सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 627, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें५६८ सात्वतसंहिता अब हयग्रीव के मुख का लक्षण कहते हैं—हयग्रीव का ललाट विस्तार की दृष्टि से बारह अङ्गुल कहा गया है ।। १७४ ।। अष्टलोचनमायामाद् अग्रतश्चतुरङ्गुलम् । कलार्धसुषिरे घ्राणरन्ध्रे भागान्तरीकृते ।। १७५ ।। आयाम ( ) आठ लोचन कहा गया है, उसका अगला भाग चार अङ्गुल का तथा दो भागों में प्रविभक्त छिद्र घ्राणरन्ध्र कला का आधा कहा गया है ।। १७५ ।। अष्टाङ्गुले तु हनुके सृक्किण्यौ द्वेऽथ तत्समे । मध्यतः श्रोत्रशुक्ती द्वे द्व्यङ्गुले द्विकलोन्नते ।। १७६ ।। हनु आठ अङ्गुल का तथा दोनों सृक्किणी उसी के बराबर हो । श्रोत्र की दोनों शुक्ती मध्य से दो-दो अङ्गुल तथा दो कला ऊँची होनी चाहिये ।। १७६ ।। द्व्यङ्गुलं घ्राणवंशं तु तदूर्ध्वं द्विकलं स्मृतम् । विद्धि वक्त्रविकासं च द्वियवं चाग्रतः क्रमात् ।। १७७ ।। घ्राणवंश दो अङ्गुल का तथा उसकी ऊँचाई दो कला की होनी चाहिये । आगे की ओर किया जाने वाला मुख का विकास दो यव कहा गया है ।। १७७ ।। तमेव हि यवांशेन हन्वन्तं तनुतां नयेत् । घ्राणवंशस्य पक्षौ द्वौ मध्यनिम्नौ च संहतौ ।। १७८ ।। उसी मुख विकास को हनु पर्यन्त यवांस परिमाण में सूक्ष्म निर्माण करे । घ्राणवंश के दोनों पक्ष मध्य में निम्न बनावे और शेष को समान बनावे ।। १७८ ।। यवद्वयेन सार्धेन दृग्घ्राणाभ्यां तु चान्तरे । अथो दलं तु दृग्द्रोणेर्यवमानेन सन्ञ्चितम् ।। १७९ ।। ललाटं सालकं प्राग्वद् दृङ्मध्यं साङ्गुला कला । नेत्र और दोनों घ्राण का अन्तर सार्ध यव द्वय (२ ½ यव) रखे । अलक (केश) युक्त ललाट पूर्व की भाँति द्वादश अङ्गुल रखे । दोनों दृष्टियों का मध्य भाग एक अङ्गुल से युक्त कला परिमाण में निर्माण करे ।। १७९-१८० ।। श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणकथनम् नृसिंहस्य मुखे विद्धि परितश्चाष्टलोचनम् ।। १८० ।। ततोऽष्टकण्ठदेशाच्च कुर्यात् कर्णद्वयोज्झितम् । तत्कर्णद्वयमानेन ललाटान्तं नयेत् पुनः ।। १८१ ।। प्रमाणात् प्राक् प्रणीताच्च संरम्भाद्यातलक्षणम् । प्रफुल्लविकसच्छिद्रं घ्राणवंशान्वितं भवेत् ।। १८२ ।।