भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७३ विभिन्नताऽङ्गुलाधैन ताभ्यां तन्मध्यगा स्फुटा ॥ २०८ ॥ इनके ऊपर और नीचे के दोनों ओष्ठ सम बनाना चाहिये, अथवा आधा अङ्गुल कम वेशी के मान से विभिन्न निर्माण करे । इनका मध्य भाग अधिक स्पष्ट होना चाहिये ॥ २०८ ॥ कार्या दशनपाली वै मूलमध्याग्रतः समा । कलार्धेनोल्बणं वृत्तं तद्गण्डद्वितयं ततः ॥ २०९ ॥ दर्शनपाली (मसूढों) का निर्माण मूल, मध्य तथा अग्र भाग में समान रूप से करना चाहिए । उनका दोनों गण्डस्थल आधे कला का उल्बण (उग्र) एवं वृत्ताकार बनावे ॥ २०९ ॥ द्विकलं चायतः श्मश्रु कला चार्धकला क्रमात् । सम्बद्धवेणिः पूर्वोक्तमानेन शुभकृद् भवेत् ॥ २१० ॥ आगे का श्मश्रु दो कला का, अथवा एक कला का, अथवा आधे कला का होना चाहिये । शिर से सम्बद्ध वेणी पूर्व में कहे गये मान से बनाने पर शुभकारक होती है ॥ २१० ॥ सिंहसूकरवाज्याख्यवक्त्राणां सौम्यतां नयेत् । प्रमाणं दृग्गताल्लक्ष्याद् व्यवहारमयात् तु वै ॥ २११ ॥ हयग्रीव के सिंह, सूकर तथा अश्व के समान मुख की सौम्यता निर्माण करे । उस बिम्ब का प्रकाश दृष्टि से देखे जाने वाले लक्ष के अनुसार तथा व्यवहार के अनुसार बनाना चाहिये ॥ २११ ॥ विकासश्चाश्ववक्त्रोक्तः सौम्यरूपस्य भूभृतः । तदाद्योक्तस्तु नृहरेः प्रागुक्तो यः स चोदितः ॥ २१२ ॥ यहाँ तक हयग्रीव के मुख का विकास कहा गया है । सौम्य रूप धारण करने वाले वराह के मुख का विकास पहले कह आये हैं । उसके भी पहले नृसिंह के मुख का विकास कह आये हैं ॥ २१२ ॥ तथा वक्त्राङ्गभावित्वे विभोः शक्तीश्वरस्य च । हारनूपुरवस्त्रस्रक्कटकाङ्गदभूषिता ॥ २१३ ॥ माल्योपवीतकेयूरमकुटाद्युपशोभिता । प्रतिमा मन्त्रमूर्तीनां कृता भवति सिद्धिदा ॥ २१४ ॥ ये सभी विभु शक्तीश्वर के मुख के अङ्ग है । इनकी प्रतिमा हार, नूपुर, वस्त्र, माला, कटक, अंगद से भूषित करनी चाहिये तथा माल्य, उपवीत, केयूर