भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

५५४ सात्वतसंहिता मिल जावे तो बिना विलम्ब किये उसी को इच्छानुसार ग्रहण करे । पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक इन तीनों प्रकार से बनाया गया बिम्ब सभी प्रकार के बिम्ब के अभाव में हितकारी होता है । रत्न निर्मित पीठ पर अन्य बिम्ब का स्थापन निषिद्ध होता है ॥ ७७-७८ ॥ शिलालक्षणकथनम् लक्ष्म्याद्या देवताकाराः स्वोपलाः सर्वसिद्धिदाः । याऽऽहताऽनलबिन्दून् वै सनादमभिमुञ्चति ॥ ७९ ॥ पुमानिति शिला सा वै निस्तेजा सस्वनाऽबला । आदिमध्यावसानेषु नाग्निर्यस्या न च ध्वनिः ॥ ८० ॥ अब शिला के लक्षण कहते हैं—लक्ष्मी के आदि देवता के समान शिला सर्व सिद्धिदायिनी होती है । जो शिला आहत करने पर शब्द के साथ चिनगारी उत्पन्न करे वह शिला पुरुष है । जिसमें तेज नहीं है, मजबूती भी नही है, वह स्त्री शिला है । जिस शिला के आदि एवं मध्य में तथा अन्त में अग्नि न हो, शब्द न हो, वह शिला नपुंसक है ॥ ७९-८० ॥ नपुंसकेति सा ज्ञेया स्वपदस्था फलप्रदा । शिलाग्रहणमित्युक्तं दारुग्रहणमुच्यते ॥ ८१ ॥ ऐसी शिला अपने स्थान पर रहकर ही फल देती है । यहाँ तक बिम्ब के लिये शिला ग्रहण कहा गया । अब काष्ठ ग्रहण का विधान कहते हैं ॥ ८१ ॥ दारुग्रहणकथनम् आपर्वतान्तःसञ्चारो निर्व्रणं सरलं बृहत् । रोगमुक्तं न सिंहाद्यैः प्राङ्नखैः सक्षतीकृतम् ॥ ८२ ॥ नानिलाशनिदावाग्निहतवीर्यं न बाह्यगम् । सलक्षणे तु सुस्निग्धे भूभागे चोन्नते स्थितम् ॥ ८३ ॥ प्राग्वत् तमधिवास्यादौ परेऽहन्यर्चयेत् ततः । तदाश्रितामविज्ञातस्वरूपां देवतां पठन् ॥ ८४ ॥ इहाश्रितात्मने तुभ्यं नमः सर्वेश्वराय च । क्षमस्वावतरान्यत्र सन्तिष्ठात्र चिदात्मना ॥ ८५ ॥ जो पर्वत के अन्त तक (भीतरी भाग) पहुँचा हुआ है और प्राण रहित है, सीधा है, महान् है, उसके किसी भाग में रोग नहीं है, जिस पर सिंहादि द्वारा नखक्षत नहीं किया गया है, दावाग्नि, बिजली, अग्नि द्वारा जिसकी शक्ति क्षीण

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५५ नहीं हुई है, जो बाहर तक फैला है, जो लक्षण युक्त अत्यन्त चिकने भूभाग पर ऊँचे रूप में अवस्थित है। ऐसे दारु वाले वृक्ष को प्रथम अधिवासन करे। फिर दूसरे दिन उसका 'तदाश्रितामवज्ञातां ... सन्तिष्ठात्र चिदात्मना' पर्यन्त मन्त्र का पाठ करते हुए अर्चन करे ॥ ८२-८५ ॥ अथास्त्रोदकशुद्धेन विलिप्तेन घृतादिना । जपन् मन्त्रवरं वौषट् छिन्द्याद् वै क्रकचादिना ॥ ८६ ॥ तदनन्तर 'वौषट्' इस श्रेष्ठ मन्त्र का पाठ करते हुए अस्त्रोदक से शुद्ध घृतादि से अनुलिप्त क्रकच (आरा) से उस वृक्ष का छेदन करे ॥ ८६ ॥ प्राच्यामुदीच्यामैशान्यां पतत्यभिमुखं यदि । परिज्ञेयं शुभं कुर्यादन्यपातेऽर्चनादिकम् ॥ ८७ ॥ यदि वह वृक्ष पूर्व उत्तर अथवा ईशान दिशा में गिरे तब शुभ समझे। यदि अन्य दिशा में गिरे तब उसका अर्चन करे ॥ ८७ ॥ अनार्यं देवभागं चाप्यनादेयेन वै विना । बिम्बमिच्छति वै कर्तुं वार्क्षं चैवातिविस्तृतम् ॥ ८८ ॥ अनेकभुजवक्त्रास्त्रभूषितं तत् तरूत्थितैः । भिन्नैरवयवैर्मानयुक्तैः शिष्टैर्न दुष्यति ॥ ८९ ॥ उस वृक्ष के अनार्य भाग का त्याग कर देवभाग को ग्रहण करे। उसके भिन्न-भिन्न अवयवों (टुकड़ों) से मान (नाप) युक्त अनेक भुज, अनेक वक्त्र, अनेक अस्त्रों से युक्त जो बिम्ब निर्माण करता है ऐसे बिम्ब की शिष्ट लोग प्रशंसा करते हैं ॥ ८८-८९ ॥ बिम्बस्य मानोन्मानादिलक्षणकथनम् भक्तिश्रद्धावशाच्चैव सर्वं चार्णमयं यतः । एवमेकतमस्यापि भक्तिपूर्वस्य वस्तुनः ॥ ९० ॥ संग्रहं च पुरा कृत्वा कुर्यादाकारमीप्सितम् । तादर्थ्येन तु सामान्यं सौम्यमानं पुरा शृणु ॥ ९१ ॥ अथ बिम्बस्य सामान्यतो मानोन्मानादिलक्षणमाह—एवमेकतमस्यापीत्यारभ्य अयुग्जन्मोत्थितं शुभमित्यन्तम् ॥ ९१-१६० ॥ यतः भक्ति और श्रद्धा के कारण सभी वृक्ष शिलादि मन्त्रमय हैं। यहाँ तक 'सच्छैलदारुग्रहणम्' यहाँ से लेकर 'सर्व चार्णमयं ततः पर्यन्त 'शिला दारु संग्रहण' का विधान कहा (द्र २४.३३-९०) गया है। अब बिम्ब का सामान्य प्रकार से

५५६ सात्वतसंहिता मान एवं उन्मान कहते हैं—इस प्रकार किसी एक वस्तु का भक्तिपूर्वक संग्रह कर अपने अभीष्ट आकार का बिम्ब निर्माण करे । अब हे सङ्कर्षण ! बिम्ब के आकार का मान सुनिये ॥ ९१ ॥ ऋज्वाख्यमविकारं च व्यापकं त्वेकमूर्तिमत् । भूभागे सुसमे श्लक्ष्णे मानमुत्कीर्य तेन वै ॥ ९२ ॥ निरूप्यावयवानां च लक्ष्म विस्तृतपूर्वकम् । जो ऋजु हो, व्यापक हो, एक मूर्त्ति में रहने वाला हो, ऐसे मान समतल चिकने वाले भूभाग पर खोद कर लिख लेवे । फिर विस्तारपूर्वक तत्तद् अङ्गावयवों के समस्त लक्षणों को अच्छी तरह देख कर बिम्ब निर्माण करे ॥ ९२-९३ ॥ मानपरिभाषाविधानम् अष्टाधिकशतांशो यः स्वोन्नतेरङ्गुलं च तत् ॥ ९३ ॥ द्वे अङ्गुले कलानेत्रं गोलकं भाव एव च । अङ्गुलादष्टभागो यः स यवः परिकीर्तितः ॥ ९४ ॥ षट्कलं च परिज्ञेयं तालं बिम्बादिकर्मणि । मुखाङ्गनाभिमेढ्रक्ष्मास्तालमानास्त्वथोरुयुक् ॥ ९५ ॥ द्विकले च तथा जङ्घे गुल्फं जानुर्गलाञ्चकम् । त्र्यङ्गुलं त्र्यङ्गुलं ज्ञेयमित्युन्मानमुदाहृतम् ॥ ९६ ॥ अब मान कहते हैं—मनुष्य की अपनी-अपनी ऊँचाई का मान एक सौ अङ्गुल कहा गया है । उसका १०८ वाँ भाग एक अङ्गुल होता है । दो अङ्गुल कला, नेत्र गोलक अथवा भाव कहा जाता है । एक अङ्गुल का आठवाँ भाग ‘यव’ कहा जाता है । छः कला का एक ताल होता है, जिसका उपयोग बिम्बादि कर्म में किया जाता है । मुखाङ्ग, नाभि, मेढ्र, क्ष्मा का मान एक ताल होता है तथा दोनों ऊरु दो-दो कला के होते हैं । जङ्घा, गुल्फ, जानु और गलाञ्चक तीन-तीन अङ्गुल के होने चाहिये । इस प्रकार उन्मान का निरूपण किया गया ॥ ९३-९६ ॥ जटाधराणां बिम्बानां दीर्घह्रस्ववशेन तु । चतुष्कलं च त्रिकलं मानं मानाद् बहिः क्षिपेत् ॥ ९७ ॥ जटाधारी बिम्बों के बड़े और छोटे होने के कारण चार कला का और तीन कला का मान कहा गया है । वह मान से बाहर भी हो सकता है ॥ ९७ ॥ त्रिपञ्चसप्तशिखरो मौलिरष्टकलोन्नतः ।

