भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५७५ बिम्बोक्तसदृशं विद्धि तदूर्वोर्मूलवेष्टनम् ॥ २२० ॥ कटि देश की परिधि का मान चार नेत्र से अधिक मान में निर्माण करे । उस बिम्ब के ऊरु का वेष्टन (= गोलाई) पूर्व में कहे गये बिम्ब के सदृश समझना चाहिये ॥ २२० ॥ तदेव जङ्घामध्यस्य जङ्घान्तस्य तदेव हि । पादं पञ्चकलायामं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ २२१ ॥ वही परिमाण जङ्घा के मध्य का तथा वही परिमाण जङ्घा के अन्त का भी होना चाहिए । पैर पाँच कला लम्बा और चार अङ्गुल चौड़ा बनावे ॥ २२१ ॥ त्र्यङ्गुलं पाणिदेशाच्च अङ्गुष्ठोऽर्धकलासमः । विज्ञेया अङ्घ्रिदैर्घ्याच्च यवोनाङ्गुलयः क्रमात् ॥ २२२ ॥ पाणिदेश से तीन अङ्गुल दूर अङ्गुष्ठ का मान आधी कला का बनावे । अङ्गुलियाँ पैर की चौड़ाई से एक यव कम करे ॥ २२२ ॥ नाभिरन्ध्रं सुविस्तीर्णं ह्यर्धलोचनविस्तृतम् । मध्यमाङ्गुलिपर्यन्तं मणिबन्थान्नवाङ्गुलम् ॥ २२३ ॥ नाभि का छिद्र विस्तार युक्त तथा अर्धलोचन विस्तृत निर्माण करे । मणिबन्ध से मध्यमाङ्गुलि पर्यन्त दूरी नव अङ्गुल कही गई है ॥ २२३ ॥ त्रिकलः पाणिविस्तारस्तन्नखा निशितोन्नताः । तद्द्बाहुमस्तकं विद्धि उच्छ्रायेण द्विलोचनम् ॥ २२४ ॥ हाथ का विस्तार तीन कला का तथा नख अत्यन्त निशित (तीक्ष्ण) एवं समुन्नत होने चाहिये । बिम्ब का बाहु और मस्तक ऊँचाई में दो लोचन का बनाना चाहिये ॥ २२४ ॥ भुजोपभुजयुग्मं यत् तद् द्वितालसमं स्मृतम् । कलार्धेनाधिकं बिम्बं बाहोस्तद्द्बाहुवेष्टनम् ॥ २२५ ॥ दोनों भुजायें एवं दोनों उपभुज दो ताल के समान बनाना चाहिये । बिम्ब का एवं बाहु का बाहु-वेष्टन एक कला से अधिक निर्माण करे ॥ २२५ ॥ बिम्बोक्तां सद्धिधिं ह्येवं स्तनभूर्लोचनोल्बणा । वृत्तवैपुल्यमानेन लोचने पद्मपत्रवत् ॥ २२६ ॥ इस प्रकार बिम्ब की सुन्दर विधि कही गई । स्तन, भ्रू और लोचन उल्बण बनावे । दोनों नेत्रों को गोलाई तथा वैपुल्य के अनुसार कमल पत्र के समान विशाल बनावे ॥ २२६ ॥