भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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५६६ सात्वतसंहिता त्याज्यमिति सलौकिकदृष्टान्तमाह—सुनिश्चितमिति सार्धैश्चतुर्भिः ॥ १६१-१६५ ॥ इस प्रकार पूर्व में कहे गये मान की अपेक्षा बिम्ब में मान की विषमता होने पर भी यदि वह सौन्दर्यातिशय से विशिष्ट है तो वह उपादेय (संग्राह्य) है । यदि सौन्दर्यादि गुण से रहित है किन्तु मान से प्रमाणित है तो उपादेय है । किन्तु सौन्दर्य एवं मान दोनों से रहित है तो वह त्याज्य है ॥ १६०-१६२ ॥ सुसौन्दर्यं तु मानस्य क्वचिदाक्रम्य वर्तते ॥ १६२ ॥ लावण्यस्य क्वचिन्मानं समाच्छाद्यावतिष्ठते । कहीं सुसौन्दर्य मान का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है कहीं मान सुसौन्दर्य का अतिक्रमण कर विराजमान हो जाता है ॥ १६२-१६३ ॥ यथातिरूपवान् लोके दरिद्रोऽप्येति मान्यताम् ॥ १६३ ॥ विरूपोऽप्यतिवित्ताढ्यो नारूपो नैव निर्धनः । एवं द्वयोज्झितं बिम्बमनादेयत्वमेति च ॥ १६४ ॥ आदेयमेकयुक्तं च नित्यं यस्मान्महामते । जिस प्रकार दरिद्र होने पर भी अतिरूपवान् लोक में प्रतिष्ठित होता है अथवा अत्यन्त धनवान् होने से रूप रहित विरूप भी लोक में प्रतिष्ठित होता है । किन्तु जो अरूप है, निर्धन है, अर्थात् रूप और धन दोनों से रहित है, वह लोक में अप्रतिष्ठित रहता है । इसी प्रकार सौन्दर्य और मान रहित बिम्ब लोक में अनुपयोगी होता है ॥ १६३-१६५ ॥ सम्यङ्माने च सौन्दर्ये भक्तानुग्रहकाम्यया ॥ १६५ ॥ मान्त्रसन्निधिशक्तिर्वै सफला ह्यवतिष्ठते । सा सम्यक् प्रतिपन्नस्य बिम्बे दृग्गोचरस्थिते ॥ १६६ ॥ आमूर्ताह्लादयत्याशु ज्ञात्वैवं यत्नमाचरेत् । मानोन्मानप्रमाणानामथ सौन्दर्यसिद्धये ॥ १६७ ॥ एवं बिम्बस्य प्रमाणवत्त्वे सौन्दर्यवत्त्वे च "आभिरूप्याच्च बिम्बस्य" इत्युक्तरीत्या निरतिशयाह्लादजननी भगवत्सान्निध्यशक्ति(बि?र्बि)म्बे स्वत एवाविर्भूता सफलाऽवतिष्ठते, अतस्तदर्थं सुतरां यत्नः कार्य इत्याह—सम्यङ्माने चेति सार्धद्वाभ्याम् ॥ १६५-१६७ ॥ हे महामते सङ्कर्षण ! सौन्दर्य और मान इन दोनों में किसी एक से युक्त होने से बिम्ब निरतिशयाह्लाद जननी भगवत्सान्निध्य विष्णु शक्ति स्वतः आविर्भूत होकर सफला होकर प्रतिष्ठित हो जाती है । इसलिये साधक को वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए ॥ १६५-१६७ ॥ ऋजोः सुसमपादस्य त्र्यङ्गुलं चरणान्तरम् ।