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५७ निर्जटानां ललाटोर्ध्वं मकुटं वा सुशोभनम् ॥ ९८ ॥ तालेन ह्रासवृद्धी तु कार्ये त्वत्र व्यपेक्षया । यथोदितेषु भागेषु एकैकेनाङ्गुलेन तु ॥ ९९ ॥ तीन, पाँच, सात शिखर का मौलि (मुकुट) आठ कला ऊँचा होना चाहिये । जटा रहित बिम्ब का ललाट के ऊपर सुन्दर मुकुट बनाना चाहिये । इसमें अपेक्षा के अनुसार यथोदित भाग में एक अङ्गुल से ताल पर्यन्त माप में घटा बढ़ी की जा सकती है ॥ ९८-९९ ॥ आस्यनासाललाटार्थं वदनांशं भजेत् त्रिधा । ततोऽग्रतः कलामानं घ्राणं स्यात् तिलपुष्पवत् ॥ १०० ॥ कलार्धेन तु विस्तारः सोन्नतिस्तत्पुटद्वये । नासाग्रग्रासनिर्मुक्तं गोजीमानं चतुर्यवम् ॥ १०१ ॥ तच्चतुर्यवमानेन घ्राणाग्रेणान्तरीकृतम् । अर्धाङ्गुलं चोत्तरोष्ठमधरोष्ठं तु चाङ्गुलम् ॥ १०२ ॥ मुख नासिका तथा ललाट के लिये मुख को तीन भागों में विभक्त कर बनाना चाहिये । उसमें सबसे आगे कला मान का घ्राण तिल पुष्प के समान बनाना चाहिये । नासिका के दोनो पुटों को ऊँचाई के साथ आधे कला के विस्तार (२ को) से युक्त बनावे । नासाग्र और ग्रास से बाहर गोजीमान चार यव का होना चाहिये । वह चार यव मान वाले घ्राण के अग्रभाग से अन्तरीकृत होना चाहिये । ऊपर का ओठ आधा अङ्गुल मोटा तथा अधरोष्ठ एक अङ्गुल मोटा होना चाहिये ॥ १००-१०२ ॥ गोलकं चिबुकं विद्धि सृक्किण्यौ चतुरङ्गुले । आद्यस्य नासिकांशस्य मध्यभागसमाश्रिते ॥ १०३ ॥ कुर्यान्नेत्रश्रुतिच्छिद्रे तत्र नेत्रे कलान्तरे । कलायामसमं दैर्घ्यात् कलार्धेन तु विस्तृतम् ॥ १०४ ॥ चिबुक गोलक प्रमाण का तथा दोनों सृक्किणी चार अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । पहली नासिका के मध्य भाग का आश्रय लेकर नेत्र और कान का छिद्र निर्माण करे । दोनों नेत्रों में एक कला का अन्तर होना चाहिये । उसकी लम्बाई एक कला और चौड़ाई आधी कला बनानी चाहिये ॥ १०३-१०४ ॥ यदुत्पलदलाकारं द्वियवेनाधिकं तु तत् । कुर्यात् पद्मदलाकारं नेत्रार्थं वृत्ततारकम् ॥ १०५ ॥

५५८ सात्वतसंहिता तारादैर्घ्यत्रिभागेन त्वाद्यस्यान्यस्य वाधिका। यवेनैकेन सार्धेन ज्योतिस्तत्पञ्चभागिकम्॥ १०६ ॥ जिसके नेत्र और कान कमल के समान बड़े हों, उन्हें दो यव से अधिक निर्माण करना चाहिए। गोलाकार तारे से युक्त नेत्र का अर्ध भाग कमल पत्र के आकार का बनावे। नेत्र का तारा चौड़ाई के तीन भाग में अथवा अन्य की अपेक्षा अधिक मान में निर्माण करे। उसके पाँचवे भाग में डेढ़ (१ १/२) यव ज्योति निर्माण करे॥ १०५-१०६ ॥ त्रिभागेनापि विहितं तत्पद्मदललोचन। द्विषड्यवं नेत्रकोशं विस्तरेण यवाधिकम्॥ १०७ ॥ हे पद्मलोचन! उस ज्योति का निर्माण तीसरे अंश से भी किया जा सकता है। नेत्र कोश बारह यव का तथा चौड़ाई में एक यव से अधिक निर्माण करना चाहिए॥ १०७ ॥ सार्धाङ्गुलद्वयं दैर्घ्याद् भ्रूलते द्विकले स्मृते। मध्यतो द्वियवे बालचन्द्रतुल्ये क्रमक्षते॥ १०८ ॥ भ्रूलता (भौंहें) ढाई अङ्गुल चौड़ी तथा दो कला की होनी चाहिये। दोनों मध्य बाल चन्द्रमा के समान टेढ़ी और क्रम क्षत दो यव की बनावे॥ १०८ ॥ तदन्तरं कलार्धं च तत्कोटी समसूत्रके। श्रोत्रे द्व्यङ्गुलविस्तीर्णे आयामेन द्विगोलके॥ १०९ ॥ उस भ्रू के दोनों किनारे समसूत्र तथा कलार्ध होने चाहिये। कान दो अङ्गुल चौड़े तथा लम्बाई में दो गोलक निर्माण करे॥ १०९ ॥ द्वियवः कण्ठपरिधिः पर्वणी द्वे चतुर्यवे। मध्यं ताभ्यां तथा विद्धि द्रोणी सार्धाऽङ्गुलाऽत्र वै॥ ११० ॥ कण्ठ की गोलाई दो यव तथा दोनो पर्व चार यव का बनाना चाहिये। उन दोनों का मध्य तथा द्रोणी डेढ़ १ १/२ अङ्गुल का बनाना चाहिये॥ ११० ॥ कलार्धेन तु तच्छिद्रं पाशमानं यथारुचि। अङ्गुलाद् द्विकलान्तं तु वैषम्यमपि तत्र यत्॥ १११ ॥ उसके छिद्र का मान आधा कला तथा पाश का मान इच्छानुसार करे। उसमें विषमता एक अङ्गुल से लेकर दो कला पर्यन्त होनी चाहिये॥ १११ ॥ अन्तश्छिद्रविनिर्मुक्तं तद्विज्ञेयं चतुर्यवम्। सदलं करणोपेतमेवं श्रोत्रद्वयं स्मृतम्॥ ११२ ॥

