भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५७ निर्जटानां ललाटोर्ध्वं मकुटं वा सुशोभनम् ॥ ९८ ॥ तालेन ह्रासवृद्धी तु कार्ये त्वत्र व्यपेक्षया । यथोदितेषु भागेषु एकैकेनाङ्गुलेन तु ॥ ९९ ॥ तीन, पाँच, सात शिखर का मौलि (मुकुट) आठ कला ऊँचा होना चाहिये । जटा रहित बिम्ब का ललाट के ऊपर सुन्दर मुकुट बनाना चाहिये । इसमें अपेक्षा के अनुसार यथोदित भाग में एक अङ्गुल से ताल पर्यन्त माप में घटा बढ़ी की जा सकती है ॥ ९८-९९ ॥ आस्यनासाललाटार्थं वदनांशं भजेत् त्रिधा । ततोऽग्रतः कलामानं घ्राणं स्यात् तिलपुष्पवत् ॥ १०० ॥ कलार्धेन तु विस्तारः सोन्नतिस्तत्पुटद्वये । नासाग्रग्रासनिर्मुक्तं गोजीमानं चतुर्यवम् ॥ १०१ ॥ तच्चतुर्यवमानेन घ्राणाग्रेणान्तरीकृतम् । अर्धाङ्गुलं चोत्तरोष्ठमधरोष्ठं तु चाङ्गुलम् ॥ १०२ ॥ मुख नासिका तथा ललाट के लिये मुख को तीन भागों में विभक्त कर बनाना चाहिये । उसमें सबसे आगे कला मान का घ्राण तिल पुष्प के समान बनाना चाहिये । नासिका के दोनो पुटों को ऊँचाई के साथ आधे कला के विस्तार (२ को) से युक्त बनावे । नासाग्र और ग्रास से बाहर गोजीमान चार यव का होना चाहिये । वह चार यव मान वाले घ्राण के अग्रभाग से अन्तरीकृत होना चाहिये । ऊपर का ओठ आधा अङ्गुल मोटा तथा अधरोष्ठ एक अङ्गुल मोटा होना चाहिये ॥ १००-१०२ ॥ गोलकं चिबुकं विद्धि सृक्किण्यौ चतुरङ्गुले । आद्यस्य नासिकांशस्य मध्यभागसमाश्रिते ॥ १०३ ॥ कुर्यान्नेत्रश्रुतिच्छिद्रे तत्र नेत्रे कलान्तरे । कलायामसमं दैर्घ्यात् कलार्धेन तु विस्तृतम् ॥ १०४ ॥ चिबुक गोलक प्रमाण का तथा दोनों सृक्किणी चार अङ्गुल प्रमाण में होनी चाहिये । पहली नासिका के मध्य भाग का आश्रय लेकर नेत्र और कान का छिद्र निर्माण करे । दोनों नेत्रों में एक कला का अन्तर होना चाहिये । उसकी लम्बाई एक कला और चौड़ाई आधी कला बनानी चाहिये ॥ १०३-१०४ ॥ यदुत्पलदलाकारं द्वियवेनाधिकं तु तत् । कुर्यात् पद्मदलाकारं नेत्रार्थं वृत्ततारकम् ॥ १०५ ॥