भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

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५७८ सात्वतसंहिता अन्य रूप वाले विम्ब के लिये वृत्त, अवृत्त अथवा आयत पीठ का निर्माण करे। जो अङ्गुलियों से परमाणुओं के सहारे अथवा आराधकमय होकर अर्चा ग्रहण करे, उसे मन्दिर के द्वार के समान आयाम में निर्माण कर उसके मान के अनुसार पीठ को दीर्घ बनावे। उसके आधे मान से उसका विस्तार बनावे ॥ २३८-२४१ ॥ सन्त्यज्य द्वादशांशाद् वै अधः पीठोन्नतिस्त्रिभिः ॥ २४१ ॥ शेषेणास्त्रांशसङ्घेन प्रतिमा चोत्थिता भवेत् । अथवा वाहनारूढा न्यूना वा मध्यमोत्तमा ॥ २४२ ॥ नीचे से द्वादशांश त्याग कर तीन अंशों से पीठ की ऊँचाई निर्मित करे। शेष अस्त्रांश समूह से प्रतिमा खड़ी बनानी चाहिये, अथवा यदि वाहनारूढ़ प्रतिमा बनावे तो उसे न्यून, मध्यम एवं उत्तम रूप में निर्माण करे ॥ २४२ ॥ चतुर्भिर्द्वादशांशैस्तदुपविष्टस्य चोन्नतिः । विहिता चास्य सर्वत्र प्रतिमाध्रेन विस्तृतिः ॥ २४३ ॥ चार द्वादशांश से उपविष्ट प्रतिमा की ऊँचाई निर्माण करे। इसका विस्तार प्रतिमा के आधे भाग में सर्वत्र निर्माण करे ॥ २४३ ॥ तत् त्र्यंशपरिलुप्ता च चतुर्थांशोज्झिताऽथवा । परिवारवशेनैव चातुरात्म्यस्य वै पुनः ॥ २४४ ॥ पुनः चातुरात्म्य के परिवार वश से वह प्रतिमा तीन अंशों से पूर्ण बनाई जाय अथवा चतुर्थांश छोड़कर बनाई जावे ॥ २४४ ॥ अलुप्तांशं च विहितं पीठायामं च सर्वदिक् । चतुर्दिग्दृग्गतस्यैवम् एकदिग्दृग्गतस्य च ॥ २४५ ॥ सभी दिशाओं में पीठ का आयाम अंश लोप के बिना निर्माण विहित है। चारों दिशाओं में दिखाई पड़ने वाले पीठ को अथवा एक दिशा में दिखाई पड़ने वाले पीठ के लिये यही नियम है ॥ २४५ ॥ तदेव दैर्घ्यद्विगुणं लाञ्छनैरावृतस्य च। सार्धं चानावृतस्यैव तद्बाहुल्यं पुरोदितम् ॥ २४६ ॥ यदि वह लाञ्छन से आवृत है, तो उसे दीर्घ का दुगना निर्माण करे, यदि वह लाञ्छन से अनावृत है तो अढ़ाई गुना कर निर्माण करे। इसका बाहुल्य पहले कह आये हैं ॥ २४६ ॥ (चतुष्कमेकपीठानां केवलं लक्ष्मवर्जितम् ।) एकैकं लक्ष्मभेदेन तत्संख्यं विद्धि वै पुनः ।