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५९ भीतरी भाग में छिद्र से विनिर्मुक्त चार यव के मान का सदल करणोपेत दोनो श्रोत्र होना चाहिये ॥ ११२ ॥ चतुष्कलं ललाटं तु शिखरे द्विगोलके । उच्छ्रायात् त्र्यङ्गुले चैव अग्रतोऽङ्गुलविस्तृते ॥ ११३ ॥ ललाट का विस्तार चार कला का तथा दोनों शिखर दो गोलक का होना चाहिये । उसकी ऊँचाई तीन अङ्गल तथा उसका अग्रभाग एक अङ्गुल विस्तृत होना चाहिये ॥ ११३ ॥ केशभूमेः समुद्भूतं ललाटोपरि संस्थितम् । कुर्यात् कलार्धमानं तु वक्त्रं चालकसञ्चयम् ॥ ११४ ॥ केश भूमि में उत्पन्न होने वाला ललाट के ऊपरी भाग में स्थित होने वाला मुख तथा अलक समूह (केश) कला के अर्धमान का होना चाहिये ॥ ११४ ॥ कपोलपरिधिं कुर्यात् कर्णात् कण्ठगतं समम् । तन्मध्ये वर्तुलौ गण्डौ परिच्छिन्नौ पुरोदितैः ॥ ११५ ॥ कान से आरम्भ कर कण्ठ पर्यन्त परिधि (गोला) का निर्माण करे उसके बीच में परिच्छिन्न और गोलाकार दो गण्डस्थल निर्माण करे ॥ ११५ ॥ शिरसः परिणाहं तु विद्धि षट्त्रिंशदङ्गुलम् । श्रोत्रकोटिद्वयाच्चैव मस्तकस्य यदन्तरम् ॥ ११६ ॥ तत्षोडशाङ्गुलं विद्धि वर्तिभ्यां पृष्ठतस्तथा । सार्धतालं परिज्ञेयं ललाटात् कगुहान्तरम् ॥ ११७ ॥ शिर का परिणाह (गोलाई) ३६ अङ्गुल में निर्माण करे, दोनों कान से लेकर मस्तक पर्यन्त १६ अङ्गुल होना चाहिये । ललाट से नासिका के छिद्र का अन्तर डेढ़ ताल (१ १/२) समझना चाहिये ॥ ११६-११७ ॥ सत्कम्बुसदृशी ग्रीवा मूलमध्याग्रतो हि सा । परिधेर्द्वादशकला एकविंशाङ्गुलाग्रतः ॥ ११८ ॥ बिम्ब की ग्रीवा मूल, मध्य तथा अग्रभाग में उत्तम प्रकार के शङ्ख के समान होनी चाहिये । परिधि से उसका मान द्वादश कला तथा आगे से २१ अङ्गुल होना चाहिये ॥ ११८ ॥ अष्टादशाङ्गुला चैव स्वांशात् त्र्यंशेन विस्तृता । तन्मूलं विस्तृतौ स्कन्धौ तुङ्गौ वृत्तायतौ समौ ॥ ११९ ॥ अथवा १८ अङ्गुल का होना चाहिये, उसका विस्तार अपने अंश से तीसरे

५६० सात्वतसंहिता अंश तक होना चाहिये। ग्रीवा का मूल एवं दोनों कन्धा विस्तृत, ऊँचा, गोल तथा आयताकार एवं सम होना चाहिये। उसका बाहुल्य छः अङ्गुल का होना चाहिये ॥ ११९ ॥ षडङ्गुलं तद्बाहुल्यं बाहुमानमथोच्यते। स्कन्धोत्तमाङ्गं त्रिकलं सन्ध्यन्तं षट्कलं स्मृतम् ॥ १२० ॥ अब बाहु का मान कहते हैं—कन्धे से लेकर शिर का मान तीन कला का और सन्ध्यन्त छः कला का कहा गया है ॥ १२० ॥ सन्धेर्वै मणिबन्धान्तं मानं नवकलं स्मृतम्। मणेर्मध्यमशाखान्तो हस्तः सप्ताङ्गुलो मतः ॥ १२१ ॥ सन्धि से लेकर मणिबन्ध तक का मान नव कला कहा गया है। मणि बन्ध से लेकर मध्यमाङ्गुलि पर्यन्त हाथ का मान सात अङ्गुल कहा गया है ॥ १२१ ॥ परिज्ञेयं कलाहीनं तन्मानं मध्यमाङ्गुलेः। तच्चतुर्यवहीना च साऽनामा तु प्रदेशिनी ॥ १२२ ॥ द्विकला च परिज्ञेया साङ्गुष्ठा तु कनीयसी। द्विपर्वा च स्मृतोऽङ्गुष्ठः सर्वाश्चाङ्गुलिविस्तृताः ॥ १२३ ॥ मणिबन्ध का मान मध्यमाङ्गुलि से एक कला कम समझना चाहिये और उससे चार यव कम अनामिका का तथा प्रादेशिनी का मान कहा गया है। कनिष्ठिका अङ्गुलि तथा अङ्गुष्ठ का मान दो कला कहा गया है। अङ्गुष्ठ में दो पर्व होते हैं, उसकी अपेक्षा सभी अङ्गुलियाँ लम्बी कही गई हैं ॥ १२२-१२३ ॥ सर्वासां मूलपर्यन्ताद् ह्रासयेच्च यवं यवम्। अग्रपर्वाधंमानेन कार्या लिङ्गोपमा नखाः ॥ १२४ ॥ सभी अङ्गुलियाँ मूल पर्यन्त परस्पर एक दूसरे से एक-एक यव कम हैं आगे के पर्व के आधे के मान में अङ्गुली की आकृति के समान नख का निर्माण करना चाहिए ॥ १२४ ॥ मानमङ्गुष्ठमूलस्य परिधेश्चतुरङ्गुलम्। तच्चतुर्यवहीनं च ज्ञेयं त्रिष्वङ्गुलीषु च ॥ १२५ ॥ अङ्गुष्ठ के मूल का मान परिधि की अपेक्षा चौगुना कहा गया है। शेष तीन अङ्गुलियों में वह मान चार यव कम होता है ॥ १२५ ॥ न्यूनाङ्गुलेः कला सार्धा प्राग्वद् ह्रासश्च वेष्टनात्। अङ्गुष्ठमङ्गुलं चाग्रात् तिस्रोऽन्याः षड्यवाः स्मृताः ॥ १२६ ॥

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६१ अर्धाङ्गुलाग्रतो न्यूना विद्धि मध्यं क्रमक्षतम् । निजलक्ष्मोपलं चाग्रात् साङ्गुलं द्विकलं करम् ॥ १२७ ॥ कनिष्ठा अङ्गुली सार्ध कला (१ १/२) तथा अङ्गुष्ठ मूल वेष्टन से कम होनी चाहिये । अन्य तीन अङ्गुलियाँ छः यव की कही गई हैं । मध्य अङ्गुलि आगे से आधा अङ्गुल कम तथा क्रमशः हीन निर्माण करे ॥ १२६-१२७ ॥ ईषन्निम्नतलं चैव लक्ष्मरेखाविभूषितम् । शाखामूलावधेः पाणी बाहुल्यं द्वे यवेऽङ्गुलम् ॥ १२८ ॥ चतुर्यवाधिकं चैव मणिबन्धावधेः स्मृतम् । मध्ये कलार्धहीनं तु तद्बाहुल्यमुदाहृतम् ॥ १२९ ॥ ईषन्निम्नतल तथा लक्ष्मरेखा से विभूषित अङ्गुली पर्यन्त हाथ का निर्माण करे और उसका बाहुल्य दो यव युक्त एक अङ्गुल बनाये तथा मणिबन्धावधि पर्यन्त चार यव से अधिक निर्माण करे । उसका बाहुल्य मध्य में आधा कला से कम रखे ॥ १२८-१२९ ॥ मणिबन्धावधेर्बाहुवेष्टनं षट्कलं स्मृतम् । सन्धेः सप्तकलं विद्धि साङ्गुलं त्रियवच्युतम् ॥ १३० ॥ हीनमर्धाङ्गुलेनैव मूलाद् वै नवगोलकम् । तथैव सन्धेरूर्ध्वात् तु विस्तारः प्राग्वदत्र च ॥ १३१ ॥ मणिबन्ध पर्यन्त बाहु का वेष्टन छः कला का निर्माण करे । सन्धि सात कला की तथा तीन यव कम एक अङ्गुल युक्त होनी चाहिए । वह मूल से आधा अङ्गुल कम नव गोलक की होनी चाहिये । उसी प्रकार सन्धि की लम्बाई भी बनावे ॥ १३०-१३१ ॥ अत्रापि पूर्ववद् दृष्ट्या कार्याऽन्तःस्था क्षितिः स्वयम् । तालं गलावधेस्त्यक्त्वा तन्मानेनान्तरीकृतम् ॥ १३२ ॥ यहाँ भी पहले की तरह गले की अवधि से एक ताल स्थान त्याग देवे और उतने ही मान के अन्तर में दृष्टि पर्यन्त भीतरी स्थान खाली रहने दे ॥ १३२ ॥ स्तनद्वयं समं कुर्यात् तद्धारा च समांसला । निम्नं हृद्गोलकार्धेन ऊर्ध्वतो रत्नराड्यूतम् ॥ १३३ ॥ दोनों स्तन समान आकृति में निर्माण करे । उसकी धार मांसल (मोटा) युक्त बनावे । उसका निचला भाग हृद्गोलक के आधे भाग से तथा ऊपरी भाग रत्नराज से युक्त बनावे ॥ १३३ ॥

