागुक्तरूपस्याभावादमीषां ग्रहणं हितम् । पारावतशुकाब्जाभा मधुमाञ्जिष्ठमाषभा ॥ ५८ ॥ गुर्वी हृद्या शुभा स्निग्धा अतो वान्याभिशस्यते । सुहृद्ये भूतले मग्ना जलाशयतलस्थिता ॥ ५९ ॥ छन्ना तरुवरेणैव वनराजिष्ववस्थिता । वेष्टिता वल्लिवृन्देन तथैवाैषधिभिर्वृता ॥ ६० ॥ चूहा, मेघा, मछली, सर्प, बिल्ली और खरगोश के तुल्य हो, सुवर्ण जाल अथवा अन्य वर्णोत्थ शिरा जाल से सन्तत हो, ऐसी शिला वर्जित करे । यदि गुणवती शिला अप्राप्त हो तब उसके अभाव में इस प्रकार की भी शिला ग्राह्य की जा सकती है । जिसकी आभा कबूतर एवं शुक की आभा के समान हो, अथवा मजीठी, मधु, माष के समान हो, जो गुर्वी हो, मनोहर हो, शुभा हो, चिकनी हो, इस प्रकार की अन्य शिला भी बिम्ब ग्रहण कार्य में प्रशस्त है । अच्छे भूतल से दबी हो, जलाशय के तल में गड़ी हो, उत्तम मङ्गलकारी वृक्षों से ढकी हो, वनराजी में स्थित हो, लताओं से परिवेष्टित हो और जो औषधियों से घिरी हो उसे ग्रहण करे ॥ ५७-६० ॥ ऊर्ध्वगा जानुदेशाच्च एकपिण्डीकृता भृगोः । मोक्षदा च खवक्त्रा वै भोगदा सुतलानना ॥ ६१ ॥ दिङ्मुखी चोभयकरी प्राङ्‌मूर्धा भूतिरायुषे । अतोऽन्यमस्तका कीर्तिर्यशोवृद्धिकरी मता ॥ ६२ ॥ वंशवृद्धिदमारोग्यशान्तिकृत्कं यदाप्यदिक् । पुष्टिमुन्नतिसन्मेधां यच्छत्युत्तरमस्तका ॥ ६३ ॥ जो जानुदेश से ऊपर स्थित हो, ऊँची शिलाओं से एक पिण्डी के रूप में हो, जिसका मुख ऊपर की ओर हो, ऐसी शिला मोक्षदा होती है । जिसका मुख सुन्दर तला वाला है ऐसी शिला भोग प्रदान करती है । किसी दिशा की ओर जिसका मुख है ऐसी शिला भोग, मोक्ष दोनों देती है । जिसका मुख पूर्व की ओर है ऐसी शिला वैभव और आयुष्य दोनों प्रदान करती है । इसके अतिरिक्त अन्यत्र मस्तक वाली शिला कीर्ति और यश की वृद्धि करने वाली होती है । जिसका शिर पश्चिम दिशा की ओर हो, ऐसी शिला वंश की वृद्धि करती है, आरोग्य एवं शान्ति प्रदान करती है । जिस शिला का मस्तक उत्तर दिशा में हो ऐसी शिला पुष्टि उन्नति तथा सन्मेधा प्रदान करती है ॥ ६१-६३ ॥ एवं पुरा परिज्ञाय पृष्ठोरुचरणं शिरः ।