भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७१ अथ हयग्रीवादीनां ग्रीवाद्यवयवलक्षणानि त्रिचतुःपञ्चवक्त्रादिबिम्बस्य मुखाद्य- वयवलक्षणानि चाह— एतेषां विहिता ग्रीवेत्यारभ्य कृता भवति सिद्धिदेत्यन्तम् ॥ १९५-२१४ ॥ अब हयग्रीव के ग्रीवादि का लक्षण जो तीन, चार और पाँच संख्यक मुख वाला है, उस मुख बिम्ब के अवयवादि लक्षण कहते हैं—तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव की ग्रीवा दो अङ्गुल होनी चाहिये। वह ग्रीवा सभी मुखों से संयुक्त है, उसकी मूर्त्ति सौम्य है ॥ १९५ ॥ विनोच्छ्रायेण नृहरेर्यस्य गात्रस्य या प्रमा। सा सा सवेष्टनाद् व्यासात् कलार्धेनाधिका भवेत् ॥ १९६ ॥ उन हयग्रीव की ऊँचाई के बिना जिस गात्र की जितनी प्रमा है, वह गोलाई व्यास से आधे कला से अधिक कही गई है ॥ १९६ ॥ वक्षःकट्युदरांसस्फिक्कलामानाधिकानि च। तथैव नखपत्राणि देहश्चास्य समांसलः ॥ १९७ ॥ हयग्रीव का वक्षःस्थल, कटिभाग, उदर और नितम्ब कलामान से अधिक है उसी प्रकार नख पत्र भी समझना चाहिये। इनका शरीर मांसल युक्त बनाना चाहिये ॥ १९७ ॥ सम्पूर्णो दक्षिणावर्त्तैर्लोमभिश्चातिकुञ्चितैः। त्रिचतुःपञ्चवक्त्रस्य विनैवोर्ध्वमुखेन तु ॥ १९८ ॥ इनका शरीर चिक्कन और अत्यन्त कुञ्चित दक्षिणावर्त्त लोम से युक्त होना चाहिये। ये तीन, चार, पाँच मुख वाले हयग्रीव ऊर्ध्वमुख से रहित हैं ॥ १९८ ॥ दक्षिणोत्तरवक्त्राभ्यां ह्रासं कुर्याद् द्विगोलकम्। विकासः सिंहवक्त्रोक्त उदग्वक्त्रस्य तत्र च ॥ १९९ ॥ दक्षिण और उत्तर वाले मुख को परस्पर दो गोलक कम करके निर्माण करे। उसमें उत्तर मुख का विकास सिंह के मुख के समान बनाना चाहिये ॥ १९९ ॥ समो दृक्सन्निवेशस्तु चतुर्णां मोक्षसिद्धये। अरोग्यभोगकैवल्यप्राप्तयेऽर्धाङ्गुलेन तु ॥ २०० ॥ चारो प्रकार की मोक्ष सिद्धि के लिये हयग्रीव के नेत्र का सन्निवेश समान रूप से करे। आरोग्य, भोग तथा कैवल्य प्राप्ति के लिये आधा अङ्गुल सन्निवेश करे ॥ २०० ॥ कुर्यात् सव्यापसव्याभ्यामधो दृक्सन्निवेशनम्।