५६२ सात्वतसंहिता स्तनाभ्यां त्रिकलौ पार्श्वौ त्रियवं स्तनमण्डलम् । यवोन्नतं तथा चाग्राद् विस्तृतं तेन चूचुकम् ॥ १३४ ॥ पार्श्व भाग स्तन से दूर दो कला का बनावे । स्तनमण्डल तीन यव का बनावे । स्तन का चुचुक आगे की ओर बढाते हुए एक-एक यव ऊँचा बनावे ॥ १३४ ॥ लोचनं त्रियवं सार्धं कक्षमानमुदाहृतम् । स्कन्धमानविनिर्मुक्तं पृष्ठमंसावधेः समम् ॥ १३५ ॥ कक्ष (काँख) का मान साढे तीन यव युक्त लोचन निर्माण करे । उसे स्कन्ध के मान से अलग रखे । पीठ एवं कन्धे तक उसे समान रूप में निर्माण करना चाहिए ॥ १३५ ॥ द्रोणीनिकाशसदृशं मध्यराशेः समांसलम् । कक्षान्तर्वेष्टनं विद्धि पञ्चतालं सुलोचनम् ॥ १३६ ॥ वह द्रोणी (दोना) के समान हो । मध्यराशि से मांसल युक्त हो । कक्षान्तर का वेष्टन पञ्चताल मान का होना चाहिए ॥ १३६ ॥ विनाङ्गुलद्वयेनैव द्वे ताले द्विगुणीकृते । यवत्रयसमायुक्ते विद्धि तत्कुक्षिवेष्टनम् ॥ १३७ ॥ त्रियवोनं कलामानं विज्ञेयं नाभिमण्डलम् । तन्मानं त्रियवोनं तु तन्निम्नत्वं विधीयते ॥ १३८ ॥ उस कुक्षि का वेष्टन दो अङ्गुल कम दो ताल का दुगुना करे । उसमें तीन यव और मिला देवे तब कुक्षि का वेष्टन बन जाता है । तीन यव से कम कला मान का नाभिमण्डल निर्माण करे । उसकी गहराई तीन यव से कुछ कम करे ॥ १३७-१३८ ॥ परिधिर्नाभिमध्ये तु त्रितालः सत्रिलोचनः । षड्गोलकं च तन्मानपरिध्यर्थं कटेः स्मृतम् ॥ १३९ ॥ नाभि के मध्य की परिधि सत्रिलोचन तीन ताल की बनावे । कटि पर्यन्त परिधि के लिये उसका मान छः गोलक करे ॥ १३९ ॥ करिकुम्भोपमौ पीनौ परितः पञ्चगोलकौ । स्फिजौ कौपीनराजी च द्व्यङ्गुला मूलतः स्मृता ॥ १४० ॥ हाथी के कुम्भ के समान मोटा, चारों ओर पाँच गोलक का परिमाण वाला स्फिक् (नितम्ब) करे कौपीन राजी मूल से दो अङ्गुल की बनावे ॥ १४० ॥ परितोऽङ्गुलमाना सा मेढ्रं तु त्रिकलं स्मृतम् ।

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६३ चतुर्यवं च तत्कोशं वेष्टनं तु षडङ्गुलम् ॥ १४१ ॥ द्व्यङ्गुलौ वृषणौ दैर्घ्यान्मूलान्तसमविस्तृतौ । परितो द्व्यङ्गुलं विद्धि वायुरन्ध्रं सुवर्तुलम् ॥ १४२ ॥ वह चारों ओर एक अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । मेढ्र (लिंग) तीन कला का होना चाहिये और उसका कोश चार यव का होना चाहिये । उसकी गोलाई छः अङ्गुल होनी चाहिये । अण्डकोश लम्बाई चौड़ाई में समान दो अङ्गुल का तथा वायु का रन्ध्र (गुदा) चारों ओर से गोला दो अङ्गुल का बनावे ॥ १४१-१४२ ॥ ऊरुमानं परिज्ञेयं मध्यभूमेर्नवाङ्गुलम् । षट्कलं मूलदेशाच्च अग्रान्तं त्रिकलं स्मृतम् ॥ १४३ ॥ मध्य भूमि से नव अङ्गुल के मान का ऊरु होना चाहिये । मूल देश से छः कला का तथा अग्रान्त तीन कला का होना चाहिये ॥ १४३ ॥ हीनमेकाङ्गुलेनैव द्विकलं जानुमण्डलम् । विस्तारेणोन्नतत्वेन चतुर्यवसमं तु तत् ॥ १४४ ॥ एक अङ्गुल से कम दो कला मान का जानु मण्डल होना चाहिये । विस्तार और उन्नति में उसे ४ यव का बनाना चाहिये ॥ १४४ ॥ जङ्घामूले परिज्ञेयं वेष्टनं नवगोलकम् । द्विसप्ताङ्गुलकं मध्ये सार्धपञ्चाङ्गुलं ततः ॥ १४५ ॥ जङ्घा, मूल में वेष्टन का मान नव गोलक होना चाहिये । मध्य में चौदह अङ्गुल और उसके बाद साढ़े पाँच अङ्गुल होना चाहिये ॥ १४५ ॥ अत्रापि वेष्टनाद् विद्धि तृतीयांशेन विस्तृतम् । मध्यमूलावसानेभ्यो विस्तारमनुगुण्य तु ॥ १४६ ॥ यहाँ पर भी वेष्टन से मध्य, मूल तथा अन्त तक का विस्तार तृतीयांश से विस्तृत करे ॥ १४६ ॥ भुजाभ्यां मध्यदेशस्य तथाङ्गुलिगणस्य च । ऊरुयुग्मस्य जङ्घाभ्यामापाद्या द्विपहस्तता ॥ १४७ ॥ दोनों भुजाओं के मध्य देश अङ्गुलिगणों को, दोनों ऊरुओं को, दोनों जाङ्घों को हाथी के हाथ के समान उतार चढ़ाव युक्त निर्माण करे ॥ १४७ ॥ सतालभागमानं च दैर्घ्यं वै चारणं स्मृतम् । पार्ष्णी द्विगोलकतते तन्मध्ये साङ्गुले कले ॥ १४८ ॥

