सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५६७ तद् वै विषमपादस्य अग्रात् तालसमं स्मृतम् ॥ १६८ ॥ समपादविषमपादबिम्बानां सूत्रेणावयवसाम्यपरीक्षामह—ऋजोः सुसमपादस्ये- त्यारभ्य बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिरित्यन्तम् ॥ १६८-१७४ ॥ समपाद एवं विषमपाद वाले बिम्बों का सूत्र से अवयव साम्य की परीक्षा— जिसका पैर सीधा हो, समतल हो, उसके चरणों का अन्तर तीन अङ्गुल होता है । विषमपाद के आगे का अन्तर एक ताल के बराबर होता है ॥ १६७-१६८ ॥ तत्पाष्णिर्द्वयमध्यात् तु परिज्ञेयं द्विगोलकम् । स्थित्यर्थं ब्रह्मनाड्या वै तथा मार्गद्वयस्य च ॥ १६९ ॥ सूत्रेण सुसमे कुर्याद् देहोत्थे दक्षिणोत्तरे । समपादस्य बिम्बस्य ललाटान्मेढ्रमस्तकम् ॥ १७० ॥ प्रसार्य सूत्रमाच्छाद्य तेन नाभिहृदन्तरम् । घ्राणाग्रमलकानां च सन्धिर्यस्तिलकोध्वंगः ॥ १७१ ॥ एवं विषमपादस्य दक्षाङ्गुष्ठाग्रगं नयेत् । गात्रसाम्यं समापाद्यं क्षेत्रात् क्षेत्रगतेन च ॥ १७२ ॥ सूत्रेण सर्वबिम्बानां वैषम्यविनिवृत्तये । चतुस्त्रिद्व्यश्रिपरितः परिशुद्धा यतः शुभाः ॥ १७३ ॥ अशुभाऽपरिशुद्धा तु बिम्बोत्थाऽवयवी स्थितिः। वही अन्तर उसके दोनों पाणि के मध्य से दो गोलक समझना चाहिये । ब्रह्मनाडी और उसके दोनों मार्ग की स्थिति के लिये देह के दक्षिण और उत्तर भाग को सूत्र के समान बनावे । समपाद वाले बिम्ब के ललाट से मेढ़ मस्तक तक नाभिहृदय को, घ्राणाग्र अलक की सन्धि, जो तिलक के ऊपर रहती है उसको, सूत को लम्बा कर उससे आच्छादित करे । इसी प्रकार समपाद एवं विषमपाद के सूत्र को भी दाहिने हाथ के अङ्गुष्ठ के अग्रभाग तक ले जावे । इस प्रकार क्षेत्र से क्षेत्रगत तक गात्रसाम्य की समता करे । उस सूत्र से सभी बिम्बों की विषमता की निवृत्ति के लिये चार, तीन एवं दो आवे तो वह चारों ओर से शुद्ध समझना चाहिये । वही शुभ है किन्तु बिम्ब से होने वाले अवयवी स्थिति अपरिशुद्ध एवं अशुभ है ॥ १६९-१७४ ॥ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणकथनम् ललाटमश्ववक्त्रस्य विस्ताराद् द्वादशाङ्गुलम् ॥ १७४ ॥ अथ हयग्रीवबिम्बस्य मुखलक्षणमाह— ललाटमश्ववक्त्रेत्यादिभिः ॥ १७४-१८० ॥