सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५५३ निर्धूमाङ्गारकूटाभं तदाशु लभते शुभम् ॥ ७१ ॥ यदि स्फटिक के समान अत्यन्त स्वच्छ अथवा तपाये हुए सुवर्ण की भाँति चमकीला, अथवा धूमरहित अङ्गारे के समान जाज्वल्यमान पर्वत अपना स्थान, अथवा प्रस्तर खण्ड दिखाई पड़े तो उसका फल शीघ्र होता है ॥ ७०-७१ ॥ सशस्त्रमथ चादाय मुद्गरं चास्त्रमन्त्रितम् । प्राङ्मुखश्चतुरो वारांस्ताडयेन्मस्तकावधेः ॥ ७२ ॥ पाददेशाच्च वा मध्यादवेक्ष्य च फलं पुरा । तदनन्तर आराधक अस्त्राभिमन्त्रित सशस्त्र मुद्गर लेकर पूर्वाभिमुख हो फल देखते हुए चार बार शिला का मस्तक पर्यन्त ताडन करे । अथवा पैर पर्यन्त अथवा मध्य पर्यन्त फल का विचार करते हुए ताडन करे ॥ ७२-७३ ॥ चतुरश्रांयतां कृत्वां भिन्नां पीठेन यन्त्रगाम् ॥ ७३ ॥ आनाय्य वा पृथक्पीठां छन्नां कर्मालयं शुभम् । आनुगुण्यपुराणेन विधिना चोद्धरेच्छिलाम् ॥ ७४ ॥ उसके टुकड़े को चौकोर बनाकर पीठ से अलग किसी यन्त्र में स्थापित करे । पीठ से अलग उसे ढककर कर्मालय में ले आकर पुराण होने के कारण उसके अनुगुण विधि के अनुसार इस प्रकार शिला का उद्धार करे ॥ ७३-७४ ॥ पीठार्थं भिन्नवर्णां च तद्रूपां वा यथेच्छया । अङ्गाङ्गिभावगुणवद् दृषदां तु महामते ॥ ७५ ॥ पीठ के लिये भिन्न वर्ण की शिला अथवा उसी के समान रूप वाली अपनी इच्छा के अनुरूप अङ्गाङ्गीभाव के अनुसार गुणयुक्त अन्य शिला ग्रहण करे ॥७५॥ काष्ठलोहमणीनां चाप्यलाभे सति वै शुभम् । सति लाभे न वै कुर्याद्वैषम्यं व्यत्ययं च वा ॥ ७६ ॥ काष्ठ, लौह, मणि के अभाव में शिला का बिम्ब ही शुभदायक होता है । यदि काष्ठ, लौह, मणि आदि बिम्ब के लिये प्राप्त हो जावे तो आराधक विषमता या अदला-बदली न करे ॥ ७६ ॥ तत्काममेव चाहृत्य रत्नाधारशिलां शुभाम् । पुंस्त्रीनपुंसकोत्याभिः शिलाभिस्त्रितयं हितम् ॥ ७७ ॥ बिम्बाख्यं विद्धि चाभावात् सर्वबिम्बोपलात् तु वै। निषिद्धं भगवद्विम्बं रत्नपीठमयोपलात् ॥ ७८ ॥ उसी काष्ठ, लौह, मणि का ही बिम्ब निर्माण करे । यदि रत्नाधार शिला सा० सं० - ३९