५६४ सात्वतसंहिता चरण की दीर्घता ताल के भाग के मान के अनुसार होनी चाहिये। पाष्र्णी दो गोलक विस्तृत होना चाहिये। उन दोनों का मध्य एक अङ्गुलि सहित दो कला होना चाहिये ॥ १४८ ॥ त्रिकलं चायताञ्चैव बाहुल्येन कलासमम्। पादमङ्गुष्ठनिकटात् त्रियवोनं प्रकीर्तितम् ॥ १४९ ॥ बाहुल्यं च कलामानं गुल्फदेशाच्च साङ्गुलम्। कनीयोऽङ्गुलिमूलाच्च गुल्फान्तं पिण्डिकाङ्गुलम् ॥ १५० ॥ आगे से तीन कला बाहुल्य होना चाहिए और एक कला के समान अङ्गुष्ठ के निकट से पाद का मान तीन यव कम कहा गया है। गुल्फ प्रदेश से कला मान अङ्गुलि सहित एक कला रखे। कनिष्ठ अङ्गुलि के मूल से लेकर गुल्फ पर्यन्त पिण्डिका एक अङ्गुल निर्माण करनी चाहिए ॥ १४९-१५० ॥ जङ्घावसानदेशाच्च वेष्टनं सप्तलोचनम्। कलाहीनं तदैवाग्रात् परिणाहो विधीयते ॥ १५१ ॥ जङ्घा के अन्त तक वेष्टन (= गोलाई १) सात लोचन रखे। उसके आगे से परिणाह कलाहीन निर्माण करे ॥ १५१ ॥ चरणं विधिनानेन कूर्मपृष्ठं समाप्य च। त्र्यङ्गुलेन च तद्धैर्ध्यादङ्गुष्ठस्य च दीर्घता ॥ १५२ ॥ इस प्रकार कूर्मपृष्ठ के समान चरण का निर्माण समाप्त कर उसकी लम्बाई से तीन अङ्गुल के परिमाण में अङ्गुष्ठ का लम्ब निर्माण करे ॥ १५२ ॥ पञ्चाङ्गुलः परिज्ञेयः परिधिस्तस्य लाङ्गलिन्। यवद्वयाधिका कार्या तद्धैर्ध्यात् तु प्रदेशिनी ॥ १५३ ॥ हे लाङ्गलिन्! उसकी परिधि पाँच अङ्गुल निर्माण करे और प्रदेशिनी अङ्गुलि अङ्गुष्ठ की लम्बाई की अपेक्षा दो यव अधिक निर्माण करे ॥ १५३ ॥ अङ्गुष्ठायामतुल्याऽथ कार्या वै पादमध्यमा। मध्याङ्गुलेर्द्विरष्टांशहीना तदनु या स्थिता ॥ १५४ ॥ अङ्गुष्ठ के आयाम के तुल्य पैर की मध्यमा अङ्गुलि का निर्माण करे। मध्यमा अङ्गुलि के बाद जो (अनामिका) अङ्गुलि स्थित है उसका निर्माण मध्यमा की अपेक्षा १६ अंश कम में करे ॥ १५४ ॥ तद्वत् तदनुगा या च त्रिपर्वास्तास्तु पूर्ववत्। संयुक्ता नखजालेन कूर्मपृष्ठोपमेन च ॥ १५५ ॥

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६५ उसी प्रकार उसके बाद वाली अङ्गुली जिसमें तीन ही पर्व (गाँठ) है वह उस कनिष्ठा का निर्माण करे। सभी अङ्गुलियाँ नखजाल से संयुक्त तथा कूर्मपृष्ठ के समान निर्माण करे ॥ १५५ ॥ द्विकलं तु कलाधोनं पादतर्जनिवेष्टनम्। चतुश्चतुर्यवोनं च तच्छेषाणां प्रकीर्तितम् ॥ १५६ ॥ पैर की तर्जनी का वेष्टन आधा कला कम कर दो कला का निर्माण करे। शेष अङ्गुलियों का वेष्टन क्रमशः ४-४ यव निर्माण करे ॥ १५६ ॥ त्र्यंशेन वेष्टनाद् विद्धि सर्वासां चैव विस्तृतिम्। सर्वा समांसलाः सौम्याः समास्त्ववयवाः शुभाः ॥ १५७ ॥ सभी अङ्गुलियों का विस्तार वेष्टन (गोलाई) की अपेक्षा तृतीयांश कम रखे। वे सभी अङ्गुलियाँ मांसल युक्त सौम्य तथा समान अवयव वाली हों तो शुभकारक कही गई है ॥ १५७ ॥ दर्शनावलिबाह्यस्थे दंष्ट्रे सप्तयवोन्नते। यवद्वयोन्नतं मानं मध्यदन्तचतुष्टये ॥ १५८ ॥ दर्शनावलि के बाहर वाले दो दाँत सात यव ऊँचे बनावे। शेष मध्य का चार दाँत दो यव उन्नत बनावे ॥ १५८ ॥ तत्पक्षाणां सर्वेषां मानं विद्धि चतुर्यवम्। त्रियवं द्विजविस्तारमग्रान्मूलाद् यवद्वयम् ॥ १५९ ॥ उसके पक्ष में रहने वाले सभी दाँतों का मान चार यव बनाना चाहिये। उनका विस्तार दो यव और उसके आगे का तथा मूल का विस्तार भी दो यव निर्माण करे ॥ १५९ ॥ तत्सार्धं मध्यदेशाच्च सर्वे दन्ता निरन्तराः। लोम प्रदक्षिणावर्तमयुग्जन्मोत्थितं शुभम् ॥ १६० ॥ मध्यदेश के साथ-साथ सभी दाँत अन्तररहित निर्माण करे। लोम प्रदक्षिणा- वर्त्त करे तथा उसमें विषय लोभ उत्पन्न हों तो वे शुभावह कहे गये हैं ॥ १६० ॥ सुनिश्चितं हितं चैतन्मानमव्यभिचारि यत्। मनोहारित्वमेकत्र रूपलावण्यभूषितम् ॥ १६१ ॥ सर्वदा चानयोर्विद्धि अन्योन्यत्वेन संस्थितिम्। एवमुक्तस्य मानादेः किञ्चिद्वैषम्येऽपि सौंदर्यातिशयविशिष्टं चेद् बिम्बमुपादेयम्, सौंदर्याभावेऽपि मानयुक्तं चेत् तदपि ग्राह्यम्। ताभ्यां द्वाभ्यामप्युज्झितं चेत्, तत्

५६६ सात्वतसंहिता त्याज्यमिति सलौकिकदृष्टान्तमाह—सुनिश्चितमिति सार्धैश्चतुर्भिः ॥ १६१-१६५ ॥ इस प्रकार पूर्व में कहे गये मान की अपेक्षा बिम्ब में मान की विषमता होने पर भी यदि वह सौन्दर्यातिशय से विशिष्ट है तो वह उपादेय (संग्राह्य) है । यदि सौन्दर्यादि गुण से रहित है किन्तु मान से प्रमाणित है तो उपादेय है । किन्तु सौन्दर्य एवं मान दोनों से रहित है तो वह त्याज्य है ॥ १६०-१६२ ॥ सुसौन्दर्यं तु मानस्य क्वचिदाक्रम्य वर्तते ॥ १६२ ॥ लावण्यस्य क्वचिन्मानं समाच्छाद्यावतिष्ठते । कहीं सुसौन्दर्य मान का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है कहीं मान सुसौन्दर्य का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है ॥ १६२-१६३ ॥ यथातिरूपवान् लोके दरिद्रोऽप्येति मान्यताम् ॥ १६३ ॥ विरूपोऽप्यतिवित्ताढ्यो नारूपो नैव निर्धनः । एवं द्वयोज्झितं बिम्बमनादेयत्वमेति च ॥ १६४ ॥ आदेयमेकयुक्तं च नित्यं यस्मान्महामते । जिस प्रकार दरिद्र होने पर भी अतिरूपवान् लोक में प्रतिष्ठित होता है अथवा अत्यन्त धनवान् होने से रूप रहित विरूप भी लोक में प्रतिष्ठित होता है । किन्तु जो अरूप है, निर्धन है, अर्थात् रूप और धन दोनों से रहित है, वह लोक में अप्रतिष्ठित रहता है । इसी प्रकार सौन्दर्य और मान रहित बिम्ब लोक में अनुपयोगी होता है ॥ १६३-१६५ ॥ सम्यङ्माने च सौन्दर्ये भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १६५ ॥ मान्त्रसन्निधिशक्तिर्वै सफला ह्यवतिष्ठते । सा सम्यक् प्रतिपन्नस्य बिम्बे दृग्गोचरस्थिते ॥ १६६ ॥ आमूर्ताह्लादयत्याशु ज्ञात्वैवं यत्नमाचरेत् । मानोन्मानप्रमाणानामथ सौन्दर्यसिद्धये ॥ १६७ ॥ एवं बिम्बस्य प्रमाणवत्त्वे सौन्दर्यवत्त्वे च "आभिरूप्याच्च बिम्बस्य" इत्युक्तरीत्या निरतिशयाह्लादजननी भगवत्सान्निध्यशक्ति(बि?र्बि)म्बे स्वत एवाविर्भूता सफलाऽवतिष्ठते, अतस्तदर्थं सुतरां यत्नः कार्य इत्याह—सम्यङ्माने चेति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १६५-१६७ ॥ हे महामते सङ्कर्षण ! सौन्दर्य और मान इन दोनों में किसी एक से युक्त होने से बिम्ब निरतिशयाह्लाद जननी भगवत्सान्निध्य विष्णु शक्ति स्वतः आविर्भूत होकर सफला होकर प्रतिष्ठित हो जाती है । इसलिये साधक को वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए ॥ १६५-१६७ ॥ ऋजोः सुसमपादस्य त्र्यङ्गुलं चरणान्तरम् ।

