भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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५५८ सात्वतसंहिता तारादैर्घ्यत्रिभागेन त्वाद्यस्यान्यस्य वाधिका। यवेनैकेन सार्धेन ज्योतिस्तत्पञ्चभागिकम्॥ १०६ ॥ जिसके नेत्र और कान कमल के समान बड़े हों, उन्हें दो यव से अधिक निर्माण करना चाहिए। गोलाकार तारे से युक्त नेत्र का अर्ध भाग कमल पत्र के आकार का बनावे। नेत्र का तारा चौड़ाई के तीन भाग में अथवा अन्य की अपेक्षा अधिक मान में निर्माण करे। उसके पाँचवे भाग में डेढ़ (१ १/२) यव ज्योति निर्माण करे॥ १०५-१०६ ॥ त्रिभागेनापि विहितं तत्पद्मदललोचन। द्विषड्यवं नेत्रकोशं विस्तरेण यवाधिकम्॥ १०७ ॥ हे पद्मलोचन! उस ज्योति का निर्माण तीसरे अंश से भी किया जा सकता है। नेत्र कोश बारह यव का तथा चौड़ाई में एक यव से अधिक निर्माण करना चाहिए॥ १०७ ॥ सार्धाङ्गुलद्वयं दैर्घ्याद् भ्रूलते द्विकले स्मृते। मध्यतो द्वियवे बालचन्द्रतुल्ये क्रमक्षते॥ १०८ ॥ भ्रूलता (भौंहें) ढाई अङ्गुल चौड़ी तथा दो कला की होनी चाहिये। दोनों मध्य बाल चन्द्रमा के समान टेढ़ी और क्रम क्षत दो यव की बनावे॥ १०८ ॥ तदन्तरं कलार्धं च तत्कोटी समसूत्रके। श्रोत्रे द्व्यङ्गुलविस्तीर्णे आयामेन द्विगोलके॥ १०९ ॥ उस भ्रू के दोनों किनारे समसूत्र तथा कलार्ध होने चाहिये। कान दो अङ्गुल चौड़े तथा लम्बाई में दो गोलक निर्माण करे॥ १०९ ॥ द्वियवः कण्ठपरिधिः पर्वणी द्वे चतुर्यवे। मध्यं ताभ्यां तथा विद्धि द्रोणी सार्धाऽङ्गुलाऽत्र वै॥ ११० ॥ कण्ठ की गोलाई दो यव तथा दोनो पर्व चार यव का बनाना चाहिये। उन दोनों का मध्य तथा द्रोणी डेढ़ १ १/२ अङ्गुल का बनाना चाहिये॥ ११० ॥ कलार्धेन तु तच्छिद्रं पाशमानं यथारुचि। अङ्गुलाद् द्विकलान्तं तु वैषम्यमपि तत्र यत्॥ १११ ॥ उसके छिद्र का मान आधा कला तथा पाश का मान इच्छानुसार करे। उसमें विषमता एक अङ्गुल से लेकर दो कला पर्यन्त होनी चाहिये॥ १११ ॥ अन्तश्छिद्रविनिर्मुक्तं तद्विज्ञेयं चतुर्यवम्। सदलं करणोपेतमेवं श्रोत्रद्वयं स्मृतम्॥ ११२ ॥