सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० सात्वतसंहिता अन्तर्बहिःस्थितिवशाच्चक्रपद्मद्वयस्य च। व्यत्ययादनयोर्विद्धि ऊर्ध्वभागाच्चतुष्टयम्॥ २५४ ॥ भीतर बाहर चक्र और पद्म के आठ ऊर्ध्व भाग के व्यत्यय होने से इनके चार भेद हो जाते हैं ॥ २५४ ॥ अधोभागादेवमेव चतुष्कमपरं तु वै। पीठानामष्टकमिदमधस्तादूर्ध्वतस्तु वा॥ २५५ ॥ युक्तमेकेन वै कुर्याच्चक्रेण कमलेन वा। चक्राकारास्तु विहिता ह्येकभ्रमसमाश्रिताः॥ २५६ ॥ इसी प्रकार अधोभाग में भी व्यत्यय होने से एक और चार भेद हो जाता है। ये पीठ के आठ भेद नीचे और ऊपर होने के कारण हो जाते हैं। इस पीठ का निर्माण केवल चक्र से अथवा केवल कमल से अर्थात् दो में से एक ही से करना चाहिये ॥ २५५-२५६ ॥ बहवो हि दलास्तद्वदीषद् वै कर्णिकान्विताः। इति लाञ्छनसञ्चारो बहुधा ते मयोदितः॥ २५७ ॥ यस्मिन् प्रकृतिभूते तु पीठे तदधुना शृणु। कृत्वा द्विर्दशधा पीठं पुरायामात् समैः पदैः॥ २५८ ॥ केवल एक गोले में ही चक्राकार पीठ निर्माण करना चाहिये । इसी प्रकार बहुत दलों से युक्त थोड़े कर्णिकाओं से कमल द्वारा पीठ निर्माण करे । इस प्रकार पीठ के अनेक लाञ्छन युक्त सञ्चार का वर्णन मैने किया । अब जिस प्रकृतिभूत पीठ में (जो करना है) उसे सुनिये । पीठ का आयाम (लम्बाई) के अनुसार बराबर-बराबर भागों में बारह भाग करे ॥ २५७-२५८ ॥ एकेन चरणं जङ्घा-कलशौ च त्रिभिस्त्रिभिः । कण्ठवीथिमथैकेन षड्भिः कण्ठं तदूर्ध्वतः ॥ २५९ ॥ एक भाग में चरण, तदनन्तर जङ्घा और कलश तीन-तीन भागों में निर्माण करे । एक भाग से कण्ठ एवं वीथी बनावे और उसके ऊपर छः भागों में कण्ठ निर्माण करे ॥ २५९ ॥ भागेन कण्ठसूत्रं तु शक्तिकांशत्रयेण तु। उष्णीषं च तदूर्ध्वे तु कुर्यादंशद्वयेन वै॥ २६० ॥ शुक्ति के अंशत्रय भाग से कण्ठ सूत्र निर्माण करे और उसके ऊपर दो अंश से उष्णीश निर्माण करे ॥ २६० ॥