भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 623

५६४ सात्वतसंहिता चरण की दीर्घता ताल के भाग के मान के अनुसार होनी चाहिये। पाष्र्णी दो गोलक विस्तृत होना चाहिये। उन दोनों का मध्य एक अङ्गुलि सहित दो कला होना चाहिये ॥ १४८ ॥ त्रिकलं चायताञ्चैव बाहुल्येन कलासमम्। पादमङ्गुष्ठनिकटात् त्रियवोनं प्रकीर्तितम् ॥ १४९ ॥ बाहुल्यं च कलामानं गुल्फदेशाच्च साङ्गुलम्। कनीयोऽङ्गुलिमूलाच्च गुल्फान्तं पिण्डिकाङ्गुलम् ॥ १५० ॥ आगे से तीन कला बाहुल्य होना चाहिए और एक कला के समान अङ्गुष्ठ के निकट से पाद का मान तीन यव कम कहा गया है। गुल्फ प्रदेश से कला मान अङ्गुलि सहित एक कला रखे। कनिष्ठ अङ्गुलि के मूल से लेकर गुल्फ पर्यन्त पिण्डिका एक अङ्गुल निर्माण करनी चाहिए ॥ १४९-१५० ॥ जङ्घावसानदेशाच्च वेष्टनं सप्तलोचनम्। कलाहीनं तदैवाग्रात् परिणाहो विधीयते ॥ १५१ ॥ जङ्घा के अन्त तक वेष्टन (= गोलाई १) सात लोचन रखे। उसके आगे से परिणाह कलाहीन निर्माण करे ॥ १५१ ॥ चरणं विधिनानेन कूर्मपृष्ठं समाप्य च। त्र्यङ्गुलेन च तद्धैर्ध्यादङ्गुष्ठस्य च दीर्घता ॥ १५२ ॥ इस प्रकार कूर्मपृष्ठ के समान चरण का निर्माण समाप्त कर उसकी लम्बाई से तीन अङ्गुल के परिमाण में अङ्गुष्ठ का लम्ब निर्माण करे ॥ १५२ ॥ पञ्चाङ्गुलः परिज्ञेयः परिधिस्तस्य लाङ्गलिन्। यवद्वयाधिका कार्या तद्धैर्ध्यात् तु प्रदेशिनी ॥ १५३ ॥ हे लाङ्गलिन्! उसकी परिधि पाँच अङ्गुल निर्माण करे और प्रदेशिनी अङ्गुलि अङ्गुष्ठ की लम्बाई की अपेक्षा दो यव अधिक निर्माण करे ॥ १५३ ॥ अङ्गुष्ठायामतुल्याऽथ कार्या वै पादमध्यमा। मध्याङ्गुलेर्द्विरष्टांशहीना तदनु या स्थिता ॥ १५४ ॥ अङ्गुष्ठ के आयाम के तुल्य पैर की मध्यमा अङ्गुलि का निर्माण करे। मध्यमा अङ्गुलि के बाद जो (अनामिका) अङ्गुलि स्थित है उसका निर्माण मध्यमा की अपेक्षा १६ अंश कम में करे ॥ १५४ ॥ तद्वत् तदनुगा या च त्रिपर्वास्तास्तु पूर्ववत्। संयुक्ता नखजालेन कूर्मपृष्ठोपमेन च ॥ १५५ ॥