सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५६५ उसी प्रकार उसके बाद वाली अङ्गुली जिसमें तीन ही पर्व (गाँठ) है वह उस कनिष्ठा का निर्माण करे। सभी अङ्गुलियाँ नखजाल से संयुक्त तथा कूर्मपृष्ठ के समान निर्माण करे ॥ १५५ ॥ द्विकलं तु कलाधोनं पादतर्जनिवेष्टनम्। चतुश्चतुर्यवोनं च तच्छेषाणां प्रकीर्तितम् ॥ १५६ ॥ पैर की तर्जनी का वेष्टन आधा कला कम कर दो कला का निर्माण करे। शेष अङ्गुलियों का वेष्टन क्रमशः ४-४ यव निर्माण करे ॥ १५६ ॥ त्र्यंशेन वेष्टनाद् विद्धि सर्वासां चैव विस्तृतिम्। सर्वा समांसलाः सौम्याः समास्त्ववयवाः शुभाः ॥ १५७ ॥ सभी अङ्गुलियों का विस्तार वेष्टन (गोलाई) की अपेक्षा तृतीयांश कम रखे। वे सभी अङ्गुलियाँ मांसल युक्त सौम्य तथा समान अवयव वाली हों तो शुभकारक कही गई है ॥ १५७ ॥ दर्शनावलिबाह्यस्थे दंष्ट्रे सप्तयवोन्नते। यवद्वयोन्नतं मानं मध्यदन्तचतुष्टये ॥ १५८ ॥ दर्शनावलि के बाहर वाले दो दाँत सात यव ऊँचे बनावे। शेष मध्य का चार दाँत दो यव उन्नत बनावे ॥ १५८ ॥ तत्पक्षाणां सर्वेषां मानं विद्धि चतुर्यवम्। त्रियवं द्विजविस्तारमग्रान्मूलाद् यवद्वयम् ॥ १५९ ॥ उसके पक्ष में रहने वाले सभी दाँतों का मान चार यव बनाना चाहिये। उनका विस्तार दो यव और उसके आगे का तथा मूल का विस्तार भी दो यव निर्माण करे ॥ १५९ ॥ तत्सार्धं मध्यदेशाच्च सर्वे दन्ता निरन्तराः। लोम प्रदक्षिणावर्तमयुग्जन्मोत्थितं शुभम् ॥ १६० ॥ मध्यदेश के साथ-साथ सभी दाँत अन्तररहित निर्माण करे। लोम प्रदक्षिणा- वर्त्त करे तथा उसमें विषय लोभ उत्पन्न हों तो वे शुभावह कहे गये हैं ॥ १६० ॥ सुनिश्चितं हितं चैतन्मानमव्यभिचारि यत्। मनोहारित्वमेकत्र रूपलावण्यभूषितम् ॥ १६१ ॥ सर्वदा चानयोर्विद्धि अन्योन्यत्वेन संस्थितिम्। एवमुक्तस्य मानादेः किञ्चिद्वैषम्येऽपि सौंदर्यातिशयविशिष्टं चेद् बिम्बमुपादेयम्, सौंदर्याभावेऽपि मानयुक्तं चेत् तदपि ग्राह्यम्। ताभ्यां द्वाभ्यामप्युज्झितं चेत्, तत्