सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ सात्वतसंहिता मिल जावे तो बिना विलम्ब किये उसी को इच्छानुसार ग्रहण करे । पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक इन तीनों प्रकार से बनाया गया बिम्ब सभी प्रकार के बिम्ब के अभाव में हितकारी होता है । रत्न निर्मित पीठ पर अन्य बिम्ब का स्थापन निषिद्ध होता है ॥ ७७-७८ ॥ शिलालक्षणकथनम् लक्ष्म्याद्या देवताकाराः स्वोपलाः सर्वसिद्धिदाः । याऽऽहताऽनलबिन्दून् वै सनादमभिमुञ्चति ॥ ७९ ॥ पुमानिति शिला सा वै निस्तेजा सस्वनाऽबला । आदिमध्यावसानेषु नाग्निर्यस्या न च ध्वनिः ॥ ८० ॥ अब शिला के लक्षण कहते हैं—लक्ष्मी के आदि देवता के समान शिला सर्व सिद्धिदायिनी होती है । जो शिला आहत करने पर शब्द के साथ चिनगारी उत्पन्न करे वह शिला पुरुष है । जिसमें तेज नहीं है, मजबूती भी नही है, वह स्त्री शिला है । जिस शिला के आदि एवं मध्य में तथा अन्त में अग्नि न हो, शब्द न हो, वह शिला नपुंसक है ॥ ७९-८० ॥ नपुंसकेति सा ज्ञेया स्वपदस्था फलप्रदा । शिलाग्रहणमित्युक्तं दारुग्रहणमुच्यते ॥ ८१ ॥ ऐसी शिला अपने स्थान पर रहकर ही फल देती है । यहाँ तक बिम्ब के लिये शिला ग्रहण कहा गया । अब काष्ठ ग्रहण का विधान कहते हैं ॥ ८१ ॥ दारुग्रहणकथनम् आपर्वतान्तःसञ्चारो निर्व्रणं सरलं बृहत् । रोगमुक्तं न सिंहाद्यैः प्राङ्नखैः सक्षतीकृतम् ॥ ८२ ॥ नानिलाशनिदावाग्निहतवीर्यं न बाह्यगम् । सलक्षणे तु सुस्निग्धे भूभागे चोन्नते स्थितम् ॥ ८३ ॥ प्राग्वत् तमधिवास्यादौ परेऽहन्यर्चयेत् ततः । तदाश्रितामविज्ञातस्वरूपां देवतां पठन् ॥ ८४ ॥ इहाश्रितात्मने तुभ्यं नमः सर्वेश्वराय च । क्षमस्वावतरान्यत्र सन्तिष्ठात्र चिदात्मना ॥ ८५ ॥ जो पर्वत के अन्त तक (भीतरी भाग) पहुँचा हुआ है और प्राण रहित है, सीधा है, महान् है, उसके किसी भाग में रोग नहीं है, जिस पर सिंहादि द्वारा नखक्षत नहीं किया गया है, दावाग्नि, बिजली, अग्नि द्वारा जिसकी शक्ति क्षीण