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६७ तद् वै विषमपादस्य अग्रात् तालसमं स्मृतम् ॥ १६८ ॥ समपादविषमपादबिम्बानां सूत्रेणावयवसाम्यपरीक्षामह—ऋजोः सुसमपादस्ये- त्यारभ्य बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिरित्यन्तम् ॥ १६८-१७४ ॥ समपाद एवं विषमपाद वाले बिम्बों का सूत्र से अवयव साम्य की परीक्षा— जिसका पैर सीधा हो, समतल हो, उसके चरणों का अन्तर तीन अङ्गुल होता है । विषमपाद के आगे का अन्तर एक ताल के बराबर होता है ॥ १६७-१६८ ॥ तत्पाष्णिर्द्वयमध्यात् तु परिज्ञेयं द्विगोलकम् । स्थित्यर्थं ब्रह्मनाड्या वै तथा मार्गद्वयस्य च ॥ १६९ ॥ सूत्रेण सुसमे कुर्याद् देहोत्थे दक्षिणोत्तरे । समपादस्य बिम्बस्य ललाटान्मेढ्रमस्तकम् ॥ १७० ॥ प्रसार्य सूत्रमाच्छाद्य तेन नाभिहृदन्तरम् । घ्राणाग्रमलकानां च सन्धिर्यस्तिलकोध्वंगः ॥ १७१ ॥ एवं विषमपादस्य दक्षाङ्गुष्ठाग्रगं नयेत् । गात्रसाम्यं समापाद्यं क्षेत्रात् क्षेत्रगतेन च ॥ १७२ ॥ सूत्रेण सर्वबिम्बानां वैषम्यविनिवृत्तये । चतुस्त्रिद्व्यश्रिपरितः परिशुद्धा यतः शुभाः ॥ १७३ ॥ अशुभाऽपरिशुद्धा तु बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिः। वही अन्तर उसके दोनों पाणि के मध्य से दो गोलक समझना चाहिये । ब्रह्मनाडी और उसके दोनों मार्ग की स्थिति के लिये देह के दक्षिण और उत्तर भाग को सूत्र के समान बनावे । समपाद वाले बिम्ब के ललाट से मेढ़ मस्तक तक नाभिहृदय को, घ्राणाग्र अलक की सन्धि, जो तिलक के ऊपर रहती है उसको, सूत को लम्बा कर उससे आच्छादित करे । इसी प्रकार समपाद एवं विषमपाद के सूत्र को भी दाहिने हाथ के अङ्गुष्ठ के अग्रभाग तक ले जावे । इस प्रकार क्षेत्र से क्षेत्रगत तक गात्रसाम्य की समता करे । उस सूत्र से सभी बिम्बों की विषमता की निवृत्ति के लिये चार, तीन एवं दो आवे तो वह चारों ओर से शुद्ध समझना चाहिये । वही शुभ है किन्तु बिम्ब से होने वाले अवयवी स्थिति अपरिशुद्ध एवं अशुभ है ॥ १६९-१७४ ॥ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणकथनम् ललाटमश्ववक्त्रस्य विस्ताराद् द्वादशाङ्गुलम् ॥ १७४ ॥ अथ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणमाह— ललाटमश्ववक्त्रेत्यादिभिः ॥ १७४-१८० ॥

५६८ सात्वतसंहिता अब हयग्रीव के मुख का लक्षण कहते हैं—हयग्रीव का ललाट विस्तार की दृष्टि से बारह अङ्गुल कहा गया है ।। १७४ ।। अष्टलोचनमायामाद् अग्रतश्चतुरङ्गुलम् । कलार्धसुषिरे घ्राणरन्ध्रे भागान्तरीकृते ।। १७५ ।। आयाम ( ) आठ लोचन कहा गया है, उसका अगला भाग चार अङ्गुल का तथा दो भागों में प्रविभक्त छिद्र घ्राणरन्ध्र कला का आधा कहा गया है ।। १७५ ।। अष्टाङ्गुले तु हनुके सृक्किण्यौ द्वेऽथ तत्समे । मध्यतः श्रोत्रशुक्ती द्वे द्व्यङ्गुले द्विकलोन्नते ।। १७६ ।। हनु आठ अङ्गुल का तथा दोनों सृक्किणी उसी के बराबर हो । श्रोत्र की दोनों शुक्ती मध्य से दो-दो अङ्गुल तथा दो कला ऊँची होनी चाहिये ।। १७६ ।। द्व्यङ्गुलं घ्राणवंशं तु तदूर्ध्वं द्विकलं स्मृतम् । विद्धि वक्त्रविकासं च द्वियवं चाग्रतः क्रमात् ।। १७७ ।। घ्राणवंश दो अङ्गुल का तथा उसकी ऊँचाई दो कला की होनी चाहिये । आगे की ओर किया जाने वाला मुख का विकास दो यव कहा गया है ।। १७७ ।। तमेव हि यवांशेन हन्वन्तं तनुतां नयेत् । घ्राणवंशस्य पक्षौ द्वौ मध्यनिम्नौ च संहतौ ।। १७८ ।। उसी मुख विकास को हनु पर्यन्त यवांस परिमाण में सूक्ष्म निर्माण करे । घ्राणवंश के दोनों पक्ष मध्य में निम्न बनावे और शेष को समान बनावे ।। १७८ ।। यवद्वयेन सार्धेन दृग्घ्राणाभ्यां तु चान्तरे । अथो दलं तु दृग्द्रोणेर्यवमानेन सन्ञ्चितम् ।। १७९ ।। ललाटं सालकं प्राग्वद् दृङ्मध्यं साङ्गुला कला । नेत्र और दोनों घ्राण का अन्तर सार्ध यव द्वय (२ ½ यव) रखे । अलक (केश) युक्त ललाट पूर्व की भाँति द्वादश अङ्गुल रखे । दोनों दृष्टियों का मध्य भाग एक अङ्गुल से युक्त कला परिमाण में निर्माण करे ।। १७९-१८० ।। श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणकथनम् नृसिंहस्य मुखे विद्धि परितश्चाष्टलोचनम् ।। १८० ।। ततोऽष्टकण्ठदेशाच्च कुर्यात् कर्णद्वयोज्झितम् । तत्कर्णद्वयमानेन ललाटान्तं नयेत् पुनः ।। १८१ ।। प्रमाणात् प्राक् प्रणीताच्च संरम्भाद्यातलक्षणम् । प्रफुल्लविकसच्छिद्रं घ्राणवंशान्वितं भवेत् ।। १८२ ।।

