भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 619

५६० सात्वतसंहिता अंश तक होना चाहिये। ग्रीवा का मूल एवं दोनों कन्धा विस्तृत, ऊँचा, गोल तथा आयताकार एवं सम होना चाहिये। उसका बाहुल्य छः अङ्गुल का होना चाहिये ॥ ११९ ॥ षडङ्गुलं तद्बाहुल्यं बाहुमानमथोच्यते। स्कन्धोत्तमाङ्गं त्रिकलं सन्ध्यन्तं षट्कलं स्मृतम् ॥ १२० ॥ अब बाहु का मान कहते हैं—कन्धे से लेकर शिर का मान तीन कला का और सन्ध्यन्त छः कला का कहा गया है ॥ १२० ॥ सन्धेर्वै मणिबन्धान्तं मानं नवकलं स्मृतम्। मणेर्मध्यमशाखान्तो हस्तः सप्ताङ्गुलो मतः ॥ १२१ ॥ सन्धि से लेकर मणिबन्ध तक का मान नव कला कहा गया है। मणि बन्ध से लेकर मध्यमाङ्गुलि पर्यन्त हाथ का मान सात अङ्गुल कहा गया है ॥ १२१ ॥ परिज्ञेयं कलाहीनं तन्मानं मध्यमाङ्गुलेः। तच्चतुर्यवहीना च साऽनामा तु प्रदेशिनी ॥ १२२ ॥ द्विकला च परिज्ञेया साङ्गुष्ठा तु कनीयसी। द्विपर्वा च स्मृतोऽङ्गुष्ठः सर्वाश्चाङ्गुलिविस्तृताः ॥ १२३ ॥ मणिबन्ध का मान मध्यमाङ्गुलि से एक कला कम समझना चाहिये और उससे चार यव कम अनामिका का तथा प्रादेशिनी का मान कहा गया है। कनिष्ठिका अङ्गुलि तथा अङ्गुष्ठ का मान दो कला कहा गया है। अङ्गुष्ठ में दो पर्व होते हैं, उसकी अपेक्षा सभी अङ्गुलियाँ लम्बी कही गई हैं ॥ १२२-१२३ ॥ सर्वासां मूलपर्यन्ताद् ह्रासयेच्च यवं यवम्। अग्रपर्वाधंमानेन कार्या लिङ्गोपमा नखाः ॥ १२४ ॥ सभी अङ्गुलियाँ मूल पर्यन्त परस्पर एक दूसरे से एक-एक यव कम हैं आगे के पर्व के आधे के मान में अङ्गुली की आकृति के समान नख का निर्माण करना चाहिए ॥ १२४ ॥ मानमङ्गुष्ठमूलस्य परिधेश्चतुरङ्गुलम्। तच्चतुर्यवहीनं च ज्ञेयं त्रिष्वङ्गुलीषु च ॥ १२५ ॥ अङ्गुष्ठ के मूल का मान परिधि की अपेक्षा चौगुना कहा गया है। शेष तीन अङ्गुलियों में वह मान चार यव कम होता है ॥ १२५ ॥ न्यूनाङ्गुलेः कला सार्धा प्राग्वद् ह्रासश्च वेष्टनात्। अङ्गुष्ठमङ्गुलं चाग्रात् तिस्रोऽन्याः षड्यवाः स्मृताः ॥ १२६ ॥