भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५५९ भीतरी भाग में छिद्र से विनिर्मुक्त चार यव के मान का सदल करणोपेत दोनो श्रोत्र होना चाहिये ॥ ११२ ॥ चतुष्कलं ललाटं तु शिखरे द्विगोलके । उच्छ्रायात् त्र्यङ्गुले चैव अग्रतोऽङ्गुलविस्तृते ॥ ११३ ॥ ललाट का विस्तार चार कला का तथा दोनों शिखर दो गोलक का होना चाहिये । उसकी ऊँचाई तीन अङ्गल तथा उसका अग्रभाग एक अङ्गुल विस्तृत होना चाहिये ॥ ११३ ॥ केशभूमेः समुद्भूतं ललाटोपरि संस्थितम् । कुर्यात् कलार्धमानं तु वक्त्रं चालकसञ्चयम् ॥ ११४ ॥ केश भूमि में उत्पन्न होने वाला ललाट के ऊपरी भाग में स्थित होने वाला मुख तथा अलक समूह (केश) कला के अर्धमान का होना चाहिये ॥ ११४ ॥ कपोलपरिधिं कुर्यात् कर्णात् कण्ठगतं समम् । तन्मध्ये वर्तुलौ गण्डौ परिच्छिन्नौ पुरोदितैः ॥ ११५ ॥ कान से आरम्भ कर कण्ठ पर्यन्त परिधि (गोला) का निर्माण करे उसके बीच में परिच्छिन्न और गोलाकार दो गण्डस्थल निर्माण करे ॥ ११५ ॥ शिरसः परिणाहं तु विद्धि षट्त्रिंशदङ्गुलम् । श्रोत्रकोटिद्वयाच्चैव मस्तकस्य यदन्तरम् ॥ ११६ ॥ तत्षोडशाङ्गुलं विद्धि वर्तिभ्यां पृष्ठतस्तथा । सार्धतालं परिज्ञेयं ललाटात् कगुहान्तरम् ॥ ११७ ॥ शिर का परिणाह (गोलाई) ३६ अङ्गुल में निर्माण करे, दोनों कान से लेकर मस्तक पर्यन्त १६ अङ्गुल होना चाहिये । ललाट से नासिका के छिद्र का अन्तर डेढ़ ताल (१ १/२) समझना चाहिये ॥ ११६-११७ ॥ सत्कम्बुसदृशी ग्रीवा मूलमध्याग्रतो हि सा । परिधेर्द्वादशकला एकविंशाङ्गुलाग्रतः ॥ ११८ ॥ बिम्ब की ग्रीवा मूल, मध्य तथा अग्रभाग में उत्तम प्रकार के शङ्ख के समान होनी चाहिये । परिधि से उसका मान द्वादश कला तथा आगे से २१ अङ्गुल होना चाहिये ॥ ११८ ॥ अष्टादशाङ्गुला चैव स्वांशात् त्र्यंशेन विस्तृता । तन्मूलं विस्तृतौ स्कन्धौ तुङ्गौ वृत्तायतौ समौ ॥ ११९ ॥ अथवा १८ अङ्गुल का होना चाहिये, उसका विस्तार अपने अंश से तीसरे