सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५८३ भूरिनीरादिना स्नानं यत्र यच्छति साधकः । प्रत्यहं तद्विना तत्र प्रत्यवायो भवेत् स्फुटम् ॥ २७५ ॥ साधक जहाँ भगवान् को पर्याप्त जल से प्रतिदिन स्नान कराता है । वहाँ यदि स्नान न करावे तो उसे प्रत्यवाय लगता है ॥ २७५ ॥ एवमेव बृहद्विम्बभूषितानां विधीयते । धातुशैलोत्थितानां च निमित्तस्नपनार्थतः ॥ २७६ ॥ यह विधान बृहद् बिम्ब से भूषित मूर्तियों के लिये विहित हैं । धातु शैल से निर्मित बिम्ब का स्नपन ही निमित्त है ॥ २७६ ॥ भद्रासनगते कर्मबिम्बे तस्य समाचरेत् । सततं च यथालाभं दधिक्षीरघृतादिना ॥ २७७ ॥ कर्म-बिम्ब के भद्रासन पर अधिष्ठित होने पर जिस प्रकार दधि, क्षीर, घृत प्राप्त हो उससे सतत स्नान करावे ॥ २७७ ॥ भूप्रतिग्रहकथनम् तोयेन तन्नयेद् यत्नाद् भूभागं वा प्रतिग्रहम् । यथा नाक्रम्यते पादैर्जन्तुभिस्तन्महर्द्धिदम् ॥ २७८ ॥ अब भूपरिग्रह कहते हैं—बिम्ब के लिये ग्रहण किये जाने वाले भू-भाग का जल से प्रतिग्रह लेवे । जहाँ जन्तु अपने पद से भूमि पर आक्रमण न करे । ऐसी भूमि महान् सिद्धि देने वाली होती है ॥ २७८ ॥ अतः प्रणालं विहितं निषिद्धमत एव हि । तत्संस्थापनकाले तु देवानां दिग्विधे हितम् ॥ २७९ ॥ प्राक्प्रत्यगाननानां च तदुदग्दिग्गतं शुभम् । उदग्दक्षिणवक्त्राणां प्राग्भागे विहितं सदा ॥ २८० ॥ तत्पुनर्भद्रपीठीयदेवाद् वामेऽर्थसिद्धिदृत् । सदैवाराधकानां तु विलोमाद् विपरीतदम् ॥ २८१ ॥ इसी कारण प्रणाल विहित है और निषिद्ध भी है । पीठ पर देवताओं के स्थापन काल में हितकारी दिशायें इस प्रकार हैं—पूर्व एवं पश्चिम दिशा में मुख वाले देवताओं के स्थापन में साधक को उत्तर दिशा हितकारी कही गई है (साधक उत्तराभिमुख हो स्थापन करे) । उत्तर और दक्षिण में मुख वाले देवताओं के स्थापन में सदैव साधक को पूर्व दिशा हितकारी कही गई है (साधक पूर्व दिशा में मुख कर स्थापन करे) । भद्र पीठ पर स्थापन किये जाने वाले देवता के बायें