सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५७९ पीठसंख्याकथनम् अनन्तासनमाद्यं च द्वितीयं पक्षमन्दिरम् ॥ २४७ ॥ कमलाङ्गं तृतीयं तु चतुर्थं चक्रभूषणम् । एवं हि सर्वसामान्यं पीठानां हि द्विरष्टकम् ॥ २४८ ॥ एक पीठ के ही चार भेद होते हैं जो केवल लक्ष्म (चिह्न) से वर्जित होते हैं। फिर लक्ष्म (= चिह्न) के भेद से एक-एक क्रम से वे भिन्न हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! अब पुनः उनकी संख्या सुनिये। पहले आसन (पीठ) का नाम अनन्त है, द्वितीय पीठ का नाम 'पक्ष मन्दिर' है। तृतीय आसन (पीठ) का नाम कमलाङ्ग है। चतुर्थ का नाम चक्रभूषण है। इस प्रकार सर्व सामान्य पीठों की संख्या सोलह कही गई है ॥ २४७-२४८ ॥ भेदभिन्नं समासेन पुनरेव निबोध तु। दिक्षु लक्ष्माणि पीठानां विद्धि कण्ठगतानि च ॥ २४९ ॥ अब पुनः भेद से भिन्न होने के कारण उन पीठों के विषय में सुनिये। आठो दिशाओं में पीठों के लक्ष्म (चिह्न) कण्ठगत होते हैं ॥ २४९ ॥ अन्योन्यसन्निवेशाच्च तेषां बाह्यात्मना पुनः। चक्राम्बुजाभ्यां तत्स्थाभ्यां लुप्ताभ्यामपि तत्क्षितेः ॥ २५० ॥ ताभ्यामन्योन्ययोगाच्च दिक्ष्वनन्तखगाश्रयात् । द्विद्वयात्मना द्वयात्मना वा बहुत्वमवधारय ॥ २५१ ॥ पद्मेनोर्ध्वगतेनैव द्वयं चक्रेण तद्बहिः । एवं ह्याधोगतेनैव परिज्ञेयं द्वयं द्वयम् ॥ २५२ ॥ उपरिष्टात् तु पद्माभ्यामधश्चक्रं द्वयं द्वयम् । द्वितयव्यत्ययाच्चान्यत् परिज्ञेयं महामते ॥ २५३ ॥ पुनः अन्योन्य के सन्निवेश से वे पीठ अधिक संख्या में हो जाते हैं। पीठ में स्थित चक्र और कमल के भेद से, उन दोनों के स्थापित करने के भेद से, दोनों को एक में मिलाकर स्थापित करने के भेद से, दिशाओं में अनन्त और गरुड़ के स्थापन करने से, इस प्रकार दो-दो को अलग-अलग स्थापित करने से, अथवा दोनों को एकत्र स्थापित करने से वे पीठ अनेक हो जाते हैं। हे सङ्कर्षण ! इसे समझिए। इस प्रकार पीठ के ऊपर पद्म स्थापन से, उसके बाहर चक्र स्थापन से और इसी प्रकार के नीचे स्थापन करने से उसके दो भेद हो जाते हैं। ऊपर दो-दो पद्मों के स्थापन से, इसी प्रकार नीचे दो-दो चक्र के स्थापन से दो-दो भेद होते हैं और दोनों के व्यत्यय से भी दो-दो भेद हो जाते हैं। हे महामते ! इस प्रकार पीठ के अनेक भेद हो जाते हैं ॥ २५०-२५३ ॥