सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५५५ नहीं हुई है, जो बाहर तक फैला है, जो लक्षण युक्त अत्यन्त चिकने भूभाग पर ऊँचे रूप में अवस्थित है। ऐसे दारु वाले वृक्ष को प्रथम अधिवासन करे। फिर दूसरे दिन उसका 'तदाश्रितामवज्ञातां ... सन्तिष्ठात्र चिदात्मना' पर्यन्त मन्त्र का पाठ करते हुए अर्चन करे ॥ ८२-८५ ॥ अथास्त्रोदकशुद्धेन विलिप्तेन घृतादिना । जपन् मन्त्रवरं वौषट् छिन्द्याद् वै क्रकचादिना ॥ ८६ ॥ तदनन्तर 'वौषट्' इस श्रेष्ठ मन्त्र का पाठ करते हुए अस्त्रोदक से शुद्ध घृतादि से अनुलिप्त क्रकच (आरा) से उस वृक्ष का छेदन करे ॥ ८६ ॥ प्राच्यामुदीच्यामैशान्यां पतत्यभिमुखं यदि । परिज्ञेयं शुभं कुर्यादन्यपातेऽर्चनादिकम् ॥ ८७ ॥ यदि वह वृक्ष पूर्व उत्तर अथवा ईशान दिशा में गिरे तब शुभ समझे। यदि अन्य दिशा में गिरे तब उसका अर्चन करे ॥ ८७ ॥ अनार्यं देवभागं चाप्यनादेयेन वै विना । बिम्बमिच्छति वै कर्तुं वार्क्षं चैवातिविस्तृतम् ॥ ८८ ॥ अनेकभुजवक्त्रास्त्रभूषितं तत् तरूत्थितैः । भिन्नैरवयवैर्मानयुक्तैः शिष्टैर्न दुष्यति ॥ ८९ ॥ उस वृक्ष के अनार्य भाग का त्याग कर देवभाग को ग्रहण करे। उसके भिन्न-भिन्न अवयवों (टुकड़ों) से मान (नाप) युक्त अनेक भुज, अनेक वक्त्र, अनेक अस्त्रों से युक्त जो बिम्ब निर्माण करता है ऐसे बिम्ब की शिष्ट लोग प्रशंसा करते हैं ॥ ८८-८९ ॥ बिम्बस्य मानोन्मानादिलक्षणकथनम् भक्तिश्रद्धावशाच्चैव सर्वं चार्णमयं यतः । एवमेकतमस्यापि भक्तिपूर्वस्य वस्तुनः ॥ ९० ॥ संग्रहं च पुरा कृत्वा कुर्यादाकारमीप्सितम् । तादर्थ्येन तु सामान्यं सौम्यमानं पुरा शृणु ॥ ९१ ॥ अथ बिम्बस्य सामान्यतो मानोन्मानादिलक्षणमाह—एवमेकतमस्यापीत्यारभ्य अयुग्जन्मोत्थितं शुभमित्यन्तम् ॥ ९१-१६० ॥ यतः भक्ति और श्रद्धा के कारण सभी वृक्ष शिलादि मन्त्रमय हैं। यहाँ तक 'सच्छैलदारुग्रहणम्' यहाँ से लेकर 'सर्व चार्णमयं ततः पर्यन्त 'शिला दारु संग्रहण' का विधान कहा (द्र २४.३३-९०) गया है। अब बिम्ब का सामान्य प्रकार से