भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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५७६ सात्वतसंहिता भ्रूयुगं नरसिंहोत्थं घ्राणाग्रं शुकचञ्चुवत् । कलार्धमानं दीर्घं च तद्वंशं गजपृष्ठवत् ॥ २२७ ॥ गरुड़ के दोनों भ्रू नरसिंह के समान और घ्राण का अग्रभाग सुग्गे के चञ्चु के समान होना चाहिए। घ्राणवंश कला को अर्धमान का दीर्घ तथा गज पृष्ठवत् निर्माण करना चाहिए ॥ २२७ ॥ स्वायामदीर्घं तत्पक्षयुगलं कुक्षिदेशगम् । तदेव दैर्घ्यादर्धेन विस्तृतं हंसपक्षवत् ॥ २२८ ॥ उनके कुक्षि में रहने वाला दोनों पक्ष लम्बाई के अनुसार चौड़ा बनावे। वह उसकी चौड़ाई, लम्बाई का आधा तथा हंस-पक्ष के समान विस्तृत बनावे ॥२२८॥ स्वपक्षमानाद् द्विगुणं तत्पुच्छं शतशाखकम् । सपक्षमिममायामं सात्यं त्ववयवान्वितम् ॥ २२९ ॥ उसका पुच्छ उसके पङ्क के मान से द्विगुणित तथा हजारों शाखा से युक्त बनावे। इस प्रकार यहाँ अवयव युक्त पक्ष सहित यह आयाम सत्य नाम सुपर्ण का कहा गया है ॥ २२९ ॥ सर्वेषां विद्धि सामान्यं विशेषाख्यमथोच्यते । ऊरुद्वयान्नयेद् ह्रासमङ्गुलानां त्रयं तथा ॥ २३० ॥ जङ्घाकाण्डोच्छ्रितेः कुर्याज्जङ्घाभ्यां चात्र वेष्टनम् । बिम्बाख्यं मणिबन्धस्य सममूलान्महामते ॥ २३१ ॥ जानुदेशात् तदर्धेन सह चार्धाङ्गुलेन तु । पादे जालं परिज्ञेयं विस्तारेण षडङ्गुलम् ॥ २३२ ॥ यहाँ तक जङ्घा काण्ड का सामान्य लक्षण कहा गया है। अब जो विशेष है उसे कहा जा रहा है। दोनों जङ्घाओं का वेष्टन दोनों ऊरु से तीन अङ्गल कम रखे। उसकी ऊँचाई जङ्घा काण्ड की ऊँचाई के समान रखे। हे महामते! उसका बिम्ब मणिबन्ध के मूल के समान रखे। जानुदेश से उसके आधे के समान अथवा आधा अङ्गल के समान पैर का जाल निर्माण करे, जिसका विस्तार छः अङ्गुल होना चाहिये ॥ २३०-२३२ ॥ शेषं सत्योदितं सर्वं सर्वेषां विद्धि सर्वदा । किन्तु पादोज्झितौ पक्षौ दैर्घ्यात् तद्दलविस्तृतौ ॥ २३३ ॥ शेष सब कुछ सत्य गरुड़ के लक्षण में कह दिया गया है किन्तु पैर रहित दोनों पक्ष लम्बाई से चार गुना विस्तृत बनावे ॥ २३३ ॥