सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५२ सात्वतसंहिता बलात्मना सवीर्येण प्रोद्धृत्य सह शिल्पिभिः ॥ ६४ ॥ प्राङ्मुखं चोत्तरस्या दिक् प्राग्भागे चोत्तराननम्। स्थलेऽवतार्य मन्त्रेशमिष्ट्वा स्रक्चन्दनादिना ॥ ६५ ॥ ध्यात्वा शिलान्तःसंरुद्धं सम्पूज्य जुहुयात् ततः। उक्तदिग्द्वितयस्यैकदेशे कुण्डेऽथवा स्थले ॥ ६६ ॥ दत्वा पूर्णाहुतिं ध्यानजपयुक्तः क्षपेदहः। निशागमेऽर्चनं कुर्याद् बलिभिर्भूततर्पणम् ॥ ६७ ॥ इसी प्रकार शिला का पृष्ठ, ऊरु, अरण और शिर का ज्ञान करे। तदनन्तर शिल्पियों के साथ बलवीर्य लगाकर शिला को उखाड़े। यदि शिला का मुख उत्तर दिशा की ओर हो तो स्वयं पूर्व दिशा में और यदि शिला पूर्व में हो तब अपना मुख उत्तर दिशा की ओर करके शिला को उखाड़े। फिर उसे स्थल पर स्थापित करे। तदनन्तर मन्त्रेश की स्रक्, चन्दन आदि के द्वारा पूजा कर शिला के मध्य में मन्त्र के ईश का पूजन करे। हवन करे, फिर ऊपर कहे गये दिग् द्वितय के एक भाग में, अथवा कुण्ड में, अथवा स्थल में पूर्णाहुति देवे। फिर ध्यान, जप में परायण रहकर दिन बितावे। सन्ध्या होने पर अर्चन करे और बलि देकर भूतसन्तर्पण करे ॥ ६४-६७ ॥ नैवेद्यशेषमश्नीयान्मन्त्रविन्यस्तविग्रहः। तद्दक्षिणेन दर्भेषु प्राक्शिराः प्रस्वपेज्जपन् ॥ ६८ ॥ फिर मन्त्रवेत्ता अपने शरीर में मन्त्र द्वारा न्यास कर नैवेद्य शेष का भोजन करे। तदनन्तर उस शिला के दक्षिण में कुशा स्थापित कर मन्त्र का जप करते हुए पूर्व में कहे गये शुभ स्वप्न की प्राप्ति के लिये पूर्व की ओर शिर कर सो जावे ॥ ६८ ॥ पूर्ववत् स्वप्नलाभार्थमुत्थाय रजनीक्षये। कुर्यात् स्वकृत्यं जुहुयादशुभस्वप्नशान्तये ॥ ६९ ॥ रात बीत जाने पर स्वयं उठकर अपना कृत्य करे। यदि अशुभ स्वप्न दिखाई पड़ा हो तो उसकी शान्ति के लिये होम करे ॥ ६९ ॥ अभिनन्द्य शुभं स्वप्नं हृदयावर्जकं स्फुटम्। यदि स्पष्ट रूप से हृदयाकर्षक शुभ स्वप्न दिखाई पड़ा हो तब उसका अभिनन्दन करे ॥ ७० ॥ पर्वतं च स्वमात्मानं स्थानं तदुपलं स्थलम् ॥ ७० ॥ स्फटिकामलसंकाशं पश्येद् वा तप्तहेमवत्।