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५६९ श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणमाह—श्रीनृसिंहस्येत्यादिभिः ॥ १८०-१८८ ॥ अब नृसिंह के मुख का परिमाण कहते हैं—नृसिंह का मुख चारों ओर आठ लोचन करे, दोनों कानों को छोड़कर कण्ठ देश से भी आठ लोचन बनावे। पुनः दोनों कानों के मान से भी ललाट पर्यन्त उतनी ही दूरी रखे। घ्राणवंश की दोनों नासिकाओं का छिद्र प्रफुल्ल और विकसित निर्माण करे ॥ १८१-१८२ ॥ तच्छिद्रे पूर्वमानाच्चाप्यस्य वै त्रियवाधिकम्। सगोलमुत्तराङ्गेषु सकलांशं च लोचनम् ॥ १८३ ॥ वे छिद्र पूर्वमान की अपेक्षा आप्य से तीन यव अधिक होने चाहिये। उत्तर अङ्ग में लोचन गोल एवं कलांश युक्त होना चाहिये ॥ १८३ ॥ अधरोष्ठं परिज्ञेयं सचतुर्यवमङ्गुलम्। सार्धं चतुष्कलं वक्त्रं शेषायामो हनोः स्मृतः ॥ १८४ ॥ अधरोष्ठ चार यव सहित एक अङ्गुल का समझना चाहिये। साढे चार कला का मुख होना चाहिये, शेष आयाम हनु का होता है ॥ १८४ ॥ तद्विकासः परिज्ञेयो नेत्रमानं यवाधिकम्। अग्रतो ह्रासमायाति सृक्किण्यन्तं हि चाङ्गुलम् ॥ १८५ ॥ सर्ववृत्तं तदर्धेन नेत्रयुग्मं सविस्मयम्। पूर्ववद् विस्तृतं श्रोत्रं कलाधोनं तदुन्नतेः ॥ १८६ ॥ वक्त्र का विकास एक तथा यव से अधिक नेत्र का मान होना चाहिये। आगे से सृक्किणी पर्यन्त वह एक अङ्गुल ह्रास हो जाता है। उसका आधा सर्ववृत्त कहा जाता है। वही विस्मय सहित होने पर नेत्र युग्म कहा जाता है। श्रोत्र पूर्ववत् विस्तृत बनाना चाहिये जो उसकी ऊँचाई से आधा कला कम होवे ॥ १८५-१८६ ॥ तुल्या चेन्दुकला युग्मयोगस्य भ्रूस्त्रिगोलका। तन्मध्यं तु कलामानं शङ्खावर्तोपमं महत् ॥ १८७ ॥ भागमानं सटावृत्तं कार्यं तच्छिरसि स्फुटम्। इन्द्रकला तुल्य बनानी चाहिये। भ्रू तीन गोलक होना चाहिये, भ्रू उसका मध्य कला मान का तथा महान शङ्खावर्त्त के समान होना चाहिये ॥ १८७-१८८ ॥ वराहवक्त्रलक्षणकथनम् दैर्घ्येण सार्धतालं च क्ष्माधरस्याननं स्मृतम् ॥ १८८ ॥ विस्तारेण ललाटाच्च तन्मानं द्व्यङ्गुलोञ्झितम्। सौम्यरूपस्य च विभोः प्रोद्यतस्य कलोञ्झितम् ॥ १८९ ॥ सा० सं० - 40

५७० सात्वतसंहिता अथ वराहवक्त्रलक्षणमाह—दैर्घ्येण सार्धतालं चेत्यादिभिः ॥ १८८-१९४ ॥ अब वराह के मुख का लक्षण कहते हैं—वराह का मुख लम्बाई में १ १/२ डेढ़ ताल होना चाहिये । विस्तार में ललाट तक उसका मान दो अङ्गुल कम होना चाहिये । सौम्य रूप पृथ्वी उद्धार के लिये उद्यत उन विभु का मुख एक कला रहित होना चाहिये ॥ १८८-१८९ ॥ तच्चतुर्थांशमानेन पोत्रदेशस्य विस्तृति । तस्योपरिष्टाद् बाहुल्यं तत्समं चाङ्गुलं त्वधः ॥ १९० ॥ उनके पौत्र देश का विस्तार मान में चतुर्थांश होना चाहिये । उसके ऊपर का बाहुल्य उसके समान होना चाहिये और नीचे का मान एक अङ्गुल होना चाहिये ॥ १९० ॥ हनुद्वयस्य वै मानं सार्धं सप्ताङ्गुलं स्मृतम् । शेषमाननरन्ध्रं तु सृक्किणीभ्यां यदन्तरम् ॥ १९१ ॥ वाराह के दोनों हनु का मान सात अङ्गुल कहा गया है । शेष मुख का छिद्र दोनों सृक्किणी में जितना अन्तर है उतना होता है ॥ १९१ ॥ तद्विकासश्च सार्धेन कलार्धेनाग्रदेशतः । स एवाङ्गुलमानेन विज्ञेयः सृक्किणीद्वयात् ॥ १९२ ॥ उसका विकास अग्रदेश से सार्ध कलार्ध मान का होता है, दोनों सृक्किणियों से वह विकास एक अङ्गुल मान का होता है ॥ १९२ ॥ घ्राणरन्ध्रं च वक्त्रोक्ते दंष्ट्रे द्व्यर्थकलोन्नते । नासावंशं यथापूर्वं कदलीनाडिपृष्ठवत् ॥ १९३ ॥ नाक का छिद्र मुख के दो दाँत द्वयार्ध कला उन्नत होना चाहिये । नासावंश (प्रशस्त नासिका) यथापूर्व केला की नाड़ी के पृष्ठभाग के समान करे ॥ १९३ ॥ श्रोत्रे वाजिमुखोक्ते तु कोटेः सप्तकलान्तरे । तत्तुल्ये लोचने किन्तु प्रान्ततीक्ष्णे यवोज्झिते ॥ १९४ ॥ दोनों श्रोत्र हयग्रीव के मुख के समान एवं दोनों किनारों का अन्तर सात कला का होना चाहिए । लोचन भी उतने ही बसबर जो दोनों प्रान्त में तीक्ष्ण और यव से कम होने चाहिये ॥ १९४ ॥ एतेषां विहिता ग्रीवा ह्यङ्गुलद्वितयेन तु । प्रत्येकदेशात् संयुक्ता सौम्यमूर्त्युदिता च या ॥ १९५ ॥

