सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५६९ श्रीनृसिंहवक्त्रलक्षणमाह—श्रीनृसिंहस्येत्यादिभिः ॥ १८०-१८८ ॥ अब नृसिंह के मुख का परिमाण कहते हैं—नृसिंह का मुख चारों ओर आठ लोचन करे, दोनों कानों को छोड़कर कण्ठ देश से भी आठ लोचन बनावे। पुनः दोनों कानों के मान से भी ललाट पर्यन्त उतनी ही दूरी रखे। घ्राणवंश की दोनों नासिकाओं का छिद्र प्रफुल्ल और विकसित निर्माण करे ॥ १८१-१८२ ॥ तच्छिद्रे पूर्वमानाच्चाप्यस्य वै त्रियवाधिकम्। सगोलमुत्तराङ्गेषु सकलांशं च लोचनम् ॥ १८३ ॥ वे छिद्र पूर्वमान की अपेक्षा आप्य से तीन यव अधिक होने चाहिये। उत्तर अङ्ग में लोचन गोल एवं कलांश युक्त होना चाहिये ॥ १८३ ॥ अधरोष्ठं परिज्ञेयं सचतुर्यवमङ्गुलम्। सार्धं चतुष्कलं वक्त्रं शेषायामो हनोः स्मृतः ॥ १८४ ॥ अधरोष्ठ चार यव सहित एक अङ्गुल का समझना चाहिये। साढे चार कला का मुख होना चाहिये, शेष आयाम हनु का होता है ॥ १८४ ॥ तद्विकासः परिज्ञेयो नेत्रमानं यवाधिकम्। अग्रतो ह्रासमायाति सृक्किण्यन्तं हि चाङ्गुलम् ॥ १८५ ॥ सर्ववृत्तं तदर्धेन नेत्रयुग्मं सविस्मयम्। पूर्ववद् विस्तृतं श्रोत्रं कलाधोनं तदुन्नतेः ॥ १८६ ॥ वक्त्र का विकास एक तथा यव से अधिक नेत्र का मान होना चाहिये। आगे से सृक्किणी पर्यन्त वह एक अङ्गुल ह्रास हो जाता है। उसका आधा सर्ववृत्त कहा जाता है। वही विस्मय सहित होने पर नेत्र युग्म कहा जाता है। श्रोत्र पूर्ववत् विस्तृत बनाना चाहिये जो उसकी ऊँचाई से आधा कला कम होवे ॥ १८५-१८६ ॥ तुल्या चेन्दुकला युग्मयोगस्य भ्रूस्त्रिगोलका। तन्मध्यं तु कलामानं शङ्खावर्तोपमं महत् ॥ १८७ ॥ भागमानं सटावृत्तं कार्यं तच्छिरसि स्फुटम्। इन्द्रकला तुल्य बनानी चाहिये। भ्रू तीन गोलक होना चाहिये, भ्रू उसका मध्य कला मान का तथा महान शङ्खावर्त्त के समान होना चाहिये ॥ १८७-१८८ ॥ वराहवक्त्रलक्षणकथनम् दैर्घ्येण सार्धतालं च क्ष्माधरस्याननं स्मृतम् ॥ १८८ ॥ विस्तारेण ललाटाच्च तन्मानं द्व्यङ्गुलोञ्झितम्। सौम्यरूपस्य च विभोः प्रोद्यतस्य कलोञ्झितम् ॥ १८९ ॥ सा० सं० - 40