सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७४ सात्वतसंहिता एवं मुकुट से शोभित करना चाहिये । इस प्रकार भूषित तथा शोभित की गई मन्त्र मूर्ति की प्रतिमा सिद्धि प्रदान करने वाली होती है ॥ २१३-२१४ ॥ विमर्श—सलक्षण, बिम्ब मान, हयग्रीव मुख लक्षण, नृसिंह मुख लक्षण, वराह मुख लक्षण, हयग्रीवादि के तीन, चार और पञ्चमुख लक्षणों को विष्णु- धर्मोत्तर पुराण तथा चतुर्वर्ग चिन्तामणि (हेमाद्रि) व्रतभाग के प्रथमखण्ड में देखिये । बिम्ब के अङ्गावयवों के लक्षण एवं पर्याय अमरकोशादि ग्रन्थों में द्रष्टव्य है । सत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहादिलक्षण कथनम् यत्पुरा पञ्चधा प्रोक्तं वाहनं प्राणदैवतम् । तस्य बिम्बसमुत्थेन तालेन मुखमण्डलम् ॥ २१५ ॥ द्व्यङ्गुलं तु ललाटोक्तं जटाबन्धो द्विलोचनः । द्व्यङ्गुलेनोन्नतः कण्ठ उरः पञ्चकलं स्मृतम् ॥ २१६ ॥ अष्टाङ्गुलं तदुदरं कटिः पञ्चाङ्गुलोन्नता । नवाङ्गुलोन्नतावूरू जानुनी द्व्यङ्गुले स्मृते ॥ २१७ ॥ संत्यसुपर्णादिगरुडव्यूहलक्षणमाह—यत्पुरा पञ्चधा प्रोक्तमित्यारभ्य स्थितानाम- र्धलक्षणेत्यन्तम् ॥ २१५-२३४ ॥ अब सत्य सुपर्णादि गरुड़ व्यूह का लक्षण कहते हैं—पहले प्राण देवता वाले वाहन रूप गरुड़ को पाँच प्रकार का कहा गया है । उनके मुख मण्डल का मान बिम्ब के अनुसार एक ताल का होना चाहिए । ललाट दो अङ्गुल का होना चाहिये । जटाबन्ध दो लोचन का, कण्ठ दो अङ्गुल ऊँचा तथा वक्षःस्थल पाँच कला का होना चाहिये । उदर आठ अङ्गुल का और कटि पाँच अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये । दोनों ऊरु नव अङ्गुल उन्नत तथा जानु दो अङ्गुल का निर्मित होना चाहिये ॥ २१५-२१७ ॥ अष्टाङ्गुलोच्छ्रिते जङ्घे द्व्यङ्गुले पादपिण्डके । शममेककलाहीनं तद्ग्रीवायाश्च वेष्टनम् ॥ २१८ ॥ दोनों जङ्घा आठ अङ्गुल ऊँची, पैर की पिण्डिका दो अङ्गुल, उस बिम्ब की ग्रीवा का वेष्टन (= गोलाई) एक कलाहीन कम परिमाण में निर्माण करे ॥ २१८ ॥ बिम्बतुल्या परिज्ञेया सर्वदाऽस्याङ्गविस्तृतिः । तद्विभागाधिकं विद्धि वेष्टनं हृदरस्य च ॥ २१९ ॥ इसके अंग का विस्तार सर्वदा बिम्ब के तुल्य समझना चाहिये । उदर का वेष्टन उसके विभाग से अधिक समझे ॥ २१९ ॥ परिधिः कटिदेशस्य चतुर्नेत्राधिकस्तु वै ।