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७१ अथ हयग्रीवादीनां ग्रीवाद्यवयवलक्षणानि त्रिचतुःपञ्चवक्त्रादिबिम्बस्य मुखाद्य- वयवलक्षणानि चाह— एतेषां विहिता ग्रीवेत्यारभ्य कृता भवति सिद्धिदेत्यन्तम् ॥ १९५-२१४ ॥ अब हयग्रीव के ग्रीवादि का लक्षण जो तीन, चार और पाँच संख्यक मुख वाला है, उस मुख बिम्ब के अवयवादि लक्षण कहते हैं—तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव की ग्रीवा दो अङ्गुल होनी चाहिये। वह ग्रीवा सभी मुखों से संयुक्त है, उसकी मूर्त्ति सौम्य है ॥ १९५ ॥ विनोच्छ्रायेण नृहरेर्यस्य गात्रस्य या प्रमा। सा सा सवेष्टनाद् व्यासात् कलार्धेनाधिका भवेत् ॥ १९६ ॥ उन हयग्रीव की ऊँचाई के बिना जिस गात्र की जितनी प्रमा है, वह गोलाई व्यास से आधे कला से अधिक कही गई है ॥ १९६ ॥ वक्षःकट्युदरांसस्फिक्कलामानाधिकानि च। तथैव नखपत्राणि देहश्चास्य समांसलः ॥ १९७ ॥ हयग्रीव का वक्षःस्थल, कटिभाग, उदर और नितम्ब कलामान से अधिक है उसी प्रकार नख पत्र भी समझना चाहिये। इनका शरीर मांसल युक्त बनाना चाहिये ॥ १९७ ॥ सम्पूर्णो दक्षिणावर्त्तैर्लोमभिश्चातिकुञ्चितैः। त्रिचतुःपञ्चवक्त्रस्य विनैवोर्ध्वमुखेन तु ॥ १९८ ॥ इनका शरीर चिक्कन और अत्यन्त कुञ्चित दक्षिणावर्त्त लोम से युक्त होना चाहिये। ये तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव ऊर्ध्वमुख से रहित हैं ॥ १९८ ॥ दक्षिणोत्तरवक्त्राभ्यां ह्रासं कुर्याद् द्विगोलकम्। विकासः सिंहवक्त्रोक्त उदग्वक्त्रस्य तत्र च ॥ १९९ ॥ दक्षिण और उत्तर वाले मुख को परस्पर दो गोलक कम करके निर्माण करे। उसमें उत्तर मुख का विकास सिंह के मुख के समान बनाना चाहिये ॥ १९९ ॥ समो दृक्सन्निवेशस्तु चतुर्णां मोक्षसिद्धये। अरोग्यभोगकैवल्यप्राप्तयेऽर्धाङ्गुलेन तु ॥ २०० ॥ चारो प्रकार की मोक्ष सिद्धि के लिये हयग्रीव के नेत्र का सन्निवेश समान रूप से करे। आरोग्य, भोग तथा कैवल्य प्राप्ति के लिये आधा अङ्गुल सन्निवेश करे ॥ २०० ॥ कुर्यात् सव्यापसव्याभ्यामधो दृक्सन्निवेशनम्।

५७२ सात्वतसंहिता सह पूर्वाननेनैव साम्यं प्रत्यङ्मुखस्य च॥ २०१ ॥ हयग्रीव के मुख का सन्निवेश बायें, दाहिने और नीचे की ओर करे। पूर्व के मुख के समान पश्चिम का मुख निर्माण करे ॥ २०१ ॥ निष्कासायामविस्तारघ्राणदृग्भ्रूश्रुतिष्वथ । ईषत्तिर्यक्क्षितिन्यस्तदृङ्मुखं दक्षिणं शुभम्॥ २०२ ॥ निष्कास तथा आयाम, विस्तार, घ्राण, दृष्टि, भ्रू तथा कानों में करे। कुछ तिरछापन लिये हुए पृथ्वी पर स्थित दक्षिण की ओर का नेत्र और मुख कल्याणकारी कहा गया है ॥ २०२ ॥ तद्वच्च पोत्रदृग्वक्त्रमुत्तरं सर्वसिद्धिकृत् । स्वकार्यसूचनान्न्यूनं तन्मन्त्रस्य च सन्निधिः॥ २०३ ॥ उसी प्रकार पोत्र, दृक् (नेत्र) और मुख उत्तर की दिशा में सभी सिद्धियों को देने वाले कहे गए हैं। अश्वग्रीव के मन्त्र की सिद्धि तब समझनी चाहिये जब वह आराधक के कार्य होने की सूचना प्रदान करे ॥ २०३ ॥ अतोऽन्यथा समाश्रित्य शान्तिमास्ते च मन्त्रराट् । नित्यं तत्सन्निधानाच्च भूतवेतालराक्षसाः॥ २०४ ॥ आ दर्शनात् पलायन्ते आविशन्ति च दर्शनात् । आदाय शिरसा मन्त्रिसमाज्ञां सम्प्रयान्ति ते॥ २०५ ॥ यदि सिद्धि नहीं होती तो ये मन्त्रराट् शान्त (चुपचाप) रहते हैं। इनके सन्निधान से, अथवा दर्शन से भूत, बेताल और राक्षस दूर भाग जाते हैं, अथवा दर्शन मात्र से स्थिर होकर खड़े रहते हैं और मन्त्रज्ञ की आज्ञा शिर से वहन करते हुए तदनन्तर जाते हैं ॥ २०४-२०५ ॥ अतः समाचरेद् यत्नाद् येन स्याद् बिम्बसन्निधिः। नहि तत्सन्निधानाद् वै कश्चिदारभते शुभम्॥ २०६ ॥ इसलिये आराधक ऐसा करे जिससे बिम्ब का सन्निधान बना रहे। उसके सन्निधान के बिना कोई भी शुभ कार्य का आरम्भ नहीं हो सकता ॥ २०६ ॥ वराहदंष्ट्रं सिंहाक्षं तथा चिपिटनासिकम् । विधेयं पञ्चमं वक्त्रं पञ्चवक्त्रस्य वै विभोः॥ २०७ ॥ इन विभु पञ्चवक्त्र का पाँचवाँ मुख वराह के समान दाँतों वाले हैं। सिंह के समान इनकी आँखें और नासिका चिपटी बनाना चाहिये ॥ २०७ ॥ अस्याधरोत्तराभ्यां त्वप्योष्ठाभ्यां समता भवेत् ।

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७३ विभिन्नताऽङ्गुलाधैन ताभ्यां तन्मध्यगा स्फुटा ॥ २०८ ॥ इनके ऊपर और नीचे के दोनों ओष्ठ सम बनाना चाहिये, अथवा आधा अङ्गुल कम वेशी के मान से विभिन्न निर्माण करे । इनका मध्य भाग अधिक स्पष्ट होना चाहिये ॥ २०८ ॥ कार्या दशनपाली वै मूलमध्याग्रतः समा । कलार्धेनोल्बणं वृत्तं तद्गण्डद्वितयं ततः ॥ २०९ ॥ दर्शनपाली (मसूढों) का निर्माण मूल, मध्य तथा अग्र भाग में समान रूप से करना चाहिए । उनका दोनों गण्डस्थल आधे कला का उल्बण (उग्र) एवं वृत्ताकार बनावे ॥ २०९ ॥ द्विकलं चायतः श्मश्रु कला चार्धकला क्रमात् । सम्बद्धवेणिः पूर्वोक्तमानेन शुभकृद् भवेत् ॥ २१० ॥ आगे का श्मश्रु दो कला का, अथवा एक कला का, अथवा आधे कला का होना चाहिये । शिर से सम्बद्ध वेणी पूर्व में कहे गये मान से बनाने पर शुभकारक होती है ॥ २१० ॥ सिंहसूकरवाज्याख्यवक्त्राणां सौम्यतां नयेत् । प्रमाणं दृग्गताल्लक्ष्याद् व्यवहारमयात् तु वै ॥ २११ ॥ हयग्रीव के सिंह, सूकर तथा अश्व के समान मुख की सौम्यता निर्माण करे । उस बिम्ब का प्रकाश दृष्टि से देखे जाने वाले लक्ष के अनुसार तथा व्यवहार के अनुसार बनाना चाहिये ॥ २११ ॥ विकासश्चाश्ववक्त्रोक्तः सौम्यरूपस्य भूभृतः । तदाद्योक्तस्तु नृहरेः प्रागुक्तो यः स चोदितः ॥ २१२ ॥ यहाँ तक हयग्रीव के मुख का विकास कहा गया है । सौम्य रूप धारण करने वाले वराह के मुख का विकास पहले कह आये हैं । उसके भी पहले नृसिंह के मुख का विकास कह आये हैं ॥ २१२ ॥ तथा वक्त्राङ्गभावित्वे विभोः शक्तीश्वरस्य च । हारनूपुरवस्त्रस्रक्कटकाङ्गदभूषिता ॥ २१३ ॥ माल्योपवीतकेयूरमकुटाद्युपशोभिता । प्रतिमा मन्त्रमूर्तीनां कृता भवति सिद्धिदा ॥ २१४ ॥ ये सभी विभु शक्तीश्वर के मुख के अङ्ग है । इनकी प्रतिमा हार, नूपुर, वस्त्र, माला, कटक, अंगद से भूषित करनी चाहिये तथा माल्य, उपवीत, केयूर