भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८१ निर्गमः स्वदलेनैव विहितश्चरणस्य तु। चतुर्दिक्षु महाबुद्धे क्षेत्रतोऽभ्यधिकः स्मृतः॥ २६१ ॥ विहित चरण का निर्गम उसके भाग से ही करे। हे महाबुद्धे! इस प्रकार चारों दिशाओं में निर्गम क्षेत्र से अधिक बनावे ॥ २६१ ॥ सर्ववृत्तं घटं कुर्यात् पल्लवैर्वारिकैर्युतम्। परितोऽशद्वयेनैव कण्ठपीठं प्रवेशयेत् ॥ २६२ ॥ पत्तों तथा अस्त्रों से युक्त चारों ओर से गोला घट का निर्माण करे। दो अंश से कण्ठ पीठ बनाकर उस घट में प्रवेश करावे ॥ २६२ ॥ अन्तःप्रवेशमेकेन विध्यंशेन गलस्य च। कुर्याद् गलप्रवेशस्य समां सूत्रस्य निःसृतिम्॥ २६३ ॥ एक अंश से निर्मित गला का अन्तःप्रवेश करावे। गल-प्रवेश के समान सूत्र को उसमें से निकाल लेवे ॥ २६३ ॥ शुक्तेरधः कण्ठसूत्रभागात् पादेन निर्गतम्। वदनान्तं समासेन शुक्तेः संकोचमाचरेत्॥ २६४ ॥ शुक्ति के नीचे कण्ठसूत्र के भाग से एक पाद निकला हुआ मुख का भाग संक्षेप में शुक्ति से संकुचित करे ॥ २६४ ॥ उष्णीषघटजङ्घानामश्रिसाम्यं यथा स्थितम्। घटवद् भूषयेच्छुक्तिमरकैर्वाब्जपल्लवैः॥ २६५ ॥ तत्रोपरिष्टात् परिधिं चतुरंशकसम्मितम्। सन्त्यज्य निखनेद् द्रोणीमंशनिम्नां समन्ततः ॥ २६६ ॥ ऐसा करने से उष्णीष, घट और जङ्घा के कोण एक साम्य में स्थित हो जाएँगे। तदनन्तर शुक्ति को अरक तथा कमल पत्र से घट के समान भूषित करे। उसके ऊपर चार अंश की परिधि का भाग छोड़कर एक अंश गहरी द्रोणी चारों ओर (गड्ढा) खननी चाहिए ॥ २६५-२६६ ॥ विस्तृतैर्मध्यभागेऽथ स्वत्र्यंशेन च निर्गमम्। तन्मानं चतुरश्रं तु पीठक्षेत्राद् विनिर्गतम् ॥ २६७ ॥ मध्य भाग को विस्तृत कर उसके तीन अंश से निर्गम का पानी निकलने का स्थान खने। पीठ क्षेत्र से निकले हुए उस निर्गम (जल निकासी) का मान चतुरस्र (चौकोर) बनावे ॥ २६७ ॥ तच्चाग्रतस्त्रिधा कृत्वा पक्षभागौ क्षयं नयेत्।