सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 641, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ें५८२ सात्वतसंहिता अनुपादेन चामूलात् सम्यग् लाङ्गलवक्त्रवत्॥ २६८ ॥ फिर उसे आगे के भाग से तीन भागों में बाँट कर उसका किनारा नष्ट कर देवे । इस प्रकार मूल से लेकर पाद के अनुसार उसे हल के मुख के समान निर्माण करना चाहिए ॥ २६८ ॥ अग्रतो मूलदेशाच्च कृत्वादौ वै त्रिधा त्रिधा । भूयस्तन्त्रिखनेन्मध्याज्जलं याति यथा द्रुतम्॥ २६९ ॥ मूल देश से आगे, उसे तीन-तीन भागों में विभक्त कर, फिर मध्य में उसे इस प्रकार खने जिससे पीठ का जल उसमें से शीघ्रता से बह जावे ॥ २६९ ॥ सूकराननतुल्यं तु भवत्येवं महामते । कुर्याद् वै शङ्खसदृशं मकरास्योपमं तु वा॥ २७० ॥ हे महामते ! उस नाली को इस प्रकार खने जिससे वह सूकर के मुख के समान हो जावे । अथवा शङ्ख के सदृश या मकर के समान हो जावे ॥ २७० ॥ जलनिर्गममेतद् वै पीठेषूदितलक्षणम् । न कुर्यात् कर्मबिम्बानामाश्मादिमितात्मनाम् ॥ २७१ ॥ चित्रमृत्काष्ठजानां तु चलानां तु विशेषतः । तथैव चतुरश्रस्य चतुर्मूर्तिगतस्य च॥ २७२ ॥ इस प्रकार पीठों पर से निकलने वाले जल के निकास का रास्ता कहा गया है । जहाँ शम (दो अङ्गुल) प्रमाण से छोटा कर्म बिम्ब हो, वहाँ प्रणाली का निर्माण न करे । विशेष कर जहाँ चित्र, मिट्टी और काष्ठ निर्मित बिम्ब हो, अथवा चल बिम्ब हों और जहाँ चौकोर चतुर्मूत्ति हो, वहाँ प्रणाली का निर्माण न करे ॥ २७१-२७२ ॥ प्रणालमग्रगं मूर्तेर्यतः संसिद्धिहानिकृत् । प्रयोजनं विना काचिन्न क्षतिस्तस्य तद्विना ॥ २७३ ॥ यतः मूर्ति के आगे निकाले जाने वाला प्रणाल साधक की सिद्धि की हानि करता है । अतः उसका निर्माण नहीं करना चाहिये । प्रयोजन के बिना यदि प्रणाल का निर्माण न किया जाय तो उसके बिना कोई क्षति नहीं होती ॥ २७३ ॥ सामान्यस्य तु वै यस्मादाधारस्य विशेषतः । सप्रणालं भवेत् पीठमासनं च प्रणालकम् ॥ २७४ ॥ जहाँ सामान्य आधार हो वहाँ विशेष रूप से प्रणाल युक्त पीठ का निर्माण करे और आसन भी प्रणाल युक्त बनावे ॥ २७४ ॥