सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७२ सात्वतसंहिता सह पूर्वाननेनैव साम्यं प्रत्यङ्मुखस्य च॥ २०१ ॥ हयग्रीव के मुख का सन्निवेश बायें, दाहिने और नीचे की ओर करे। पूर्व के मुख के समान पश्चिम का मुख निर्माण करे ॥ २०१ ॥ निष्कासायामविस्तारघ्राणदृग्भ्रूश्रुतिष्वथ । ईषत्तिर्यक्क्षितिन्यस्तदृङ्मुखं दक्षिणं शुभम्॥ २०२ ॥ निष्कास तथा आयाम, विस्तार, घ्राण, दृष्टि, भ्रू तथा कानों में करे। कुछ तिरछापन लिये हुए पृथ्वी पर स्थित दक्षिण की ओर का नेत्र और मुख कल्याणकारी कहा गया है ॥ २०२ ॥ तद्वच्च पोत्रदृग्वक्त्रमुत्तरं सर्वसिद्धिकृत् । स्वकार्यसूचनान्न्यूनं तन्मन्त्रस्य च सन्निधिः॥ २०३ ॥ उसी प्रकार पोत्र, दृक् (नेत्र) और मुख उत्तर की दिशा में सभी सिद्धियों को देने वाले कहे गए हैं। अश्वग्रीव के मन्त्र की सिद्धि तब समझनी चाहिये जब वह आराधक के कार्य होने की सूचना प्रदान करे ॥ २०३ ॥ अतोऽन्यथा समाश्रित्य शान्तिमास्ते च मन्त्रराट् । नित्यं तत्सन्निधानाच्च भूतवेतालराक्षसाः॥ २०४ ॥ आ दर्शनात् पलायन्ते आविशन्ति च दर्शनात् । आदाय शिरसा मन्त्रिसमाज्ञां सम्प्रयान्ति ते॥ २०५ ॥ यदि सिद्धि नहीं होती तो ये मन्त्रराट् शान्त (चुपचाप) रहते हैं। इनके सन्निधान से, अथवा दर्शन से भूत, बेताल और राक्षस दूर भाग जाते हैं, अथवा दर्शन मात्र से स्थिर होकर खड़े रहते हैं और मन्त्रज्ञ की आज्ञा शिर से वहन करते हुए तदनन्तर जाते हैं ॥ २०४-२०५ ॥ अतः समाचरेद् यत्नाद् येन स्याद् बिम्बसन्निधिः। नहि तत्सन्निधानाद् वै कश्चिदारभते शुभम्॥ २०६ ॥ इसलिये आराधक ऐसा करे जिससे बिम्ब का सन्निधान बना रहे। उसके सन्निधान के बिना कोई भी शुभ कार्य का आरम्भ नहीं हो सकता ॥ २०६ ॥ वराहदंष्ट्रं सिंहाक्षं तथा चिपिटनासिकम् । विधेयं पञ्चमं वक्त्रं पञ्चवक्त्रस्य वै विभोः॥ २०७ ॥ इन विभु पञ्चवक्त्र का पाँचवाँ मुख वराह के समान दाँतों वाले हैं। सिंह के समान इनकी आँखें और नासिका चिपटी बनाना चाहिये ॥ २०७ ॥ अस्याधरोत्तराभ्यां त्वप्योष्ठाभ्यां समता भवेत् ।